
अकेलेपन से सामंजस्य तक अस्पताल में स्वयं भर्ती होने का यह मेरा पहला अनुभव था। शुरुआती दो दिन गहरे अकेलेपन और एक अनजाने भय में बीते। चारों तरफ कोरोना पीड़ितों का कराहना, लंबी-लंबी सांसें, खांसने और उबकाई आने की आवाजें और ऑक्सीजन कंटेनरों में पानी की लगातार होती खदबुदाहट—इस माहौल ने दिन का चैन और रातों की नींद छीन ली थी। मैंने निजी कमरे (Private Room) के लिए बहुत प्रयास किया, लेकिन परिस्थितियां इतनी विकट थीं कि सामान्य वार्ड में भी जगह मिलना दूभर था। हालात की गंभीरता को देखते हुए मैंने चुपचाप समझौते में ही भलाई समझी।
वार्ड का माहौल और मानवीय स्वभाव अस्पताल में मरीजों को उनकी स्थिति के अनुसार तीन श्रेणियों में बांटा गया था—माइल्ड, मॉडरेट और सीवियर। सौभाग्य से मैं जिस वार्ड में था, वहां पहली और दूसरी श्रेणी के करीब 30-35 मरीज थे। उनमें से अधिकांश की स्थिति सामान्य थी; लोग मोबाइल पर व्यस्त थे, आपस में बतिया रहे थे और टहल रहे थे। उन्हें देखकर मुझे तसल्ली हुई और मेरा अकेलापन कम होने लगा। जब स्थिति नियंत्रण में थी, तो मैंने भी इस 'अस्पताल की दुनिया' को करीब से देखना शुरू किया।लापरवाही और तलब के अनोखे रंग बाहर की दुनिया में 'मास्क और सैनिटाइजर' को लेकर जो हिदायतें चीख-चीख कर दी जा रही थीं, अस्पताल के भीतर का नजारा उससे जुदा था। वॉशरूम में साबुन या सैनिटाइजर की कोई व्यवस्था नहीं थी, मरीज जैसे-तैसे खुद ही प्रबंध कर रहे थे। कई लोग बिना मास्क के बेफिक्र घूम रहे थे। हद तो तब हो गई जब महामारी के इस दौर में भी व्यसन की तलब हावी दिखी—एक बुजुर्ग हर सुबह टहलते हुए मुझसे 'गुटखा' पूछना नहीं भूलते, तो दूसरे महाशय बीड़ी की तलाश में भटकते रहते।
लापरवाही के बीच अपनत्व का टॉनिक इस माहौल में एक विरोधाभास भी देखने को मिला। जहां वरिष्ठ डॉक्टर्स और नर्सें पीपीई किट में पूरी मुस्तैदी से डटे थे, वहीं एक जूनियर डॉक्टर ऐसे भी थे जिन्हें मास्क तक पहनना गंवारा न था; वे सिर्फ एक जालीनुमा टोपी पहने नजर आते। उनके इस रवैये को घोर लापरवाही तो कहा जा सकता है, लेकिन मरीजों के साथ उनका व्यवहार अद्भुत था। वे हर मरीज के पास दो मिनट बैठते, मित्रवत बातें करते और मुस्कुराकर हाल-चाल पूछते। उनका यह अपनत्व भरा अंदाज किसी जीवनदायिनी टॉनिक से कम नहीं था। जब वे मेरे पास आते, तो मुझे अस्पताल में भी परिवार के किसी सदस्य की मौजूदगी का अहसास होता। काश, हर अस्पताल को ऐसे संवेदनशील डॉक्टर मिल पाते!
सह-अस्तित्व और संबल की भावना वार्ड में भोपाल से बाहर के दो बुजुर्ग भी भर्ती थे, जिनकी देखरेख उनके परिजन कर रहे थे। एक 90 वर्षीय बुजुर्ग की सेवा में उनका नाती पूरे दस दिन पूरी निष्ठा से लगा रहा और संतोष की बात रही कि वह संक्रमण से सुरक्षित रहा। मेरे ठीक सामने वाले बेड पर एक 70 वर्षीय बुजुर्ग थे, जो शुगर और चलने-फिरने की समस्या से ग्रसित थे। उनकी सेवा में उनकी वृद्ध पत्नी साथ थीं, जो दुर्भाग्यवश चार दिन बाद स्वयं संक्रमित हो गईं। हालांकि, रेमडेसिविर इंजेक्शन की मदद से वे जल्द स्वस्थ हो गईं। शहर में अनजान होने के कारण वे परेशान थे; मैंने उनकी जरूरत का सामान अपने घर से मंगवाकर दिया। इस छोटी सी मदद ने उन्हें एक अच्छे पड़ोसी का संबल दिया, जिससे मुझे असीम आत्मसंतुष्टि मिली। मोबाइल की आभासी दुनिया से दूर, उस बुजुर्ग दंपत्ति के साथ सुख-दुख साझा करते हुए मुझे अस्पताल में भी घर जैसा माहौल मिलने लगा था।
अस्पताल का एक नया नजरिया और अन्न की महत्ता शुरुआती दो दिनों की अरुचि के बाद मेरी भूख इतनी बढ़ गई कि अस्पताल की थाली कम पड़ने लगी। अक्सर जब तक मैं दोबारा भोजन मांगता, तब तक परोसने वाला दूसरे वार्ड में जा चुका होता था। जब मैं अपनी खाली थाली रखने वॉशरूम के पास जाता, तो वहां कई मरीजों की अछूती, भोजन से भरी थालियां देखकर मन खिन्न हो जाता था। अन्न की इस बर्बादी को रोकने के लिए मैंने भोजन परोसने वाले स्टाफ को सुझाव दिया कि वे हर मरीज से उसकी इच्छा और मात्रा पूछकर भोजन परोसें। मेरे इस छोटे से परामर्श से भोजन की बर्बादी रुकी, जिसने मुझे एक गहरी आंतरिक खुशी दी।
निष्कर्षअस्पताल का अनुभव हर व्यक्ति के लिए उसकी बीमारी की गंभीरता और आर्थिक स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है। यदि जेब में पैसा हो और बीमारी गंभीर न हो, तो अस्पताल भी एक स्वास्थ्य लाभ (Health Resort) लेने का जरिया बन सकता है, जहां आप योग, खान-पान और विश्राम से खुद को रीचार्ज कर सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सच यही है कि बीमारी चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हो, यदि डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ का व्यवहार मित्रवत और आत्मीय हो, तो मरीज की आधी बीमारी वहीं खत्म हो जाती है। अंततः, मानवीय संवेदना और अपनत्व के बल पर हर काली रात के बाद एक नई और उजली सुबह का आना निश्चित है।

...इनकी जुबां से कविता रावत



25 टिप्पणियां:
सच में बड़ा ही भयावह स्थिति बनी हुई है। जितना लोग कोरोना से पीड़ित नही हो रहे उतना तो मानसिक तनाव से जुझ रहे है घर में पड़े पड़े। बाकी गिलोय का सेवन तो हर कोई रहा है काफी राहत हैं इससे। बस ईश्वर से प्रार्थना है सब स्वस्थ रहे मस्त रहे।
इस बीमारी का सबसे बड़ा दर्द यही है, कि पराए तो पराए अपने भी आप से बहुत दूर होते हैं । दर्द भरा संस्मरण आखिर में आशा का संचार कर गया ।
बहुत ही प्रेरक संस्मरण. आप अपने अनुभव भी लिखें जिससे कोरोना से लड़ने में औरों को भी प्रेरणा मिले.
जी बहुत गहन लिखा है आपने। पहली बार ऐसा हुआ है जब अपने भी करीब नहीं आ सकते...।
यदि किसी भी हाॅस्पिटल में डाॅक्टर्स के साथ ही पैरामेडिकल स्टाफ का व्यवहार मित्रवत् और पारिवारिक हो तो, फिर भले ही बीमारी की प्रवृत्ति गंभीर क्यों न हो, बीमारी से जल्दी निजात मिलना तय हो जाता है और एक नई सुबह जरूर होती है।
बिल्कुल सही है, दी। डॉक्टर यदि मरीज से प्रेम से बात कर ले तो आधी बीमारी दूर हो जाती है।
मार्मिक प्रसंग का जीवंत चित्रण ।
कविताजी, इस तरह के अनुभव साझा होने चाहिए जिनमें लोगों ने कोरोना को हरा दिया। सोशल मीडिया पर तो बस नकारात्मकता ही फैली हुई है।
बहुत दिलेरी से निकाला कठिन वक़्त ।
आशा है अब पूर्ण स्वस्थ होंगे आप सब । बस ऐसा ही हौसला मन में हो तो शायद जल्दी हरा पाएँ कोरोना को ।
बहुत ही मार्मिक, पीड़ा दायक अनुभव वाला और बहुत सी जानकारियों वाला सुन्दर संस्मरण, आशा है आप सब मंगलमय जीवन में होंगे , अति सतर्क रहें अपना सब का ख्याल रखें। जय श्री राधे।
हॉस्पिटल का अनुभव साझा करने के लिए बहुत आभारी हूँ। कोरोना की दहशत मन से कम हो ये जरूरी है।
बहुत अच्छे से रोचकतापू्र्ण लिखा है आपने।
सादर।
बहुत ही मार्मिक वर्णन और साथ ही सचेत करता कि हम अभी और कितना सावधान हो सकते हैं ताकि कोरोना के बाद भी मानसिक संताप से बचे रहें---कविता जी आप अपने साथ साथ सभी का खयाल रखिए---स्वस्थ रहिए।
कविता जी , भाई साहब के शब्दों को आपने जितनी मेहनत से लिखा और पाठकों तक पहुंचाया वह काबिलेतारीफ़ है | ईश्वर का धन्यवाद कि वे कोरोना से सकुशल बाहर आये और अपने अनुभव और अनुभूतियाँ शेयर की | हॉस्पिटल में उनका सौहार्द रवैया प्रेरक है | बहुत बहुत आभार इस सार्थक लेख के लिए |
बस इतना ही पर्याप्त है कि आप लोग सकुशल निकल आयेइस बीमारी से। ईश्वर का शत शत धन्यवाद।
करोना के दर्द भरे संस्मरण को बखूबी लिखा है आपने और अच्छा किया की इसे साझा किया ...
पूर्व तैयारी की तरह है ये जरूरी है समझ लेने के लिए ... इश्वर न करे किसी को करोना हो पर फिर भी ...
आप सब स्वस्थ हो कट वापस आए हैं ... अपना ध्यान रखिये ... आप सब को बहुत बहुत शुभकामनायें हैं मेरी ...
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सार्थक संस्मरण !धन्यवाद साझा करने के लिए |
चिंतनपूर्ण सटीक चित्रण
स्वस्थ्य हो जाना बहुत बड़ी उपलब्धि है... अनुभव लेखन से दूसरे को सीख मिलती है...
वृहद विश्लेषण संग भावनात्मक, सांसारिक, बौद्धिक परिस्थितियों को बखूबी उकेरा गया ही। लेखन कौशल परिलक्षित हो रहा है।
करुण मार्मिक संस्मरण। अंतर्मन की संवेदनाएँ तो वैसे ही आजकल ढूंढे नहीं मिलती हैं। ऊपर से इस महामारी ने बच्ची खुची संवेदनाओं को भी बलिवेदी पर चढ़ दिया हो जैसे अपने अपनों से ऐसे भाग रहे हैं जिसे देखकर, सुनकर मन भर आता है। जिस समय मित्रवत व्यवहार और देखभाल व प्रेम की अति आवश्यकता है उसी वक़्त इनका गौण होना शारीरिक बीमार को मानसिक रोगी बनाने में महती भूमिका निभा रहा है। व्यवस्थाओं की पोल के बारे में तो क्या ही कहने। सारा खेल संवेदनाओं का है यदि जीवित होती तो अस्पताल और डॉक्टर्स भी पेशेंट को सिर्फ एक शरीर न समझकर इंसान समझ ट्रीट करते।🙏🙏
बड़ी हिम्मत दिखाई।
लोगों का डर जरूरी है इससे संक्रमण बढ़ने से रुकेगा।
डॉक्टर साब का व्यवहार अच्छा था मगर लापरवाही जानलेवा सिद्ध हो सकती थी। अगर वो संक्रमित हो जाते हैं तो कितने ही अन्य नॉर्मल बीमारियों वाले मरीजों को संक्रमित कर सकते हैं।
खाने की बर्बादी की रोक एक बड़ी सफलता है।
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