कड़ाके की घूप में - KAVITA RAWAT
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Thursday, April 1, 2010

कड़ाके की घूप में

मैंने देखा है अक्सर
कच्ची कलियों को चटकते हुए
कड़ाके की घूप में
कुछ कलियों को देखा है
खिलखिलाते हुए
बेमौसम में!
वे कलियाँ जो भ्रमित होकर
अपने को पूर्ण खिला
समझ बैठती है
पड़ जाती है
कुछ असामाजिक तत्वों के हाथ
उनका इस कदर खिल जाना
बन जाता है अभिशाप
दूसरी कलियों के लिए भी
फलस्वरूप वे भी
तनिक ताप से ही
मुरझाने लगती हैं
न रसयुक्त
न सुगंधयुक्त
और न आकर्षक ही बन पाती हैं
उनमें व्यर्थ का विखराव
नज़र आता है
जो न किसी के
मन भाता न रमता है
भले ही ये खिले-खिले दिखें
किन्तु बेरुखे, बेजान बन जाते हैं
एक हल्का हवा का झौंका
गुजरे जब भी पास इनके
ये पतझड़ सा गिरते हैं
फिर गिरकर
पददलित
उपेक्षित बन जाती हैं
न हार बनकर
किसी के गले में सज पाती हैं
और न कभी कहीं
पूजा के ही काम आती हैं

                -कविता रावत

32 comments:

  1. मैंने देखा है अक्सर
    कच्ची कलियों को चटकते हुए
    कड़ाके की घूप में
    कुछ कलियों को देखा है
    खिलखिलाते हुए


    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

    ReplyDelete
  2. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

    ReplyDelete
  3. "न हार बनकर
    किसी के गले में सज पाती हैं
    और न कभी कहीं
    पूजा के ही काम आती हैं"

    bahut hi sundar treeke se apni bhaavnaao ko prastut kar diya aapne.
    bahut badhiya ji,

    ReplyDelete
  4. ।कलियों को माध्यम बना कर कही गयी बात उतनी ही सच है जिसे हम यूनिवर्सल सत्य कह सकते है ।किसी को कही जाने वाली बात इस तरीके से कहना ,अलंकारिक भाषा का प्रयोग करना आजकल प्राय बंद सा ही हो चुका है।एक अलंकार होता है समासोक्ति का उल्टा यानी अन्योक्ति या अप्रस्तुत प्रशंसा |मुझे एक एतिहासिक तथ्य याद आरहा है राजा जयसिंग जब विलास में डूब गए थे राज काज में सुधि लेना बंद कर दिया था तब कवि ने प्रतीकों के माध्यम से एक पुर्जे में कविता की यह लाइन लिख कर भिजवाई थी ""नहीं पराग नहीं मधुर मधु ,नहीं विकास इही काल /अली कली ही सो विन्ध्यो ,आगे कौन हवाल ""प्रतीकों के माध्यम से रची रचना पढ़ कर सचमुच आनंदित हुआ

    ReplyDelete
  5. gahre arth ko sanjoe sunder rachana................

    ReplyDelete
  6. कलियाँ के सहारे कही है बात दूर की\

    क्यों लूटाए नूर रानी नूर की।

    ReplyDelete
  7. कुछ ऐसी ही कलियों को दिल से लगाना अगर जीवन का लक्ष्य बन जाए तो जिंदगी सफल है ....
    बहुत अच्छा लिखा है आपने ...

    ReplyDelete
  8. टूटे सुजन मनाइए जो टूटे सौ बार ।
    रहिमन फिर फिर पोहिए, टूटे मुक्ताहार ।।
    मुक्ताहार यदि टूट जाता है तो फिर-फिर उसे पोहना चाहिए, मानव मूल्यों से लगाव छूट जाता है तो फिर-फिर जोड़ना चाहिए ।

    ReplyDelete
  9. भले ही ये खिले-खिले दिखें
    किन्तु बेरुखे, बेजान बन जाते हैं
    अप्राकृतिक और अस्वाभाविक विकास, विकास नही पतन है
    बहुत गहराई तक उतरती रचना
    चीरती हुई सी दिल में उतरती है

    ReplyDelete
  10. सुन्दर प्रस्तुति...कित्ते मनोभाव आते हैं-जाते हैं...

    _________
    "शब्द-शिखर" पर सुप्रीम कोर्ट में भी महिलाओं के लिए आरक्षण

    ReplyDelete
  11. न हार बनकर
    किसी के गले में सज पाती हैं
    और न कभी कहीं
    पूजा के ही काम आती हैं

    क्या कहें कई बार लगता है यही नियति है
    बहुत खूब कितनी खूबसूरती से बिना कुछ कहें ही सब कुछ कह दिया.लाज़वाब

    ReplyDelete
  12. बहुत बड़ी बात - आपकी जो भी रचनाएँ मैंने पढ़ी है उनमें सर्वश्रेष्ठ - हार्दिक बधाई

    ReplyDelete
  13. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! दिल को छू गयी आपकी ये शानदार रचना!

    ReplyDelete
  14. ...प्रभावशाली रचना!!!

    ReplyDelete
  15. आपने अपनी कविता में प्रतीकों का अच्छा उपयोग किया है ..उसे पढने से ज्यादा सोचना बेहतर लगता है ..आभार

    ReplyDelete
  16. bahut hi gambhirta avam gaharai liyehue hai aapki yah post.ek behatareen abhivyakti.

    ReplyDelete
  17. बेहतरीन रचना ......

    ReplyDelete
  18. फिर गिरकर
    पददलित
    उपेक्षित बन जाती हैं
    न हार बनकर
    किसी के गले में सज पाती हैं
    और न कभी कहीं
    पूजा के ही काम आती हैं .
    .......बेहतरीन

    ReplyDelete
  19. वर्तमान परिवेश पर करारी चोट ।
    गहरे भाव लिए रचना ।

    ReplyDelete
  20. मैंने देखा है अक्सर
    कच्ची कलियों को चटकते हुए
    कड़ाके की घूप में
    कुछ कलियों को देखा है
    खिलखिलाते हुए
    बेमौसम में!
    in bhavo me bahut se arth nikalte he aur yathaarth ke dharatal par ekatra hokar sochane par mazboor karte he,
    वे कलियाँ जो भ्रमित होकर
    अपने को पूर्ण खिला
    समझ बैठती है
    पड़ जाती है
    कुछ असामाजिक तत्वों के हाथ ..
    sach hi to he, aur is sach ko itne naazuk andaaj me likhanaa behatreen pryaas hotaa he,
    उपेक्षित बन जाती हैं
    न हार बनकर
    किसी के गले में सज पाती हैं
    और न कभी कहीं
    पूजा के ही काम आती हैं
    bahut gahre bhaav he, yahi to shbdo ki aatmaa he jisme jeevan ke vishaya prakat hote he aour kuchh seekh de jaate he...

    ReplyDelete
  21. न हार बनकर
    किसी के गले में सज पाती हैं
    और न कभी कहीं
    पूजा के ही काम आती हैं

    यही है विडंबना .......!!

    ReplyDelete
  22. आपको पढना अच्छा लगा ! दिल को छूने वाली रचना!

    ReplyDelete
  23. बहुत अच्छी प्रतीकात्मक कविता!
    --
    कविता के अंदर जो कविता छुपी है,
    उसे समझकर सजग रहने की आवश्यकता है!

    --
    मेरे मन को भाई : ख़ुशियों की बरसात!
    मिलने का मौसम आया है!
    --
    संपादक : सरस पायस

    ReplyDelete
  24. कलियों के इस पुरातन बिम्ब मे आज की स्त्री की सामाजिक स्थिति के बारे मे बहुत कुछ कह दिया आपने ।

    ReplyDelete
  25. कविता के माध्यम से एक सन्देश देती हुई अभिव्यक्ति....अच्छी रचना के लिए बधाई

    ReplyDelete
  26. अच्छी कविता.
    सांकेतिक भाषा में बड़ी बात कहने में सफल। शरद जी ने सही लिखा कि पुराने बिंब के सहारे से आज का सफल चित्रण।

    ReplyDelete
  27. वे कलियाँ जो भ्रमित होकर
    अपने को पूर्ण खिला
    समझ बैठती है ......

    aapki kai kavitayen paDhi
    lekin ye bahut acchi lagii
    khaskar upar likhi panktiyan .....

    bhaav kuch jyada hi gahre hai
    yakinan kabil-e-daad
    kubool karen

    ReplyDelete
  28. सुन्दर! सजीव वर्णन आभार। "एकलव्य"

    ReplyDelete
  29. संयम को धारण करना और समय की चुनौती को स्वीकारना ही नियति है वर्तमान के साथ तालमेल बनाये रखना। सुन्दर रचना।

    ReplyDelete
  30. संयम को धारण करना और समय की चुनौती को स्वीकारना ही नियति है वर्तमान के साथ तालमेल बनाये रखना। सुन्दर रचना।

    ReplyDelete