पेट की खातिर - KAVITA RAWAT
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Sunday, May 1, 2016

पेट की खातिर


कुछ लोग भले ही शौक के लिए गाते हों, लेकिन बहुत से लोग पेट की खातिर दुनिया भर में गाते फिरते हैं।   ऐसे ही एक दिन दुर्गेलाल और उसका भाई गाते - भटकते हुए घर के द्वार पर आये तो, उनका गाना अच्छा लगा तो घर पर बिठाकर मैंने रिकॉर्डिंग की, जो आज मई दिवस पर प्रस्तुत है।     ..




12 comments:

vijay said...

मजदूर दिवस पर अच्छी सम-सामयिक प्रस्तुति है

Surya said...

supb!!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत बढिया कविता है... बधाई कविता जी.

Anil Kumar Sharma said...

बहुत अच्छी रचना है।मैं आपकी पोस्ट पढ़ता हूँ। अपने विचारों को आप सुन्दरता से अभिव्यक्त करती हैं।

Anil Kumar Sharma said...

बहुत अच्छी रचना है।मैं आपकी पोस्ट पढ़ता हूँ। अपने विचारों को आप सुन्दरता से अभिव्यक्त करती हैं।

दिगम्बर नासवा said...

बहुत सुंदर भावपूर्ण लिखा है ... मज़दूर दिवस को सार्थक किया है ... और दुर्गेलाल की रिकार्डिंग तो बहुत ही
मस्त है ... बहुत शुभकामनाएँ ....

डॉ. मोनिका शर्मा said...

भावपूर्ण ...मर्मस्पशी रचना

Jyoti Dehliwal said...

कविता जी, मजदुरों की व्यथा दर्शाती बहुत ही सुंदर रचना!

Vineeta Yashswi said...

Behtreen Recording ki hai appne... Sun ke achha laga...

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...

Unknown said...

बेहतर है।

Unknown said...

बेहतर है।