प्यार का ककहरा ! - KAVITA RAWAT
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Sunday, May 20, 2012

प्यार का ककहरा !

थोड़ी सी बात हुई
चंद मुलाकात हुई
वे अपना मान बैठे
जाने क्‍या बात हुई
देखते आये थे जिसे
करने लगे ‘प्यार’ उसे
वे इसे ही समझ बैठे
जग समझे चाहे जिसे
प्यार में सिमटने लगे
दूर सबसे छिटकने लगे
आंखों में सपने लिए
रात भर जगने लगे
दिखते न थे जो आसपास
डालते नहीं थे सूखी घास
उनकी नज़र में आने लगे
वही अब बन खासमखास
पर जब लंबे अरसे बाद
उनसे हुई एक मुलाकात
न थी आंखों में रौनक
न होंठों पे पहले जैसी बात
मुर्दानी सूरत नज़र आई
चेहरे पर उड़ती थी हवाई
कसम खाते थे जिस प्यार की
उसी से थी अब रुसवाई
प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता
बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे


    ..कविता रावत 

58 comments:

संजय भास्‍कर said...

आदरणीय कविता जी
नमस्कार !
खूबसूरत अह्साशों से भरी बेहतरीन कविता प्रस्तुत की है आपने ....बहुत ही प्यारी रचना !

Dr.NISHA MAHARANA said...

sahi bat ....piyar karna to sabhi chahte hain par use nibhana ????? koi virla hi ye kar sakta hai..

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

वाह ,,,, बहुत सुंदर रचना,,,अच्छी प्रस्तुति

RECENT POST काव्यान्जलि ...: किताबें,कुछ कहना चाहती है,....

vijay said...

प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता
_
सीधे रस्ते चलने वाले भी कब इस प्यार के चक्कर में घनचक्कर बन जाते है ये उन्हें बहुत बाद में पता चलता है
बहुत खूब अनुभव परिलक्षित होता है कविता में..
बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

प्यार का ककहरा सीखना सबके बस की बात नहीं .....

रश्मि प्रभा... said...

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे...बहुत ही बढ़िया

प्रवीण पाण्डेय said...

ककहरे के बाद का व्याकरण कठिन हो जाता है प्यार में..

Anupama Tripathi said...

सार्थक प्रस्तुति ...
निभाना ही तो मुश्किल है ...!!

Ramakant Singh said...

खुबसूरत एहसास ,सुक्ष्म विवेचन ,सरल विश्लेषण के साथ प्यार का ककहरा .

इस एहसास के गुप्त जी की दो लाइन

प्रणय और बिना झुके ,चलना जैसे रुके रुके

मेरा मन पंछी सा said...

बहुत ही बेहतरीन जो प्यार को समझते ही नहीं है..
वो क्या जाने इसकी गहराई..
कुछ दिन का बुखार है फिर उतर जाता है...
अति उत्तम रचना....
:-)

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात है!!
आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 21-05-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-886 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

लोकेन्द्र सिंह said...

क्या करें कविता जी प्यार का दस्तूर ही कुछ ऐसा है... बहुत ही बढ़िया रचना

Anju (Anu) Chaudhary said...

प्यार को प्यार ही ना जाने ......ना जाने ऐसा क्यूँ होता हैं ...

Anju (Anu) Chaudhary said...

प्यार को प्यार ही ना जाने ...ऐसा क्यूँ होता हैं ?

ANULATA RAJ NAIR said...

बहुत सुंदर......
प्यार को ना समझे वो नासमझ हैं.......

सादर.

Vaanbhatt said...

प्यार का ककहरा बिना पढ़े जीवन आधा है...पढ़ने के बाद कुछ पास होते हैं कुछ फेल...पर कम से कम ख़ुदा के घर जब जायेंगे तो ये तो नहीं कहेंगे कि आपकी नियामत के लिए हमने ट्राई नहीं किया...

RAJ said...

प्यार को जो लोग हल्का लेते हैं उनकी क्या गत होती है इसको बड़ी खूबसूरती से पेश किया है आपने ..बहुत अच्छा उदाहरण है ..बहुत सुन्दर रचना

निवेदिता श्रीवास्तव said...

बेहद खूबसूरत एहसास ..........

pankaj said...

प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता

प्यार की अजब-गजब दास्ताँ का ककहरा बड़ा उलझा सुलझा है ...सुन्दर रचना

Anonymous said...

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे

यही तो बड़ी मुसीबत है ..प्यार हुआ तो उसी की सुनते चले जाते है फिर आफत सबके ऊपर ...
बहुत प्रेरक कविता है ...

shikha varshney said...

ये पढाई हर किसी के बस की बात नहीं
सुन्दर रचना.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे

कोमल रचना....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत खूब....
सादर।

kshama said...

प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता
बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे
Kya baat kahee hai aapne!

सदा said...

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे
बहुत खूब कहा है आपने ... आभार।

M VERMA said...

कौन पढ़ता है ककहरे और व्याकरण को प्यार में

Anonymous said...

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे...अब तो प्यार कोई एक खेल भर बनता जा रहा है..
बड़ी अच्छी कविता लिखी है ..

Maheshwari kaneri said...

कोमल भाव सुन्दर रचना....

सदा said...

कल 23/05/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


... तू हो गई है कितनी पराई ...

Pallavi saxena said...

सुंदर भाव संयोजन से सजी भावपूर्ण अभिव्यक्ति....

ashish said...

ककहरा समझ में आया . सुँदर रचना .

दिगम्बर नासवा said...

सच कहा है .. प्रेम हर किसी के बस में नहीं होता ... पर क्या करें इसपे बस भी तो नहीं होता ...
न चाहते हुवे भी ये रोग दबोच लेता है ...

Kailash Sharma said...

वाह ! बहुत भावपूर्ण रचना...प्रेम करना या न करना कहाँ अपने हाथ में है...

प्रेम सरोवर said...

बहुत ही प्रभावित करती पक्तियां । मेरे नए पोस्ट अमीर खुसरो पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

Unknown said...

यह पोएट्री बहुत ही अछी हे
आपको इससे सम्बंदित
एक बुक लेखनी चहिये
मेरी सुभ कम्नाये आपके साथ है

मे पहली बार हिंदी मे कमेन्ट लिख रहा हु पता नहीं अछी हिंदी लेखी है के नहीं मालूम नहीं जो भी हो इस कची हिंदी के लिये माफ्फ़ करना

Unknown said...

पढ़ते न प्‍यार के ककहरे
मे इसका मतलब नहीं समझा जो आपने लास्ट मे लिखा है

Unknown said...

kkhare ka matlab nahi samjha mai

महेन्‍द्र वर्मा said...

प्यार की है अजीब दास्तां
जिनका नहीं प्यार से वास्ता
वे भी चल पड़ते हैं अक्‍सर
छोड़कर अपना सीधा रास्‍ता

अजीब दास्तां है ये...!

Anonymous said...

बैठते जो कभी पास मेरे
तो समझाती राज गहरे
होती न उनकी ये हालत
पढ़ते न प्‍यार के ककहरे

वाह! आपने तो प्यार का क ख ग अच्छी तरह से समझा दिया ...बहुत सुँदर अभिव्यक्ति....

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


हैल्थ इज वैल्थ
पर पधारेँ।

travel ufo said...

बहुत ही बढिया लिखा है आपने ............जितनी प्रशंसा हो कम है और ऐसा ही लिखते रहिये

डॉ. जेन्नी शबनम said...

इतना आसान नहीं है प्यार का ककहरा सीखना, सुन्दर रचना, बधाई.

प्रेम सरोवर said...

बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

धम्मू said...

हम भी समझ लिए प्यार के ककहरे को ....
आपने बहुत ही बढिया लिखा है ..

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

ककहरे किस भाषा का शब्द है और इसका अर्थ क्या है ?

मनोज कुमार said...

इस ककहरे से शुरू हुई गाथा सबके बस की बात नहीं।

kailash said...

हम भी पढ़ चले प्यार का ककहरा!

प्रेम सरोवर said...

बहुत रूचिकर पोस्ट । मेरे नए पोस्ट "बिहार की स्थापना का 100 वां वर्ष" पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी ।
धन्यवाद ।

कविता रावत said...

ककहरा का मतलब वर्णमाला

कविता रावत said...

ककहरा हिंदी का ही शब्द है जिसका मतलब वर्णमाला है .

Anjani Kumar said...

प्यार के ककहरे .....पढ़कर मन फिर से न जाने किस दिशा में जाने लगा है
बेहद असरदार
बाकी रचनायें कल पढ़ेगें मैम
आभार

Darshan Darvesh said...

कुछ ही शब्दों में फैला ये कैसा संसार..

Raju Patel said...
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Raju Patel said...
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Raju Patel said...

बहुत ही सुन्दर रचना.....अभिनन्दन-

Dr.R.Ramkumar said...

shradhdha, saburi...


Good!

सुनील अनुरागी said...

पहला पहला प्यार है.
स्मृतियाँ हजार हैं

Prateek Tyagi said...

हृदय स्पर्शी पंक्तिया..सुन्दर रचना ..