"हमारा यह गीत उत्तराखंड के उन अनकहे दर्दों को
शब्दों में पिरोने का एक प्रयाय है, जो पलायन और
टूटते परिवारों की गूँज बन चुके हैं।
'एक बार ऐ जा रे बेटा' गीत केवल शब्द नहीं,
बल्कि पहाड़ की मिट्टी और वहाँ रहने वाले
बुजुर्गों की पुकार हैं।"
तेरु बाट च्यौणी यो घौर च।
बीमार ह्व़े ग्यों सारु परिवार,
तेरु इंतज़ार मा यो घौर च।
तेरा बुबा की खूँ-खूँ नि थमणी,
बुढ्यापा की लाठी बि छूटी गे।
पकड़ी ली खाट, बिमारी न घेर्यां,
दवा-दारू की आस बि टूटी गे।
तेरु ही नौं जपणु छन हरदम,
जणैं सूखी ड़ालु मा प्राण अटकि ग्यों,
सारु घौर आज बीमार च।
छोटा भाई तेरु दिनभर खटदु,
ब्याखुनि नशे मा धुत्त ह्व़े आवै।
कैकू बि ड़र-धौंस नी च अब,
नशे मा अपणु परिवार भुलावे।
भुलि ग्यों ऊं घर की मर्यादा,
ह्व़े ग्युं छार-छार यो परिवार च,
सारु घौर आज बीमार च।,
पितरों की या आखिरी निशानी,
अपणी ही किस्मत पर रोणी च।
झरी-झरी कें कंकाल ह्व़े गे,
नि जाणे कबे तक साथ देणी च?
खंडर बणणी छन सब्बी जिंदगियां,
बस क्ये बोण कु यो घर-संसार च।
एक बार तूं ऐ जा रे बेटा,
तेरु बाट च्यौणी यो घौर च।
बीमार ह्व़े ग्यों सारु परिवार,
तेरु इंतज़ार मा यो घौर च।
... कविता रावत
प्रमुख गढ़वाली शब्द एवं उनके अर्थ:
बाट च्यौणी: रास्ता देखना / इंतज़ार करना
बुबा: पिताजी
नौं जपणु: नाम रटना
ब्याखूनी: शाम के समय
ह्व़े ग्यों: हो गया है
पितरों की थाती: पूर्वजों की अमानत (पुरखों की निशानी)।क्ये बोण कु: कहने भर के लिए
गीत का हिन्दी अनुवाद
एक बार तुम आ जाओ बेटा
एक बार तुम आ जाओ रे बेटा,
यह घर तुम्हारा रास्ता देख रहा है।
सारा परिवार अब बीमार पड़ गया है,
यह घर बस तुम्हारे इंतज़ार में खड़ा है।
तुम्हारे पिता की वह खाँसी नहीं थमती,
बुढ़ापे की लाठी (सहारा) भी अब छूट गई है।
बीमारी ने ऐसा घेरा कि उन्होंने खाट पकड़ ली है,
दवा-दारू की आस भी अब टूट गई है।
हर पल बस तुम्हारा ही नाम जपते रहते हैं,
जैसे सूखी लकड़ियों में प्राण अटक गए हों,
आज सारा घर बीमार पड़ा है।
छोटा भाई तुम्हारा दिनभर मेहनत करता है,
पर शाम को नशे में धुत होकर घर आता है।
अब उसे किसी का डर या लिहाज़ नहीं रहा,
नशे में वह अपने परिवार को ही भुला देता है।
वह घर की सारी मर्यादाएँ भूल चुका है,
अब यह परिवार पूरी तरह बिखर चुका है,
आज सारा घर बीमार पड़ा है।
पूर्वजों की यह आखिरी निशानी (घर),
अपनी ही फूटी किस्मत पर रो रही है।
झड़ते-झड़ते अब यह खंडहर (कंकाल) हो गई है,
न जाने कब तक यह साथ निभाएगी?
सभी जिंदगियां अब खंडहर बनती जा रही हैं,
बस कहने मात्र को ही अब यह घर-संसार बचा है।
एक बार तुम आ जाओ रे बेटा,
यह घर तुम्हारा रास्ता देख रहा है।
सारा परिवार अब बीमार पड़ गया है,
यह घर बस तुम्हारे इंतज़ार में खड़ा है।

4 टिप्पणियां:
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शनिवार 25 अप्रैल 2026 को लिंक की गयी है....
http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
मार्मिक रचना
ये कविता पढ़कर दिल भारी हो जाता है। आपने एक घर का दर्द ऐसे दिखाया कि हर लाइन सीधी दिल के अंदर लगती है। पिता की हालत, भाई का भटकना और घर का टूटना, सब बहुत सच्चा लगता है। आज भी कई घर इसी दर्द से गुजरते हैं, पर कोई खुलकर कह नहीं पाता।
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