प्रचंड धूप में हमारे स्वप्नों के प्रासाद को ईंट-दर-ईंट आकार देते वे कर्मठ हाथ, हमारी व्यस्त जीवनशैली को गति प्रदान करते वे परिचित चेहरे और हमारी सुरक्षा हेतु निरंतर तत्पर वे सजग नयन... प्रायः हम उन्हें केवल उनके 'परिधान' या उनके 'उत्तरदायित्व' की परिधि में ही देख पाते हैं।
किन्तु हमारा बोध यहाँ चूक जाता है कि स्वेद (पसीने) से भीगे उस भाल के पीछे भी एक सुखी परिवार के कोमल स्वप्न आकार लेते हैं। कार्य के गुरुतर भार को वहन करने वाले वे हाथ वस्तुतः किसी के जीवन का एकमात्र संबल हैं।इस 'अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस' पर, आइए कर्म के पीछे छिपे उस 'मानव' के अस्तित्व को स्वीकारें। उन्हें केवल उनके श्रम का मूल्य ही नहीं, बल्कि उनके हिस्से का सम्मान और कृतज्ञता भी सप्रेम भेंट करें।
सबके करीब है वो, सबसे ही दूर है
देखो तो कितना, वो मजबूर है!सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
कोल्हू के बैल जैसा, घूमता है गोल-गोल
अनकहे दर्दों को, देता नहीं बोल
ख्वाबों में हरी घास, आँखों में प्यास है
टूटती उम्मीदों में, बँधी एक आस है
होके चूर-चूर भी, वो चलता जरूर है...
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
झुलसाया सूरज ने, तन-मन का कोना
छिन गया हाथों से, निवाला और सोना
लू के थपेड़ों ने, साँसों को घेरा
भूख और प्यास का, चारों ओर डेरा
ज़माना ये क्यों इतना, हुआ बेकसूर है?
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
आसमाँ से कहर गिरा, बहा ले गया वजूद
मौत के समंदर में, मिला न कोई वजूद
निरीह सी आँखों में, आँसुओं की बाढ़ है
पेट की वो आग ही, सबसे बड़ी आड़ है
किनारे की तलाश में, वो हुआ चकनाचूर है...
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
बवंडर उठा कोई, उजाड़ा घरौंदा
हस्ती को उसकी, पैरों तले रौंदा
सोचती हैं आँखें कि, क्यों ये सितम है?
दुनिया के पास क्या, रूतबा ही कम है?
क्यों हर कोई दिखाता, अपना ही ग़रूर है?
सबके करीब... सबसे दूर...
वो मजदूर है, हाँ वो मजदूर है।
... कविता रावत

1 टिप्पणी:
सच कहु तो मैं इस कविता को पढ़कर सिर्फ दुख नहीं, एक अजीब सा विरोध भी महसूस करता हूं। आपने मजदूर को सिर्फ हालात का शिकार नहीं दिखाया, आपने उसे सिस्टम के बीच फंसा हुआ इंसान बना दिया। आपने दर्द को सीधा बोलने नहीं दिया, आपने उसे बहने दिया, और वही इस कविता को अलग बनाता है।
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