जिंदगी रहती कहाँ है - KAVITA RAWAT
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Saturday, August 28, 2010

जिंदगी रहती कहाँ है















अपने वक्त पर साथ देते नहीं
यह कहते हुए हम थकते कहाँ है
ये अपने होते हैं कौन?
यह हम समझ पाते कहाँ है!

दूसरों को समझाने चले हम
अपनों को कितना समझा पाते हैं
दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं?

है पता ख़ुशी से जी ले चार दिन
पर ख़ुशी से कितने जी पाते यहां हैं!
कौन कितना साथ होगा अपने
यह हम जान पाते कहाँ हैं!

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!

                      .... कविता रावत

53 comments:

गजेन्द्र सिंह said...

मुसीबत के वक्त तो साया भी साथ छोड़ जाता है ...
अच्छी पंक्तिया है ......

http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/

kshama said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!
Ik aah ke saath kahungi,yahi sach hai..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बिलकुल सच कहा ..

अपने वक्त पर साथ देते नहीं
यह कहते हुए हम थकते कहाँ है
ये अपने होते हैं कौन?
यह हम समझ पाते कहाँ है

असल में कोई किसी का साथ नहीं देता ....अच्छी अभिव्यक्ति

राज भाटिय़ा said...

अपने ही सब से पहले धोखा देते है जी, बहुत ही सुंदर रचना, धन्यवाद

रश्मि प्रभा... said...

koi apna nahi hota , bas ek lakeer jab chahe mit jaye .......... shayad hi kabhi koi lakeer gahree hoti hai

नीरज गोस्वामी said...

दूसरों को समझाने चले हम
अपनों को कितना समझा पाते हैं
दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं?

सच्ची अच्छी बात...बेहतरीन रचना...
नीरज

संजय भास्‍कर said...

असल में कोई किसी का साथ नहीं देता ......अच्छी अभिव्यक्ति

संजय भास्‍कर said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

Unknown said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!
....Sach mein jindagi kee sachai yahi hai..
Betreen abhivyakti...

राजेश उत्‍साही said...

पढ़ चले हम भी।

रचना दीक्षित said...

दूसरों को समझाने चले हम
अपनों को कितना समझा पाते हैं
दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं?

संवेदनशील, हृदयस्पर्शी, सुंदर रचना, धन्यवाद

अनामिका की सदायें ...... said...

सब बाते कड़वी दवाई की तरह लगता है पीला दी गयी हों लेकिन हैं तो सब सच. आज खुद में झाँक कर देखेंगे.

सुंदर रचना.

ZEAL said...

.
दूसरों को समझाने चले हम
अपनों को कितना समझा पाते ...

काश इतना समझ सकते हम..

zealzen.blogspot.com
.

डा0 हेमंत कुमार ♠ Dr Hemant Kumar said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं! ----कविता जी, बहुत सुन्दर पंक्तियां--पूरा दर्शन छिपा है इस कविता में।

Asha Lata Saxena said...

संवेदना से भर पूर रचना |बधाई
आशा

वन्दना अवस्थी दुबे said...

दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं?
एकदम सही बात. सुन्दर, सार्थक रचना.

सम्वेदना के स्वर said...

सीख देती और सीखों को दोहराती कविता!! मगर हम तो जाल में उलझे फँसे सिर्फ पाठ दोहराना जानते हैं कि शिकारी आएगा ....!! बहुत अच्छी सीख!!

मनोज कुमार said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
संवेदनशील अभिव्यक्ति!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी पोस्ट रविवार २९ -०८ -२०१० को चर्चा मंच पर है ....वहाँ आपका स्वागत है ..

http://charchamanch.blogspot.com/

वाणी गीत said...

दूसरों को समझाने चले हम
अपनों को कितना समझा पाते हैं
दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं?

आत्मविवेचन का तथ्य है यह तो ..!

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी कविता।

हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित हैं।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

कविता जी की यथार्थ बयां कर्ती कविता ।

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

बहुत सुन्दर कविता| सत्य का आभास कराती|

अजय कुमार said...

यथार्थपरक और संवेदनशील रचना ।

Surendra Singh Bhamboo said...

सुन्दर सुन्दर सुन्दर बहुत सुन्दर कविता|

शोभना चौरे said...

agar itna hi smjh aa jay to kya bat hai \achhi kvita

उपेन्द्र नाथ said...

very nice poem

हरदीप सन्धु said...

अच्छी कविता.....
दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं........
सुंदर रचना........

अर्चना तिवारी said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं

.....बहुत ही सुंदर,संवेदनशील,यथार्थपरक रचना

Unknown said...

है पता ख़ुशी से जी ले चार दिन
पर ख़ुशी से कितने जी पाते यहां हैं!
कौन कितना साथ होगा अपने
यह हम जान पाते कहाँ हैं!
........बौद्धिकता की दुरुहता को नकारते हुए बड़े ही सहज किन्तु प्रभावकारी अंदाज में आपने जीवन के यथार्थ का सजीव चित्रण किया है..
पूरी रचना में जीवन के कटु अनुभव को समेटा है आपने....
आपके ब्लॉग में हिंदी साहित्य के विविध रूप और साधारण जनमानस से जुड़ते चले जाते लेखों और कविताओं का पढ़कर ऐसा लगा कि काश हम तो इतना अच्छा लिख पाते ......
धन्यवाद और आभार

शिक्षामित्र said...

जीवन का सारतत्व। आम आदमी ऐसे ही औसत जीवन गुज़ारता समाप्त हो जाता है। मानुष जनम को निरर्थक गंवाने के ख़िलाफ़ अनादि काल से सचेत किया जाता रहा है।

Akshitaa (Pakhi) said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!
...Kitti achhi bat !!

____________________
'पाखी की दुनिया' में अब सी-प्लेन में घूमने की तैयारी...

दिगम्बर नासवा said...

सच है इंसान खुद को नही पहचानता और दूसरों पर आरोप नढ़ता है ... पनो को ढूँढने के लिए खुस को बदलना ज़रूरी है ...

Urmi said...

बेहद ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने! बधाई!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!
..इस कविता का दर्शन, दर्पण दिखाता है.

mridula pradhan said...

bahut achcha.

Anupama Tripathi said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!

बहुत सुंदर-सही बात लिखी है -
बधाई .

Unknown said...

ज़िन्दगी से भरी आपकी रचना मन में उतर गई...........

धन्यवाद इस प्रस्तुति के लिए !

Asha Joglekar said...

Bahut Sunder shraddhaji.
दूसरों को समझाने चले हम
अपनों को कितना समझा पाते हैं
दूसरों को हम झांकते बहुत
पर अपने को कितना झांक पाते हैं?
saral shabdon men ja suchchaee aapne bayan kee hai kabile tareef hai.

DR.ASHOK KUMAR said...

कविता जी नमस्कार! इस रचना का प्रत्येक शब्द सच्चाई से रुबे-रु करा रहा हैँ। सोचने के लिए बाध्य किये जा रहा हैँ।बहुत ही संवेदना से भरी रचना हैँ। शुभकामनायेँ! -: VISIT MY BLOG :- गमोँ की झलक से जो डर जाते हैँ।............गजल को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकती हैँ।

SATYA said...

bahut sundar prastuti,
कृपया अपने बहुमूल्य सुझावों और टिप्पणियों से हमारा मार्गदर्शन करें:-
अकेला या अकेली

निर्मला कपिला said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!
सुन्दर सार्थक संदेश देती रचना के लिये बधाई।

Unknown said...

बिलकुल सच कहा ..

अपने वक्त पर साथ देते नहीं
यह कहते हुए हम थकते कहाँ है
ये अपने होते हैं कौन?
यह हम समझ पाते कहाँ है
..Saral shabdon men behat prabhavpurn yatharthparak rachna ke liye bahut dhanyavaad..
Apka blog behat prabhvkari laga..

Urmi said...

आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !

RAJ said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!
...yahi hi to hai jeewan saar..
bahut sundar bhavpurn prastuti..

Rohit Singh said...

कविता जी
अपने गिरेबां में झांकने की हिम्मत कौन करता है। एक उंगुली दूसरे की तरफ उठाते हैं हमारी ही तीन उंगलियां हम पर ही उठ जाती हैं। यही तो सच्चाई है। देश मे हजारों नुक्स निकालते हैं हम। पर सोचते हैं कि उसे दूर करने के लिए हमने कितना प्रयत्न किया। ये छोड़िए .जो लोग कुछ करने चले हैं हम तो उनकी राहों में भी कंकड़ बिछाने के आदी हो गए हैं। किसी की मदद तो दूर की बात है......

अभिषेक said...

Jab dil ki aawaj kalam ke sahare shabdon ka roop leti hai to aisi shandar rachnaye janm leti hai.
Bahut hi sundar abhivyakti hai.

Unknown said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!
..jeewan ka pura nichhod
behdreen abhivykati...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (30-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

मेरा मन पंछी सा said...

क्या बात कही है आपने...
बहुत ही बेहतरीन रचना है...
बहुत सुन्दर....
:-)

Kailash Sharma said...

गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!

.....यही तो जीवन का सत्य है....बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

Sweta sinha said...

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
९ सितंबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

Sudha Devrani said...

सुख-दुःख, जीना-मरना, स्वर्ग-नरक सबकुछ यहाँ
जानकर भी हम जानते कहाँ हैं
गर जिंदगी कट जाय सुकूं से तो जिंदगी
वर्ना जिंदगी रहती कहाँ हैं!
बहुत सटीक सुन्दर, सार्थक
लाजवाब सृजन