स्मृति की पगडंडी: नदियों के संगम और गांव की माटी का बुलावा - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

स्मृति की पगडंडी: नदियों के संगम और गांव की माटी का बुलावा

बरसों बाद जब शहर के शोर को पीछे छोड़कर अपने गांव की दहलीज पर कदम रखा, तो मन स्मृतियों के उस पुराने बस्ते की तरह खुल गया जिसे बरसों से सहेज कर रखा था। वह सुकून, जो शहर के कंक्रीट के जंगलों में कहीं खो गया था, गांव की हवा में घुला हुआ मिला। आँखों में बीता हुआ कल किसी चलचित्र की तरह तैरने लगा। जब हम अपने गांव की तलहटी में पहुँचे तो सबसे पहले उन नदियों के कल-कल नाद ने हमारा स्वागत किया, जो हमारे अस्तित्व के साक्षी रहे हैं।
नदियों का मिलन: एक अनवरत यात्रा

​हमारे गांव की तलहटी में लखोर और रसिया नदियों का वह पावन संगम जिसे रसिया महादेव नाम से जाना जाता है, आज भी उतना ही सम्मोहक है। यहाँ से ये दो धाराएं मिलकर खटलगढ़ नदी का रूप लेती हैं, जो आगे बढ़कर पर्वतीय अंचल की जीवनरेखा नयार में समाहित हो जाती है। अंततः यही नयार नदी व्यासघाट में पतित-पावनी गंगा की मुख्यधारा में मिलकर ऋषिकेश और हरिद्वार की ओर बढ़ जाती है।
नदी तट की वे सुनहरी यादें
खटलगढ़ नदी के किनारे कदम रखते ही बचपन की यादें किसी चलचित्र की भांति जीवित हो उठीं:
​जीवन का उल्लास: वह घंटों नदी के ठंडे पानी में मछली पकड़ना और पत्थरों के बीच छिपी हलचलों को महसूस करना, जैसे आज की दुनिया के हर तनाव का जवाब था।
श्रम और समृद्धि: याद आता है नहर के पानी को सहेजकर धान के खेतों तक ले जाना। वह पानी सिर्फ खेतों को नहीं, बल्कि हमारे सपनों को सींचता था।
​परम्परा की गूंज: नदी के वेग से चलती 'घराट' (पानी की चक्की) की वह सम्मोहक आवाज और ताजे पिसे आटे की महक अब भी यादों में बसी है।
निश्छल बचपन: तपती दोपहर में नदी के शीतल जल में घंटों नहाना, कपड़े धोना और किनारे पर गाय-बकरियों को चराते हुए बेफिक्र होकर लेटना—वह सुकून आज के महंगे सैर-सपाटे में कहाँ!
​परिवर्तन की बयार और यादों के साक्षी
​गांव की ओर बढ़ते ही सबसे पहले वह पगडंडी मिली, जिस पर चलकर कभी हम पाठशाला जाया करते थे। वह रास्ता आज भी वैसा ही था, मानो मेरा इंतज़ार कर रहा हो। बचपन में जिन चीड़ के पेड़ों की टहनियों पर झूला झूलते थे, वे अब विशालकाय वृक्ष बन चुके थे—गंभीर और अडिग, जैसे गांव के पुराने किस्सों के संरक्षक हों। विकास की आहट भी स्पष्ट थी; कच्ची-पक्की सड़कों का जाल बिछा था और मोटर मार्ग अब गांव के आंगन तक पहुँच चुका था।
पलायन का दंश और बदलता सामाजिक परिवेश 
​किंतु, इस भौतिक विकास के पीछे एक गहरी टीस भी महसूस हुई। 'बदलाव' केवल सड़कों तक सीमित नहीं था, वह रिश्तों और चेहरों में भी उतर आया था:
​सूनापन और अजनबीपन: रास्तों पर अब वे परिचित मुस्कुराहटें कम ही दिखती हैं। जो चेहरे मिले, उनमें वह पुराना अपनत्व कहीं ओझल था। अपनों के बीच अजनबी होने का अहसास सबसे भारी था।
​पलायन की मार: गांव के वे स्कूल, जहाँ कभी बच्चों का शोर गूंजता था, अब वीरानी ओढ़े खड़े हैं। पलायन ने घरों को खंडहर और लहलहाते खेतों को बंजर बना दिया है।
​सामाजिक बिखराव: जो गांव कभी एकता की मिसाल हुआ करते थे, आज वहां राजनीति और गुटबाजी की दीवारें खड़ी मिलीं। पत्थर और मिट्टी के वे सौम्य घर अब ईंट-गारे के बेजान ढांचों में तब्दील हो चुके हैं।
​व्यसन का साया: कभी मेलजोल का केंद्र रहे बाजार अब नशे की चपेट में हैं, जो आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर एक प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
​अमिट अहसास: आज भी शेष है उम्मीद

​तमाम बदलावों और अभावों के बावजूद, मेरे गांव की आत्मा आज भी जीवित है। शहरी मशीनों की कर्कश गूंज यहाँ के शांत आकाश को नहीं छू पाई है। आज भी पक्षी निडर होकर विचरते हैं और खेतों की वह सोंधी खुशबू ठीक वैसी ही है, जैसी बचपन में हुआ करती थी।​
निष्कर्ष: भले ही वक्त की मार ने मेरे गांव की सूरत बदल दी हो, भले ही संगी-साथी बिछड़ गए हों, लेकिन मेरी उम्मीद आज भी कायम है। ईंट और पत्थर बदल सकते हैं, पर वह मिट्टी नहीं बदलती जिसने हमें गढ़ा है। गांव की मिट्टी से मेरी डोर आज भी उतनी ही मजबूती से जुड़ी है, जितनी पहले थी। मेरा गांव महज एक स्थान नहीं, मेरा अस्तित्व है।
... कविता रावत 

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