बचपन के स्वत्रंत्रता दिवस का वह एक दिन - KAVITA RAWAT
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Sunday, August 15, 2010

बचपन के स्वत्रंत्रता दिवस का वह एक दिन

शहर की महज औपचारिक दिशा की और निरंतर अग्रसर होती स्वत्रंत्रता दिवस की एक दिवसीय चकाचौध के बीच बचपन में गाँव के स्कूल में मनाये जाने वाले स्वत्रंत्रता दिवस की याद रह रह कर आ जाती है  जब गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी, संकरी उबड़-खाबड़ पगडंडियों से प्रभात फेरी के लिए गाँव-गाँव, घर-घर जाकर देशभक्ति के गीतों से देशप्रेम में अलख जागते थे, जिन्हें गाँव के नौजवान, बड़े,बुजुर्ग सभी बड़े जोश के साथ बड़ी उत्सुकता से स्वागत कर बड़े मग्न होकर सुनते थे एक गीत हमारे तिरंगे का जिसे मैं अब भी बच्चों से संग गाया करती हूँ जो मुझे बेहद प्यारा लगता है..

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा
इस झंडे के नीचे निर्भय
होये महान शक्ति का संचय
बोलो भारत माता की जय
....................

उस समय छोटे-छोटे कदमों से जंगल की संकरी डरावनी राह चलते यह गीत हौसला बुलंद करने के लिए कम नहीं था.............

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
सामने पहाड़ हो
या सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं
तुम निडर हटो नहीं
...............

......अब तो शहरी हालातों को देश स्कूल में पढ़ी देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले क्रांतिकारी अमर वीर देशभक्तों का बलिदानी इतिहास धार्मिक पौराणिक कथा-कहानियों की तरह बनती जा रही हैं, जिसे पढ़ना-सुनना दुर्भाग्यवस उबाऊ, नीरस समझा जाने लगा है राजनीति शास्त्र की किताब में पढ़ा 'हमारा संविधान' जिसमें हमारा लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, मौलिक अधिकार व कर्तव्यों की बड़ी-बड़ी व्याख्याएं होती थी अब स्कूल के बस्तों और पुस्तकालयों में स्वयं ही घुट रहीं हैं और वर्तमान वास्तविक राजनीति तो हमारी संसद, विधान मंडलों की सुरक्षित, चाक-चौबंद समझी जानी वाली बंद कंदराओं से बाहर आकर स्कूल, कॉलेज में सीधे दाखिला लेकर सीधे-साधे, भोले-भाले, गरीब समझे जाने वाले ग्रामीणों के घर-घर में अपनी घुसपैठ करते हुए 'राजनीति' की एक खुली किताब बन गयी है, जिसमें सभी बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभाते नज़र आने लगे हैं
..कविता रावत 

46 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई!!!!!

संजय भास्‍कर said...

*स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ. सादर * *संजय भास्कर

अजित गुप्ता का कोना said...

स्‍वतंत्रता दिवस पर हार्दिक बधाई।

Rajeev Bharol said...

बहुत अच्छा लिखा है.

"दूसरों की गुलामी के निवाले से हृष्ट-पुष्ट हो जाने से
स्वतंत्रता के साथ दुर्बल बने रहना भला !"

ठीक कहा है लेकिन यदि स्वतन्त्र रहते हुए हृष्ट-पुष्ट हो पायें तो और भी अच्छा हो. दिली इच्छा है कि भारत फ़ले फ़ूले और सभी खुशहाल हों. देश वासी ईमानदार और देशभ्क्त बनें.

Akanksha Yadav said...

बेहतरीन लिखा आपने...बधाई.
स्वाधीनता-दिवस की हार्दिक शुभकामनायें...जय हिंद !!

Urmi said...

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !

निर्मला कपिला said...

स्‍वतंत्रता दिवस पर हार्दिक बधाई।

राजकुमार सोनी said...

बहुत खूब लिखा है आपने
आजादी का पर्व आपके जीवन में भी खुशियां लाएं
आपको शुभकामनाएं

Pankaj Trivedi said...
This comment has been removed by the author.
Pankaj Trivedi said...

राष्ट्रीय पर्व पर हार्दिक बधाई |
कविता, आपने तो बचपन की यादों के साथ स्कूल के दिन की याद भी दिलाई | वाकई, बहुत ही सराहनीय सोच और बयान है | मेरा सेल्यूट देश के लिएँ तो हमेशा है,
आज अच्छी दोस्त होने के के लिएँ तुम भी सेल्यूट का स्वीकार करो | मेरे जज्बे को समझ रही होंगी |

nilesh mathur said...

आपको स्वाधीनता दिवस की बहुत शुभकामना, जय हिंद!

विवेक रस्तोगी said...

आजादी दिवस की शुभकामनाएँ


१५ अगस्त के संदर्भ में - वन्दे मातरम और स्वतंत्रता दिवस के सही मायने क्या हम नई पीढ़ी तक पहुँचा पा रहे हैं ? [On the occasion of 15th August….]

सम्वेदना के स्वर said...

कविता जी..बेहद सुंदर यादें मन को छू लेने वालीं..और उतने ही खूबसूरत उद्धरण और आपकी कविता… यथार्थ चित्रित होता है आपकी कविताओं में!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति ..

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

योगेन्द्र मौदगिल said...

samvedi post......sadhuwad..

Harshvardhan said...

aapko bhi svatantrata divas ki mangalkamnaye.........

रचना दीक्षित said...

बचपन की यादें सचमुच कहीं और ही ले जाती हैं, बहुत ही सुंदर रचना बधाई. आपको स्वतंत्रता दिवस पर ढेरों शुभकामनाएं.

M VERMA said...

पिंजरे में बंद शेर की तरह रहने से
आवारा पशु की तरह फिरना भला !!
आजादी से बड़ी कोई चीज नहीं है. सुन्दर भाव.
प्रभात फेरिया और फिर नारे लगाना .. बचपन को कुरेद गया आपका आलेख.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

सुन्दर चित्रण, कविता जी !

पूनम श्रीवास्तव said...

bachpan me padhi hui ye kavita ham apne bachchon ko aaj bhi bade garv se sunaate hai. par aapne bilkui sahi likha ab vo kahaani kisse bankar kitaabi baaten rah gai hai .bahut hi achhi post
aajadi ke is parv ki aapko bhi hadik badhai.
poonam

मनोज कुमार said...

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप एवं आपके परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ!

sanu shukla said...

बहुत सुन्दर...!!
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!


http://iisanuii.blogspot.com/2010/08/blog-post_15.html

कडुवासच said...

... स्वतंत्रता दिवस पर्व की हार्दिक बधाई एवं
शुभकामनाएँ !!!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक शुभकामानाएं.

Mahfooz Ali said...

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति ..

Rohit Singh said...

आजादी की शुभकामनाएं....स्कुल में बनाया जाने वाला समारोह हमेशा दिलों में जिंदा रहता है.....

राजभाषा हिंदी said...

अच्छी प्रस्तुति।


राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

हास्यफुहार said...

अच्छी रचना।

Anonymous said...

सच्ची इंसानी सोच

मुकेश कुमार सिन्हा said...

sach kaha aapne.........hame bhi apna bachpan yaad aa gaya........wo chillate hue vande matram kahna aur fir last me jalebi milna........yaad hai hame......:)

sach kahun uss samay wo jalebiyan hi hamare ajadi ka prateek thi sayad.......:D

bahut achchhi rachna!

SATYA said...

सार्थक प्रस्तुति.

दिगम्बर नासवा said...

दासता की हालत में कोई नियम लागू नहीं होता है !
जो अपनी स्वतंत्रता खो चुका उसके पास कुछ नहीं बचता है !!


सच कहा है ... दासता फिर चाहे अपने आप की ही क्यों न हो .... अपनी इंद्रियों की क्यों न हो .... अच्छा लिखा है बहुत ...

Anonymous said...

dher saari shubhkaamna is din ki ..lekin shayad ab waqt badal gaya hai , ab mere blog par hi dekh lijiye...

Anonymous said...

सार्थक प्रस्तुति.

पूनम श्रीवास्तव said...

kavita ji ,aapne to apni rachna se bachpan ki tatha schooli dino ki yaad taza kar di. jab ham jor -jor se is kavita ko rata karte the.
bahut hi prashanshaniy avam sarthak post.
aapko bhi hardik badhai.
poonam

शोभना चौरे said...

बहुत कुछ याद दिला गई आपकी रचना |हम सबकी यादो की कसक एक जैसी है किन्तु तेजी से बदलते वैश्विक प्रभाव ने ,घर घर की राजनीति ने कहाँ ला दिया हमे.? हम असहाय बनकर देखते रहे |
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे |

शरद कोकास said...

यह जायज़ चिंता है

kuldeep Singh Rana said...

दिल मैं जब तेरी लगन रक्श किया करती थी

मेरी हर साँस मैं खुशबु सी बसा करती थी

अब तो महफिल से भी होता नही कुछ ग़म का इलाज

पहले तन्हाई भी दुःख बाँट लिया करती थी

अब जो रक्सां है कई रंग भरे चेहरों में

यही मिटटी कभी बेकार उड़ा करती थी

रंग के जाल ही मिलते हैं जिधर जाता हूँ

रौशनी यूँ न मुझे तंग किया करती थी

अब मुझे चांदनी कुछ भी तो नही कहती है

कभी ये तेरे संदेशे भी दिया करती थी

किस कदर प्यार से ये पेड़ बुलाते थे मुझे

किस तरह छाओं तेरा जीकर किया करती थी

ये दर-ओ-बाम कभी शाम लिपट'ते थे मुझे

हर गली बढ़ के क़दम चूम लिया करती थी

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी लिखी रचना सोमवार 15 अगस्त 2022 को
पांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

संगीता स्वरूप

मन की वीणा said...

सत्य को बयान करती सार्थक और विचारोत्तेजक पोस्ट।
स्वतंत्रता दिवस के अमृत महोत्सव पर हार्दिक शुभकामनाएं 🌹

उषा किरण said...

बहुत खूब… स्‍वतंत्रता दिवस पर हार्दिक बधाई।🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

उषा किरण said...

स्‍वतंत्रता दिवस पर हार्दिक बधाई।🇮🇳🇮🇳🇮🇳

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

अहा अपना बचपन और गांव में शिक्षकीय जीवन याद आ गया

Sudha Devrani said...

प्रभात फेरी का जिक्र कर बचपन की यादें ताजाकर दी आपने...
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं आपको ।

Sweta sinha said...

सुंदर बेशकीमती संस्मरण।
सादर।

Jigyasa Singh said...

यादों के गलियारे में ले जाता देशभक्ति से ओत प्रोत सुंदर सराहनीय संस्मरण । स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।