देखकर कोई दहला देने वाला मंजर,
हर हृदय में हाहाकार मच जाए...जरूरी तो नहीं।
देखकर कोई सुंदर मनोरम दृश्य,
हर अशांत मन को सुकून मिल जाए...
जरूरी तो नहीं।
पिघलता है उसका दिल बर्फ की मानिंद,
पर वो हर किसी के लिए पिघल जाए...
जरूरी तो नहीं।
रखता है वो फौलाद सा मजबूत जिगर,
मगर हर सितम के आगे अडिग रह जाए...
जरूरी तो नहीं।
माना कि उसकी बातों में है गहरा असर,
पर हर शख्स ही उनसे प्रभावित हो जाए...
जरूरी तो नहीं।
छिपी है उसकी गुफ्तगू में जो गहराई और सच्चाई,
वो आईने की तरह सबको साफ नजर आ जाए...
जरूरी तो नहीं।
...कविता रावत


11 टिप्पणियां:
कुछ कड़वे सच को उजागर करती रचना भाषिक बेफिक्री से की गई आत्माभिव्यक्ति, बधाई।
hamesha kee bhati ek sunder rachana .
बिल्कुल zaruri नहीं........अपने मन की स्थिति अलग-अलग होती है
ham sbko pyar krte hai
sab hme pyar kre jruri to nhi?
kavita ji bahut hi sundar abhvykti sare jeevan ka nichod aa gya hai is anuthi rchna me .
abhar
अच्छा प्रयास है कविता , शुभकामनायें । भगवत रावत जी के परिवार से तो नहीं हैं आप ?
Bahut hi sundar rachna
सबकी प्रकृति अलग अलग जो है!
हाथ के पाँचों उंगलिया ही भिन्न है !
बहुत सुन्दर रचना है
...
आभार आपका ..
मेरी नई पोस्ट लिए पधारे..
सटीक कहती अच्छी रचना
बहुत ही गजब कह दिया है अपने ...
बहुत ही सुन्दर .....
वाह - बहुत खूब
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