अपनेपन की भूल - KAVITA RAWAT
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

रविवार, 26 सितंबर 2010

अपनेपन की भूल

जिन्हें हम अपना समझते हैं
गर आँखों में उनकी झाँककर देखते हैं
तो दिखता क्यों नहीं हरदम
आँखों में उनके पहला सा प्यार?
एक पल तो सब अपने से लगते हैं
पर दूजे पल ही क्यों बदलता संसार!
सोचकर आघात लगता दिल को कि
जो हमारे सबसे करीबी कहलाते हैं
वे वक्त पर क्यों मुहँ मोड़ लेते हैं
दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
हम उन्हें अपना समझने की
क्यों भूल कर बैठते हैं!
ढूँढो तो सबकुछ मिल सकता है
देखो अगर अपनेपन से तो
सबकुछ अपना सा लगता है
पर कविता समझी नहीं कि
अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
जो कल्पना मन में बसी है
उसे ही पाने की क्यों मन में
बार-बार तमन्ना जगी है!

         ......कविता रावत

39 टिप्‍पणियां:

  1. आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं

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  3. अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
    जो कल्पना मन में बसी है
    उसे ही पाने की क्यों मन में
    बार-बार तमन्ना जगी है!
    क्या कहें पर यही है आज का सच, अच्छी प्रस्तुति

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  4. मासूम मन की परेशानी को सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है आपने ..
    आभार ...;.

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  5. कविता अभिधेयात्मक एवं व्यंजनात्मक शक्तियों को लिए हुए है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    काव्यशास्त्र (भाग-3)-काव्य-लक्षण (काव्य की परिभाषा), आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

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  6. हमे अपनओ से ज्यादा धोखा मिलता है बेगानो से तो हम चुस्त होते है, बहुत भाव पुर्ण कविता धन्यवाद

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  7. बेहतरीन अभिव्यक्तियाँ...लाजवाब प्रस्तुति...बधाई.

    __________________________

    'शब्द-शिखर' पर बेटियों के प्रति नजरिया बदलने की जरुरत (डाटर्स-डे पर विशेष)

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  8. सुन्दर भाव की बेहद सुन्दर रचना

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  9. करीबी ही वक्त पर मुख मोडते है कोई दूसरा थोडे ही आयेगा मुख मोडने उसके क्या अपने करीबी नहीं है। यह भी बिल्कुल सत्य है कि अपने पन से देखा जाये तो सब अपने लगते हैं । वर्तमान में सच्चा दोस्त या हितैषी या अपना उसे कहते है जो उसकी जरुरत पर हमारे पास आजाये

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  10. अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
    जो कल्पना मन में बसी है
    उसे ही पाने की क्यों मन में
    बार-बार तमन्ना जगी है!
    आपेक्षा तो अपनो से ही होती है। दिल के करीब रहने वालों के लिये ही तो सभी अच्छी बुरी संवेदनायें उठती है। अच्छी लगी रचना। शुभकामनायें

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  11. यथार्थपरक कविता ... सच्चाई को आपने बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है।

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  12. पर कविता समझी नहीं कि
    अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
    जो कल्पना मन में बसी है
    उसे ही पाने की क्यों मन में
    बार-बार तमन्ना जगी है!

    सच कहा आपने हम इतनी अपेक्षाएं रख लेते हैं..एक बार सोचे की हम अपेक्षाएं ना रखे..सिर्फ और सिर्फ देना जाने लेने की उम्मीद ना करे तो शायद खुश रह पाए.
    सुंदर अभिव्यक्ति.

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  13. जिन्हें हम अपना समझते हैं
    गर आँखों में उनकी झाँककर देखते हैं
    तो दिखता क्यों नहीं
    आँखों में उनके प्यार?
    Jivan bhi kya birodhabhas hai, Shayad yehi kehna chahti hain aap, Dekhne main to yeh duniya bahut khubsurat pratit hoti hai per yeh itni khubsurat hai nahi....
    inhi bhabon ki lajbab abhibyakti is kavita main hui hai
    HARDIK BADHAI

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  14. बेहतरीन अभिव्यक्तियाँ.....

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  15. आज के दौर का कड़वा सच जिसे आपने बहुत अच्छे और भावपूर्ण ढंग से सामने रखा .....

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  16. दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
    हम उन्हें अपना समझने की
    क्यों भूल कर बैठते हैं!
    .... taki apni aankhon se dard bahta rahe

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  17. बहुत ही बेहतरीन रचना.

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  18. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  19. एक पल तो सब अपने से लगते हैं
    पर दूजे पल ही क्यों बदलता संसार!
    सोचकर आघात लगता दिल को कि
    जो हमारे सबसे करीबी कहलाते हैं
    वे वक्त पर क्यों मुहँ मोड़ लेते हैं
    दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
    हम उन्हें अपना समझने की
    क्यों भूल कर बैठते हैं!
    ....यथार्थपरक कविता
    .....बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  20. bahut hi lajawab prastuti.....

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  21. कविता जी,
    आपकी कविता पर बशीर बद्र साहब की एक शायरी बतौर कमेंट पोस्ट कर रहा हूँ, शायद इसी में आपके सवाल का जवाब होः
    कोई हाथ भी न मिलाएगा,
    जो गले मिलोगे तपाक से,
    ये नए मिज़ाज का शहर है,
    ज़रा फासलों से मिला करो!!

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  22. bahut hi khubsurat rachna....
    yun hi likhte rahein...

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  23. वही तेरी खलिश है ...
    वही तेरे दर्द का ज़िक्र ....
    वही गिला है सभी का ....

    मुहब्बत तू इतनी जल्द मर क्यूँ जाती है ....?

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  24. सामाजिक व्यथा की सच्ची प्रस्तुति! सुन्दर

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  25. मन के भाव अच्छे से प्रस्तुत किए हैं ...

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  26. दिल को छू लेने वाली रचना,

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  27. अपनों से अपनेपन की प्यारभरी
    जो कल्पना मन में बसी है
    उसे ही पाने की क्यों मन में
    बार-बार तमन्ना जगी है!

    बस यही तमन्ना तो जीने की वजह बन जाती है...बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

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  28. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है!बधाई!

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  29. यह निश्चित ही बदलती दुनिया में बदलती महत्वाकांक्षाओं का परिणाम है,जहां एक पल में धूप और छांव का अहसास हो उठता है। तब तमन्नाओं का जगना कोई आश्चर्य नहीं।

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  30. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है, मगर अपनी बातें, अपनी पीड़ा, अपने अनुभव सहज-सरल बहने लगते है...
    दो बोल क्या बोल लेते हैं वे मधुर कंठ से
    हम उन्हें अपना समझने की
    क्यों भूल कर बैठते हैं!

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  31. कल 30/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  32. सुंदरता से अभिव्यक्त भाव.... सबके मन की...
    सादर बधाई।

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  33. बस यही जिंदगी है कभी अपनी कभी बेमानी है ...बहुत सुन्दर रचना !

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  34. बहुत सुन्दर ....
    दिल को कहीं छू गयी....

    सादर
    अनु

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