भोपाल की सुरम्य श्यामला हिल्स की पहाड़ियों में, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की सीमाओं से सटा 'श्री जलेश्वर महादेव मंदिर' स्थित है। यह पावन स्थल अपनी असीम शांति, प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक महत्ता के लिए स्थानीय भक्तों के बीच गहरी आस्था का केंद्र है। लगभग एक एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फैला यह परिसर आज अपनी हरियाली और आध्यात्मिक वातावरण के कारण ध्यान व साधना के लिए सर्वोत्तम स्थान बन चुका है।
इस मंदिर का इतिहास भक्ति और सेवा की नींव पर टिका है। मंदिर के निचले भाग में एक खुले चबूतरे पर हनुमान जी विराजमान हैं, जिनके सम्मुख सीता माता की कुटियानुमा मंदिर में प्रभु श्री राम और लक्ष्मण जी के विग्रह स्थापित हैं। मंदिर के ऊपरी भाग में मां दुर्गा और भगवान गणेश के मध्य में एक अन्य हनुमान मंदिर स्थित है। समीप ही एक प्राचीन पीपल के वृक्ष के नीचे शीतला माता का छोटा मंदिर श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केंद्र है।
मंदिर के नाम 'जलेश्वर' के पीछे एक प्राकृतिक कारण है। श्यामला हिल्स के पथरीले जंगलों से रिसने वाले अनगिनत झरने (झिर) यहाँ जल का संचय करते थे, जो आगे चलकर एक छोटी नदी और फिर बड़े तालाब का रूप ले लेते थे। आज भी मुख्य मंदिर की सीढ़ियों के नीचे चट्टानों से अमृत तुल्य जल की धारा अनवरत प्रवाहित होती है, जो साक्षात महादेव के 'जलेश्वर' स्वरूप को चरितार्थ करती है।
स्मृतियों का वटवृक्ष और पारिवारिक योगदान
मंदिर परिसर में स्थित 100 वर्ष से भी अधिक प्राचीन विशाल वटवृक्ष मेरी बचपन की यादों का साक्षी है। कभी इसकी लटकती जटाओं पर मेरा झूला हुआ करता था, तो कभी यहाँ घास काटती माँ की डांट। इस मंदिर के निर्माण और विस्तार में मेरे परिवार का गहरा योगदान रहा है।
हनुमान जी के चबूतरे का निर्माण मेरे बड़े भाई ने करवाया, तो वहीं वटवृक्ष के चारों ओर बने विशाल चबूतरे के लिए मेरे पिताजी ने कठिन परिश्रम किया। साठ के दशक से शुरू हुई यह यात्रा वर्ष 2000 में मंदिर के 51 फीट ऊंचे भव्य शिखर के निर्माण के साथ एक नए स्वरूप में निखर कर आई।
पथरीली चट्टानों पर हरियाली का संकल्प
महादेव की कृपा ही थी कि मेरा विवाह भोपाल में हुआ और मैं इस मंदिर की सेवा से निरंतर जुड़ी रही। मंदिर को आकर्षक और हरा-भरा बनाने के संकल्प में मेरे पति ने मेरा भरपूर साथ दिया। जब हमने यहाँ फलदार और छायादार वृक्ष लगाने का निर्णय लिया, तो कई लोगों ने इसे 'असंभव' कहकर हतोत्साहित किया, क्योंकि यहाँ की ज़मीन अत्यंत पथरीली थी।
हमने इस चुनौती को स्वीकार किया और एक 'मिशन' की तरह कार्य शुरू किया:
कठिन श्रम: चट्टानों के पत्थरों को खोदकर निकालने में की गई मशक्कत और उनमें पौधे लगाना बहुत बड़ी चुनौती रही।
संसाधनों का सृजन: फेंके गए पुराने घड़ों, प्लास्टिक की बाल्टियों और डिब्बों को हमने गमलों का रूप दिया।
पौधों का चयन: कम पानी में पनपने वाले पौधों जैसे आम, आंवला, जामुन, सीताफल, नींबू, नारियल और औषधीय पौधों के साथ-साथ बेलपत्र और शमी को प्राथमिकता दी।
सफलता: आज यहाँ 500 से अधिक पौधे लहलहा रहे हैं। यहाँ तक कि उत्तराखंड की विशेष वनस्पतियां जैसे दारूहल्दी (किंगोडा) और कंडाली (बिच्छू घास) भी इस वातावरण में फल-फूल रही हैं।
जीवंत होता पर्यावरण
हमारी मेहनत का सबसे सुंदर पुरस्कार तब मिला, जब यहाँ की हरियाली देखकर मोर के जोड़े दुर्गा मंदिर के पीछे पेड़-पौधों के झुरमुट में विचरण करने लगे। जो स्थान कभी ऊबड़-खाबड़ जंगल था, वह आज पक्षियों का बसेरा और भक्तों के लिए स्वर्ग के समान है।
निष्कर्ष:
आज जब हम अपने द्वारा लगाए गए इन लगभग 500 पौधों को हवा में झूमते देखते हैं, तो मन असीम संतोष और आनंद से भर जाता है। यह मंदिर केवल पत्थर और ईंटों का ढांचा नहीं, बल्कि हमारे विश्वास, धैर्य और प्रकृति के प्रति अटूट प्रेम का जीवंत प्रमाण है। सच ही है, यदि मन में दृढ़ निश्चय हो, तो महादेव की कृपा से चट्टानों पर भी उपवन खिलाया जा सकता है।
... कविता रावत









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