स्मृतियों के हिमकण और गुनगुनी धूप की पाठशाला - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपनी कविता, कहानी, गीत, गजल, लेख, यात्रा संस्मरण और संस्मरण द्वारा अपने विचारों व भावनाओं को अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का हार्दिक स्वागत है।

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

स्मृतियों के हिमकण और गुनगुनी धूप की पाठशाला


पहाड़ों की आहट और यादों का डेरा 
जब सुदूर हिमालय की चोटियाँ बर्फ की सफेद चादर ओढ़ती हैं, तो वहाँ से उतरने वाली बर्फीली हवाएँ मैदानी इलाकों में अपनी दस्तक देने से नहीं चूकतीं। आज शहर की रगों में जो ठिठुरन है, उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उन पहाड़ी हवाओं और ठंडे जल ने अपना मूल निवास त्याग कर हमारे ही घर में डेरा डाल लिया हो। जब भी ठंड के थपेड़ों से सामना होता है, तो होठों पर अनायास ही गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी के स्वर फूट पड़ते हैं— “ठण्डो रे ठण्डो, मेरा पहाड़ै की हव्वा ठण्डी पाणि ठण्डो...”









पीढ़ियों का अंतर और 'फैशन' की ठण्ड
इस हाड़-कांपती ठंड में जहाँ हम जैसों की हालत पस्त है, वहीं बच्चे अपनी शीतकालीन छुट्टियों के उन्माद में मस्त हैं। परीक्षाओं के बोझ से मुक्त होकर वे उछलकूद में व्यस्त हैं, उन्हें न प्रोजेक्ट की चिंता है और न ही आगामी पढ़ाई की। मुश्किल तब आती है जब वे कड़कड़ाती ठंड में भी 'फैशन' के फेर में गर्म कपड़े पहनने से गुरेज करते हैं। जब हम उन्हें जुकाम और बुखार का डर दिखाते हैं, तो वे मुस्कुराते हुए हमें 'पुराना' करार दे देते हैं। ऐसे में वह लोक-कहावत सटीक बैठती है कि— लड़कों और जवानों को ठंड कहाँ लगती है, बस बूढ़ों को ही रजाई की शरण लेनी पड़ती है। फिर भी, वात्सल्य और जिम्मेदारी के चलते हमें ही उनके नखरे सहते हुए उन्हें सुरक्षित रखना पड़ता है।
बचपन के किस्से और 'हिल स्टेशन' की जिद
बच्चों की मासूम जिद है कि उन्हें बर्फबारी देखनी है ताकि वे स्कूल खुलने पर अपने मित्रों को गर्व से किस्से सुना सकें। शायद यह हमारे ही सुनाए गए बचपन के किस्सों का असर है— जब हम उल्टी छतरी में ओले जमा कर कंचे खेला करते थे और रूई के फाहे जैसी गिरती बर्फ के गोले बनाकर एक-दूसरे पर वार करते थे। आज जब वे श्यामला हिल्स की पहाड़ियों को देखते हैं, तो उनमें भी वही बर्फीला दृश्य खोजने की कोशिश करते हैं। काश! हमारे शहर की इन पहाड़ियों पर भी बर्फबारी संभव होती, तो बच्चों की यह हसरत घर की छत पर ही पूरी हो जाती।









छत की पाठशाला और सुनहरी दुपहरी

फिलहाल, ऑफिस की छुट्टियों का सदुपयोग घर की छत पर 'हिल स्टेशन' बनाकर किया जा रहा है। घर के काम निपटाकर जब हम छत की खिली धूप में बैठते हैं, तो वहीं बच्चों की पाठशाला सज जाती है। बच्चे पढ़ाई और खेल में रम जाते हैं और मैं दूर दिखती श्यामला हिल्स को निहारते हुए अपने गाँव की बर्फ़ीली वादियों की स्मृतियों में गोते लगाने लगती हूँ।
नया साल और नई उम्मीदें
भोजपुर मंदिर, केरवा डैम और बड़े तालाब की सैर ने बच्चों के भीतर हमारे प्रति एक विश्वास जगाया है। अब आगे का कार्यक्रम मौसम के मिजाज और नए साल की करवट पर निर्भर है। आशा है कि ठंड की यह सिकुड़न और सुनहरी धूप का यह मेल, रिश्तों में और अधिक गरमाहट भर देगा।






     सभी ब्लॉगर और सुधि पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
                 ..........कविता रावत



52 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

संस्मरण रूपी पोस्ट बढ़िया लगी ...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

ठण्ड में सब जम रहे हैं..सुना है हिमालय ही भेज रहे हैं सब..

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

बचपन, छुट्टी और मां बाप का प्यार
यानी स्वर्ग धरा पर.

पोस्ट के लिए धन्यवाद .

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

मैदानों में भले ही काटने वाली ठण्ड पड रही है, किन्तु पहाड़ों से आने वाले परिचित बताते है की पहाड़ों में मौसम काफी खुशगवार है खासकर दिन के वक्त बहुत प्यारी धुप खिल रही है वहाँ पर ।

vijay ने कहा…

उधर पहाड़ों पर बर्फवारी होती है इधर शहर में अपनी सहमत आ जाती हैं .... फिर भी शहर के मुकाबले ठण्ड के दिन पहाड़ों पर बहुत भारी होते हैं

खैर उनको इससे क्या! वे तो ऐन वक्त पर ठोड़ी पर हाथ धरकर टुकुर-टुकुर हमारा मुँह ताककर बैठ जायेंगे। फिर अपना भेजा फ्राई हो या दिमाग का दही बने, इससे उनकी सेहत पर एक इंच भी फर्क नहीं पड़ने वाला! हमें ही माँ का नाम लेकर सारी जिम्मेदारी उठानी ही पड़ती है!
...... जब तक छोटे बच्चे हैं सारे काम अपने को ही देखने पड़ते हैं ........दिल से निकली सच्ची बातें कह दी आपने ....बहुत अच्छी पोस्ट पढने को मिली ....

Ramakant Singh ने कहा…

आपकी ठण्ड की कहावत हमारे छत्तीसगढ़ में इस तरह है .
लइकन को हम लागब नाहीं, ज्वानन हैं संग भाई
बुढन का हम छाड़ब नाहीं, चाहे ओढे लाख रजाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-12-2012) के चर्चा मंच-1102 (बिटिया देश को जगाकर सो गई) पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

Unknown ने कहा…

दिदी जी ठंडो रे ठंडो त मियारु फेब्रेट गीत च ..गों कि याद त भौत आन्द पर नौकरी कु सवाल छ...
मी भी जब जडू लागुन्द ई गीत गांदु .............
आप कु भौत-भौत धन्यवाद!!!
अब पुरु गीत ....

ठंडो रे थान्दू, मेरा पहाडी की हौवा ठंडी, पानी ठंडो -2
हो होहो, होहो होहो, आआआअ होहो होहो

एच उच्च ह्यू हिमाल, ठंडो ठंडो नीसू गंगा जी कु चाल, ठंडो ठंडो
एच उच्च ह्यू हिमाल, ठंडो ठंडो
नीसू गंगा जी कु चाल, ठंडो ठंडो
पैयां छान चान्य पन्ध्यार, होहो
छान बुग्याल ढाल दर, होहो
पैयां छान चान्य पन्ध्यार
छान बुग्याल ढाल दर
रुला पाक बोन उन्ध्यार, ठंडो
ठंडो
ठंडो रे ठंडो , मेरा पहाडी की हौवा ठंडी, पानी ठंडो -2

रौन्सुला बुरांस किला, ठंडो ठंडो
बाँझ देवदार चिल, ठंडो ठंडो
रौन्सुला बुरांस किला, ठंडो ठंडो
बाँझ देवदार chai, ठंडो ठंडो
डंडा उवार डंडा पार, होहो
बात घाटा काला धर, होहो
डंडा उवार डंडा पार
बाता घाटा काला धार
सार ख्यार गौण गुथ्यार, ठंडो
ठंडो
ठंडो रे ठंडो, मेरा पहाडी की हौवा ठंडी, पानी ठंडो -2

बाँध बू की चाल ढाल, ठंडो ठंडो
स्वामी जी बिना बग्वाल ठंडो ठंडो
बाँध बू की चाल ढाल, ठंडो ठंडो
स्वामी जी बिना बग्वाल, ठंडो ठंडो
घोर बोन खबर saar, होहो
चिठ्ठी का कतरी माँ प्यार, होहो
घोर बोन खबर सार
चिठ्ठी का कतरी माँ प्यार
फौजी भेजी तुई जग्वाल, ठंडो
ठंडो
ठंडो रे ठंडो, मेरा पहाडी की हौवा ठंडी, पानी ठंडो -2

पूस की चुइयाल रात, ठंडो ठंडो
सौझान्हीयुं की चवी बात, ठंडो ठंडो
पूस की चुइयाल रात, ठंडो ठंडो
सौझान्हीयुं की चवी बात, ठंडो ठंडो
मिथु माया कु पाग, होहो
जलौन्य जवानी की आग, होहो
मिथु माया कु पाग
जलौन्य जवानी की आग
गुस्सा नस्सा रीस राद, ठंडो
ठंडो
ठंडो रे ठंडो, मेरा पहाडी की हौवा ठंडी, पानी ठंडो -2
हो होहो, होहो होहो, आआआअ होहो होहो

Surya ने कहा…

जब-तब अपने बचपन के किस्से सुनाते हैं कि कैसे हम बचपन में जब सर्दियों में ओले गिरते तो उन्हें उल्टी छतरी में इक्कठा कर उनसे कंचे-गोली की तरह खेलने बैठ जाते! जब फर-फर कर रूई के फाहे की तरह आसमान से बर्फ गिरती तो कैसे उसकी बड़ी-बड़ी गेंद बनाकर एक दूसरे पर उछालते फिरते। जब चारों तरफ बर्फ ही बर्फ होती फिर कैसे घर, पेड़-पौधे, पहाड़ बर्फ की सफेद रजाई ओढ़े तनकर सोते नजर आते और भी बहुत से बातें चलती रहती
.....................
हमने भी कभी बचपन में इसी तरह बर्फ से खूब खेला था. माँ-बाप क्या बन गए सब भूल गए वे दिन !!! आपने खूब याद दिलाई, पढ़कर एक बार फिर उन्हीं बीती यादों में खो गए हैं ...
ठंडो रे ठंडो हम भी गा रहे हैं आजकल मौसम जो है ..

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

ठण्ड ही ठण्ड !!

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

अब तो पहाड़ों पर भी बर्फ कम ही गिरती है मसूरी में भी कभी कभी गिर रही है। सब जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बच्चो को ठण्ड कम महसूस होती है बुजुर्गो को ठण्ड अधिक लगती है,,,

recent post : नववर्ष की बधाई

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

आज मन बहुत दुखी है...
बच्चों को बर्फबारी देखना बहुत अच्छा लगता है...बड़ों को भी....

संध्या शर्मा ने कहा…

अरे वाह... आप तो हमारे भोपाल से हैं. भोजपुर मंदिर, केरवा डैम, सैर-सपाटा और बड़े ताल की बात से याद आया कविता जी , कितना खूबसूरत दिखाई देता है ना भोपाल सर्दियों में... सुन्दर आलेख के लिए आपका आभार... नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाएँ...

Unknown ने कहा…

सुन्दर** ठंढ से डरती और कपने पर विवश करती प्रस्तुति

शूरवीर रावत ने कहा…

एक अच्छी प्रस्तुति। ठण्ड के बहाने नेगी जी को याद कर लिया आपने।
अब आप विन्ध्याचल के उस पार भी ठिठुरा रही है तो फिर हमारा क्या हाल होगा कविता जी। जो हिमालय की तलहटी पर ही बैठे हैं।
बहरहाल। आभार !!

Mamta Bajpai ने कहा…

कविया जी बहुत उम्दा पोस्ट ....ठण्ड का भी अपना आनंद है

डॉ टी एस दराल ने कहा…

ठण्ड में और ठण्ड की चाहत मन को ठण्ड पहुंचाती है।

रचना दीक्षित ने कहा…

कुछ भी हो गर्मी से तो सर्दियाँ ही भली.

स्पाईसीकार्टून ने कहा…

बहुत बढ़िया.

मुझे तो यहाँ इंग्लैंड से ज्यादा ठंढ लग रही है

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

सदी भले ही यहां 2-3 हफ़्ते की रह गई है पर त्राही त्राही करवा जाती है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कड़कते संस्मरन को पढते हुवे भी सिरहन दौड़ जाती है .. पहाड़ों की ठण्ड पूरे मैदानी इलाके को अपने होने का एहसास करा जाती है ...
नेगी जी की बहुत ही सुन्दर रचना का झलक भी दिखला दी अपने ... आपको नव वर्ष की मंगल कामनाएं ...

अशोक सलूजा ने कहा…

अच्छा लगा ...कही तो कोई ख़ुशी मना रहा है ..बच्चो के संग इस आजकल के बिगड़े माहौल में .....
शुभकामनायें!
नववर्ष की मुबारक हो !

Dr. sandhya tiwari ने कहा…

bahut sundar prastuti kavita ji

Ankur Jain ने कहा…

भोपाल में भी ऐसा ही हाल है...आपको भी नववर्ष की हार्दिक बधाई।।।

pratibha ने कहा…

ठण्ड के मासूम का सुन्दर संस्मरण ..

उड़ता पंछी ने कहा…

cool cool post !!!!!!!!!!


अपना आशीष दीजिये मेरी नयी पोस्ट

मिली नई राह !!


and wishing you a very very happy new year.

Dolly ने कहा…

आपकी भाषा शैली बहुत प्रभावपूर्ण होती है तभी मन को आपकी नई पोस्ट का बहुत बेसब्री से इंतजार रहता है............इस कड़ी में गांव की याद और फिर ठण्ड में बच्चों के हाल चाल का सुन्दर चित्रण मन को गुदगुदा गया...... बस यही दुआ है आप इसी तरह लिखती रहें....
आपको परिवार के सात नये वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!!!!!!!!

virendra sharma ने कहा…

बढ़िया बतकही रोजनामचा .आपकी सद्य टिपण्णी हमेशा हमारी धरोहर रहेगी .नव वर्ष शुभ हो शुभ संकल्प हों .

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

दिन तीन सौ पैसठ साल के,
यों ऐसे निकल गए,
मुट्ठी में बंद कुछ रेत-कण,
ज्यों कहीं फिसल गए।
कुछ आनंद, उमंग,उल्लास तो
कुछ आकुल,विकल गए।
दिन तीन सौ पैसठ साल के,
यों ऐसे निकल गए।।
शुभकामनाये और मंगलमय नववर्ष की दुआ !
इस उम्मीद और आशा के साथ कि

ऐसा होवे नए साल में,
मिले न काला कहीं दाल में,
जंगलराज ख़त्म हो जाए,
गद्हे न घूमें शेर खाल में।

दीप प्रज्वलित हो बुद्धि-ज्ञान का,
प्राबल्य विनाश हो अभिमान का,
बैठा न हो उलूक डाल-ड़ाल में,
ऐसा होवे नए साल में।

Wishing you all a very Happy & Prosperous New Year.

May the year ahead be filled Good Health, Happiness and Peace !!!

लोकेन्द्र सिंह ने कहा…

आपको भी अंग्रेजी नववर्ष की शुभकामनाएं...
इस साल का अंत बेहद दुखद था

संजय भास्‍कर ने कहा…

दिल से निकली बहुत अच्छी पोस्ट पढने को मिली
नववर्ष की आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें!

Covnitkepr1 ने कहा…

Country side looks wonderful.
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महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

श्यामला हिल्स का नजारा वाकई खूबसूरत है।
विवरण रोचक है।

आपको ओर आपके परिजनों को नव-वर्ष की शुभकामनाएं।

ओंकारनाथ मिश्र ने कहा…

बहुत सुन्दर वर्णन. लगता है श्यामला हिल्स कभी आना होगा. नव वर्ष की शुभकामना.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

बहुत खूबसूरत जगह है ... गई तो हूँ पर इसे देखा नहीं .....!!

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत रोचक आलेख...भोपाल प्रवास की यादें ताज़ा कर दीं...नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!

Satish Saxena ने कहा…

मंगल कामनाएं आपके लिए ...!!

बेनामी ने कहा…

खूब ठंडो रे ठंडो का मौसम आया ...हमारा भी यही हाल है ...
ठण्डो रे ठण्डो, मेरा पहाड़ै की हव्वा ठण्डी पाणि ठण्डो
हो हो हो हो हो, आ आ आ हो हो हो हो
ऐंच ऊंच ह्यूं हिमाल
निस्सो गंगा जी को छाल
ठण्डो - ठण्डो
छौय्यां छन छैड़ा पण्ड्यार
छन बुग्याल ढ़ालधार
ठण्डो - ठण्डो .........
गौं क़ि याद आ ग्या...उख रेंदा त बर्फ देखिक मजा आ जांदी ...
नै साल क़ि शुभकामना ..

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' ने कहा…

सुन्दर संस्मरण...बहुत बहुत बधाई...

Raju Patel ने कहा…

कविता जी -- आप की शैली कमाल की है --ठण्ड पर इतना खूबसूरत लेखन मैंने पहले नहीं पढ़ा- :)

बेनामी ने कहा…

बच्चों की छुटियाँ होती हैं लेकिन माँ-बाप नहीं ....उसमें भी कामकाजी माँ को कहाँ फुर्सत मिलती हैं की घूम फिर कर बच्चों की फरमाईश पूरी कर लें ....इस कडाके के सर्दी में घर परिवार बच्चों की बातें पढ़कर मन को बहुत अच्छा लगा ....
नए साल की आपको सपरिवार बहुत शुभकामाएं ....हमेश ऐसे ही सुन्दर लिखती रहना ...

kuldeep Singh Rana ने कहा…

Mam Aap Bhut acha Likhte ho Thanks

RAJ ने कहा…

ठंडो रे ठंडो गीत मेरे भी फेबरेट गाना है ...और आजकल तो ठण्ड में मैं भी खूब गुनगुना रहा हूँ..
बहुत शानदार, जानदार संस्मरण...
हैप्पी न्यू एअर मैंम!!

vijay ने कहा…

ठण्ड का भी अपना अलग ही आनंद हैं ..
बहुत रोचक वर्णन ...
नए साल की शुभकामनायें!!!!

Swapnil Shukla ने कहा…

very well written blog kavita ji ...congra8
wish u a very happy new year !!

plz visit :
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Meenakshi ने कहा…

मेरु गाँव म त हियुं पोरुन्द झमझमा झम.. .. और फिर त नेगी जी कु गाना ठण्डो रे ठण्डो, मेरा पहाड़ै की हव्वा ठण्डी पाणि ठण्डो होई जांदू.... भलु लागु

बेनामी ने कहा…

धाराप्रवाह लेखन और शानदार प्रस्तुतीकरण - लेकिन भोपाल में भी इतनी ठण्ड? अभी 12 दिसंबर तक तो वहां गर्मी लग रही थी

बेनामी ने कहा…

हम ही उन्हें जब-तब अपने बचपन के किस्से सुनाते हैं कि कैसे हम बचपन में जब सर्दियों में ओले गिरते तो उन्हें उल्टी छतरी में इक्कठा कर उनसे कंचे-गोली की तरह खेलने बैठ जाते! जब फर-फर कर रूई के फाहे की तरह आसमान से बर्फ गिरती तो कैसे उसकी बड़ी-बड़ी गेंद बनाकर एक दूसरे पर उछालते फिरते। जब चारों तरफ बर्फ ही बर्फ होती फिर कैसे घर, पेड़-पौधे, पहाड़ बर्फ की सफेद रजाई ओढ़े तनकर सोते नजर आते और भी बहुत से बातें चलती रहती।
बचपन के वे सुनहरे दिन कब निकल जाते हैं एक उम्र गुजर जाने के बाद पता चलता है.....बचपन जब बर्फ गिरती तो हम भी गाँव में ऐसा ही खेल खूब खेलते थे ..अब तो याद भी नहीं की ऐसा होता होगा ....

Unknown ने कहा…

Wow! Panoramic depiction of winter!!!

Unknown ने कहा…

very good!!
happy new year

http://anusamvedna.blogspot.com ने कहा…

बर्फ सी ठंडी और नर्म धूप सी गुनगुनी पोस्ट ......

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