उत्तराखंड की नाट्य-परंपरा: रावण-बाणासुर का ऐतिहासिक संवाद
शारदीय नवरात्रि का आगमन होते ही चारों ओर मां दुर्गा के नव रूपों की पूजा-अर्चना आरंभ हो जाती है। भांति-भांति की भव्य मूर्तियां और नयनाभिराम झांकियां सजने लगती हैं। दसों दिशाओं में भक्ति और शक्ति के इस पावन पर्व की धूम के बीच, जब शहर के किसी कोने में उत्तराखंड की पारंपरिक रामलीला देखने को मिलती है, तो मन बरबस ही गांव की पुरानी यादों के सागर में गोते लगाने लगता है।
उन दिनों गांव में बिजली नहीं हुआ करती थी। प्रकाश के लिए एक बड़ा सा गैस-पंप वाला लालटेन (पेट्रोमैक्स) होता था। उसमें बत्ती की जगह एक 'मेंटल' लगा होता था। जब पंप से हवा भरी जाती, तो वह मेंटल पहले धीमे-धीमे लाल होता और हवा का दबाव बढ़ते ही अचानक सफेद बल्ब की तरह दमकने लगता। उसी दूधिया रोशनी में रामलीला का मंच जगमगा उठता था। दर्शक टाट-पट्टियों पर, सीढ़ियों पर और जिन्हें जगह न मिलती, वे आसपास के घरों की छत या छज्जों पर बैठ जाया करते थे।
आज उन्हीं सुनहरी स्मृतियों को ताज़ा करते हुए प्रस्तुत है सीता स्वयंवर का प्रसिद्ध 'रावण-बाणासुर संवाद', जो रामलीला निर्देशक श्री छम्मी लाल ढौंडियाल जी की पुस्तक 'श्री संपूर्ण रामलीला अभिनय' से लिया गया है।
रावण-बाणासुर संवाद (नाट्य प्रस्तुति)
रावण (शेर):कर लेंगे यदि छोकरे हर एक काम को,
तो दुनिया में कौन जानेगा रावण के नाम को!
मेरे बिना यह काम कर सकता नहीं कोई,
दिल से निकाल दो यह ख्वामख्वाह के ख्याल को।
बाणासुर (शेर):
खबरदार! ओ मूर्ख, जो शंकर का धनुष उठाता है,
इतने राजाओं के आगे गुरु का अपमान करता है!
रावण (शेर):
चुप बैठा रह ओ बाणासुर! इस दुनिया में क्या कोई बलवान नहीं?
मैंने कैलाश उठाया था, क्या मूर्ख तुझे यह ज्ञान नहीं?
यह छोटा सा धनुष ही क्या, इसको तो मैं अवश्य तोडूंगा,
तेरे जैसे अभिमानी का घमंड, चकनाचूर करूंगा!
बाणासुर (शेर):
दशशीष! न कर इतना अभिमान, कर प्रणाम जा अपने घर को,
आज़ाद हो इन सब झगड़ों से, जप शिव-शंकर भोलेश्वर को।
सुखारी (अज्ञानी) न इसको तोड़ सकते, यह सत्य मानो वाणी मेरी,
माना तुमने जीता है जग को, हो वीर-विक्रम बड़े सुरारी।
रावण (शेर):
ऐसे शूरवीर मैंने पछाड़े हैं, जो अब जान बचाते फिरते हैं,
और इंद्र राजा बजवाता बाजा, मेरी ज़रा सी आज्ञा पाते हैं।
विमाता मेरी करे पिसाई, और पिसा हुआ ही खाते हैं,
ये चांद-सूरज बजाते पहरा, खड़े रहते हमारे द्वारे हैं।
अरे ओ बाणासुर! अब देख, मैं अपना जोर लगाता हूं,
यहां आए सभी बहादुरों को, अपना जौहर दिखाता हूं!
बाणासुर (शेर):
करो न रावण गुमान इतना, चढ़े न तुमसे कमान भारी,
धनुष तो प्रभु वही तोड़ेंगे, जिन्होंने गौतम की नारी तारी।
रावण (शेर):
ऐ बाणासुर! यह जग सारा, मेरे आगे सरसों समान है,
जिन महादेव ने शेषनाग को धारण कर बनाया आभूषण है,
उन सहित कैलाश पर्वत को, मैंने एक ही हाथ पर धारा है!
फिर क्यों न मैं अभिमान करूं, जब मुझमें इतना बल-विस्तार है?
बाणासुर (शेर):
फिर भी न सीख मानता है, तू है गंवार पूरा का पूरा,
जो धनुष उठाने का करता है, विचार तू पूरा का पूरा।
बस इससे मालूम होता है, तू अपनी इज़्ज़त गंवाएगा,
जो बढ़-चढ़कर बात करेगा, वह कभी प्रशंसा न पाएगा!
रावण (शेर):
बाणासुर! अभी मैं जाता हूं, और पल में धनुष उठाता हूं,
इसके पश्चात उखाड़ नगर तेरा, सागर के बीच बहाता हूं!
अभी तोड़ता हूं इस तुच्छ धनुष को, हम शंभु के नौनिहाल जो हैं,
तू करे बड़ाई किसकी पाजी, हर एक फन में कमाल हम हैं!
बाणासुर:
(क्रोध और व्यंग्य से) अच्छा! मैं भी देखूंगा कि तू कैसे इस धनुष को तोड़ता है और मेरे नगर को सागर में बहाता है!
(इतना कहकर बाणासुर मंच से प्रस्थान करता है। रावण अहंकार में भरकर जैसे ही शिव-धनुष की ओर झुकता है, तभी गूंजती हुई आकाशवाणी होती है...)
आकाशवाणी:
"हे रावण! तेरी कन्या कुंभभती को मधु दैत्य हरकर ले जा रहा है। तेरा भाई कुंभकर्ण निद्रा में लीन है और पुत्र मेघनाद तपस्या में मग्न है!"
रावण: (अचकचाकर, आकाश की ओर देखते हुए)
"ओहो! मैंने तो बड़ी भूल की जो इस स्वयंवर में आया। मुझे तुरंत एक अत्यंत आवश्यक कार्य से जाना होगा, इसलिए मैं अभी जाता हूं। किंतु... सीता! याद रखना, भले ही मैं तुझे इस स्वयंवर में न जीत सका, परंतु एक न एक दिन तुझे अवश्य जीतूंगा!"
(और इतना कहते ही रावण तेज़ी से वहां से भाग खड़ा होता है।)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें