देखो तो कितना, वो मजबूर है!
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
कोल्हू के बैल जैसा, घूमता है गोल-गोल
अनकहे दर्दों को, देता नहीं बोल
ख्वाबों में हरी घास, आँखों में प्यास है
टूटती उम्मीदों में, बँधी एक आस है
होके चूर-चूर भी, वो चलता जरूर है...
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
झुलसाया सूरज ने, तन-मन का कोना
छिन गया हाथों से, निवाला और सोना
लू के थपेड़ों ने, साँसों को घेरा
भूख और प्यास का, चारों ओर डेरा
ज़माना ये क्यों इतना, हुआ बेकसूर है?
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
आसमाँ से कहर गिरा, बहा ले गया वजूद
मौत के समंदर में, मिला न कोई वजूद
निरीह सी आँखों में, आँसुओं की बाढ़ है
पेट की वो आग ही, सबसे बड़ी आड़ है
किनारे की तलाश में, वो हुआ चकनाचूर है...
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
बवंडर उठा कोई, उजाड़ा घरौंदा
हस्ती को उसकी, पैरों तले रौंदा
सोचती हैं आँखें कि, क्यों ये सितम है?
दुनिया के पास क्या, रूतबा ही कम है?
क्यों हर कोई दिखाता, अपना ही ग़रूर है?
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
... कविता रावत


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