गेहूँ-चने से भरे-लदे खेतों में एक दिन - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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रविवार, 26 फ़रवरी 2023

गेहूँ-चने से भरे-लदे खेतों में एक दिन



प्रकृति की गोद में सुकून के दो पल: एक अनूठा ग्रामीण संस्मरण

बच्चों के सिर से परीक्षा का बोझ उतरा, तो उन्होंने चैन की बंसी बजाई और उनके साथ ही मैंने भी राहत की गहरी सांस ली। घर में बंद रहकर 'रटंत तोते' की तरह एक ही राग अलापने की उबाऊ दिनचर्या से मुक्ति पाने और उन्मुक्त हवा में सांस लेने का विचार मन में कौंधा। फिर क्या था! पहली फुर्सत में हम रोजमर्रा के तनाव से दूर, कुछ पल मौज-मस्ती के बहाने भोपाल से लगभग २५ किलोमीटर दूर बसे 'खुरचनी गांव' की ओर निकल पड़े।
वहां पहुंचते ही जब लहलहाते गेहूं और चने से लदे खेतों को मुस्कुराते देखा, तो बच्चे खुशी से उछल पड़े। सभी के मुरझाए चेहरों पर जो रौनक लौटी, उसे देखकर ऐसा लगा मानो जीवन में वसंत खिल गया हो। बरसों बाद खेतों में सुनहरी फसल का ऐसा मनोमुग्धकारी दृश्य देखा तो मन आत्मविभोर हो उठा। वहीं पगडंडी पर बैठकर, दो पल के लिए आंखें मूंदकर जो असीम शांति महसूस हुई, उसे शहर की अंतहीन भागदौड़ के बीच मैंने कभी नहीं पाया था।
           


डॉलर चने का स्वाद और खेतों में अठखेलियां
एक ओर गेहूं के भरे खेत मन को हर्षित कर रहे थे, तो दूसरी ओर चने की हरी-भरी, लहलहाती फसल देखकर मन ललचा उठा। हमारे कदम स्वतः ही उस ओर बढ़ गए। बच्चे तो चने के पौधों को देखते ही उन पर 'टिड्डी दल' की तरह टूट पड़े। कभी जहां छोटे दानों वाले पारंपरिक चने बोए जाते थे, वहीं अब खेतों में बड़े दानों वाले चने लहलहा रहे थे, जिन्हें आजकल लोग काबुली चने के बजाय 'डॉलर चना' कहना पसंद करते हैं।
खेत में बैठकर चने खाने का आनंद ऐसा था, मानो हमारी कोई लॉटरी लग गई हो। हम सब वहीं बैठकर किसी भूखे वानर दल की भांति त्वरित गति से चने खाने में तल्लीन हो गए। जब वहां पेट भरा, तो घर की याद आई और हमने थैले भी भरने शुरू कर दिए। कच्चे चनों से जब मन अघा गया, तो सबने मिलकर वहीं खेत में चने के होलों और गेहूं की बालियों (उम्बी) को आग में भूनकर खाया। उस सोंधे स्वाद का आनंद ही कुछ और था।



आतिथ्य सत्कार और दाल-बाटी का स्वाद
जब बच्चों के पेट में चने और उम्बी पहुंच गए, तो उन्हें पचाने की धुन सवार हुई। वे गांव के बच्चों के साथ ऐसे घुले-मिले कि कभी आम के पेड़ पर तो कभी इस खेत से उस खेत में उछल-कूद मचाने लगे। खेतों की खाक छानते हुए सब फुर्ती से गांव की बस्ती की ओर बढ़े, जहां हमारे लिए गरमा-गरम दाल-बाटी तैयार थी।
ग्रामीणों के हाथों से बनी पारंपरिक दाल-बाटी और उसके साथ ताजा-ताजा बना गुड़ मुझे हमेशा से बेहद प्रिय है। हमारी पसंद का ख्याल रखकर, गांव के आत्मीय लोग हमारे पहुंचते ही बिना कहे झटपट थाली परोस देते हैं। यह निश्छल प्रेम और आतिथ्य शहरों में दुर्लभ है।
मिट्टी से जुड़ाव और ग्रामीणों का विस्मय
खेतों की संकरी पगडंडियों के बीच प्याज की निराई-गुड़ाई करते कुछ परिचित चेहरे दिखे, तो दो घड़ी उनके पास बैठकर सुख-दुख साझा करना मन को बहुत सुहाया। थोड़ा आगे बढ़ी, तो कुछ लोगों को दरांती से गेहूं की कटाई करते देख मेरे भीतर की उत्सुकता जाग उठी। मैं भी उनसे दरांती लेकर गेहूं काटने बैठ गई। वहां काम कर रहे ग्रामीणों का अनुमान था कि शहरी चकाचौंध में रच-बस जाने के कारण मैं शायद यह सब भूल चुकी होंगी।
परंतु, जब मैंने १०-१५ मिनट तक बिना रुके लगातार गेहूं की कटाई की, तो उनका यह भ्रम पल भर में टूट गया। वे बड़े अचरज और कौतुकभरी निगाहों से मुझे देखने लगे। मेरे इस अप्रत्याशित 'कारनामे' से जहां ग्रामीणों के चेहरे खिल उठे, वहीं वर्षों बाद मिट्टी और श्रम से जुड़कर मुझे भी आंतरिक आनंद की अनुभूति हुई।



किसान: सृष्टि के सच्चे अन्नदाता
गांव जाने पर अक्सर यही मन होता है कि यहीं दो-चार दिन रुककर प्रकृति के साए में मौज-मस्ती की जाए, परंतु आधुनिक जीवन की विवशताओं के कारण यह हसरत पूरी नहीं हो पाती। एक तरफ आज के बच्चों को गांव के सीधे-सादे माहौल में ज्यादा दिन रोक कर रखना कठिन है, तो दूसरी तरफ वर्तमान शहरी माहौल को देखते हुए शहर के घर को सूना छोड़ना भी 'खतरे की घंटी' जैसा लगता है।
गांव से शहर की ओर लौटते हुए, मैं खिड़की से खेतों में व्यस्त किसानों को निहारती रही। मन में विचार आया कि यदि संपूर्ण सृष्टि के पालन का दायित्व भगवान विष्णु का है, तो धरती पर हमारे किसान भी किसी सच्चे कर्मयोगी से कम नहीं हैं। वे मिट्टी से सोना उपजाने की साधना में दिन-रात लीन रहते हैं। जो न चिलचिलाती धूप, न मूसलाधार बारिश और ना ही हाड़ कंपाने वाली ठंड की परवाह करते हैं, यदि उन्हें मानव समाज का 'सच्चा पालक' कहा जाए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
उपसंहार
यूं तो बच्चों के साथ भोपाल के आसपास समय-समय पर 'बड़ा तालाब', 'छोटा तालाब', 'शाहपुरा लेक', 'केरवा डैम', 'मनुभावन की टेकरी', 'मानव संग्रहालय', 'वन विहार' (चिड़ियाघर) और 'बिड़ला मंदिर' जैसे अनेक दर्शनीय स्थलों पर पिकनिक मनाने से शहरी तनाव से कुछ पल की राहत मिल जाती है।
तथापि, जो वास्तविक सुकून और जीवंतता प्रकृति की गोद में बसे गांव के भरे-पूरे खेत-खलिहानों और हंसते-मुस्कुराते भोले-भाले ग्रामीणों के बीच बैठकर मिलती है, उसे मैं शहर के कृत्रिम कोलाहल में कभी नहीं ढूंढ पाती। अब तो मैं यह दृढ़ता से मानने लगी हूं कि इस थका देने वाली, यांत्रिक शहरी जिंदगी में तन-मन को ताजगी और नई ऊर्जा से भरने के लिए, कुछ पल ऐसे नैसर्गिक ग्रामीण अंचलों में बिताना बेहद जरूरी है।
...कविता रावत 


 



36 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वाह, मॉल आदि जाने से कहीं अच्छा लगता है, इस तरह घूमना।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सच में ऐसे ही कभी खेत खलिहानों की सैर भी हो.....

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

शहर की थकाऊ जीवनचर्या में थोड़ा बदलाव लाने के लिए फुर्सत पर गाँवों का भ्रमण अत्यंत आवशयक भी है।

vijay ने कहा…

खेतों में भरा हो अन्न तो क्यों न भागे वहां मन!!
वाह ...हमें भी बड़ा अच्छा लगा गेहूं से भरे खेत ...और यू ट्यूब पर शिव ने परीक्षा के बाद ख़ुशी में बड़ी सुरीली बंसी बजाई है।

Harihar (विकेश कुमार बडोला) ने कहा…

आपने मेरे मन की कह भी दी और कर भी दी। बहुत ही बढ़िया लगा आपका यह संस्‍मरण पढ़कर। जय जवान जय किसान।

रचना दीक्षित ने कहा…

रोज की दिनचर्या से हटकर इस तरह की यात्रायें एक नवीन और सुखद अनुभव प्रदान करती है.

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

इस प्रकार का सैर सपाटे मनोरंजक भी है स्फूर्तिदायक भी .
latest postउड़ान
teeno kist eksath"अहम् का गुलाम "

travel ufo ने कहा…

पर शायद फोटो मोबाईल से लिये हैं । वैसे ये कम रोमांचक अनुभव नही था

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर चित्रमयी प्रस्तुति!

virendra sharma ने कहा…

बढ़िया गाँव में पहुंची हैं आप वरना अब ये भी उजाड़ पर हैं .शहर और गाँव के बीच एक दुराव घर बनाने लगा है अलबत्ता गाँव प्रकृति से जुड़ा है वहां न काम में आई पोड ठुसा है न हेड फोन .प्रकृति के रंग बिखरे पड़े हैं समेटे तो कोई .

सारिका मुकेश ने कहा…

आपने तो बचपन के उस दौर की याद दिला दी जब हम गाँव में जाकर अपनी छुट्टियाँ बिताते थे....
बहुत ही सजीव वर्णन किया है आपने, आपके साथ घूमकर आनन्द आया! बधाई और शुभकामनाएँ!

Aditi Poonam ने कहा…

बचपन याद दिला दिया आपने तो कविता जी ,
गर्मी की छुट्टियां ,नानी का घर और भी न जाने क्या-क्या .
आभार ......बचपन याद दिलाने के लिए....


mukti ने कहा…

मुझे तो गाँव-खेत देखे सात साल होने को आया है. अब, ये खेतों के दृश्य देखकर मन हो रहा है उड़कर गाँव पहुँचने का, लेकिन अभी तो ये संभव नहीं है.

Rajendra kumar ने कहा…

ग्रामीण परिवेश पर आधारित बहुत ही सुन्दर चित्रमय प्रस्तुति.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

सच,खेत खलिहानों की सैर में ही असली आनन्द है.....

SANJAY TRIPATHI ने कहा…

सचमुच बचपन में नानी के घर जाना याद आ गया.सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाई!

Dr. pratibha sowaty ने कहा…

nc :)

Satish Saxena ने कहा…

आप खुशकिस्मत हैं ...
मंगल कामनाएं !

Prashant Suhano ने कहा…

हम भी होली में गांव जाने वाले हैं..

शिवनाथ कुमार ने कहा…

शहरी जिंदगी में सुकून कहाँ ,,,
किसान सच में सच्चे पालक है
चैन की बंसी सुनकर अच्छा लगा :-)
सादर आभार !

Kailash Sharma ने कहा…

वाह! सच में इस ज़िंदगी के लिए शहरों में तरस जाते हैं..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

Arvind Mishra ने कहा…

यह हुआ आपका जोरदार जोरदार ग्राम्य पर्यटन -हमें तो यह देखकर ही आनंद आ गया

sourabh sharma ने कहा…

कांक्रीट के जंगल को ईर्ष्या से देखने की तुलना में मुझे गाँवों में लहलहाती फसल को देखना ज्यादा सुखकर लगता है। छुट्टियों की आपने सही शुरुआत की।

sourabh sharma ने कहा…

लेकिन मुझे लगता है कि ब्लागर बड़े प्रतिभाशाली लोग होते हैं और उन्हें अपने बच्चों को रट्टू तोते बनने की प्रवृति से मुक्त करना चाहिए। यह काफी मुश्किल है क्योंकि शिक्षा पद्धति तो ऐसी ही है कि कोई विकल्प नहीं है लेकिन कहीं न कहीं तो हमें शुरूआत करनी पड़ेगी।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

बहुत ही मन से लिखी मन की अनुभूतियाँ, शब्द-शब्द में गाँव की खुश्बू पाठकों को महका गई है...

RAJ ने कहा…

जो बात गाँव में है वह शहर में हो ही नहीं सकती ..पर क्या करें भागना पड़ता है शहर की ओर रोजी रोटी के लिए ...
गाँव में बीती बहुत सी यादें ताज़ी हो उठी मन में ....पढ़कर गाँव जाने का मन है ...गर्मी में तो जाते ही है ....पर तब ऐसे बात कहाँ रहती हैं ...

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

prakriti se ek chauthai bhag loot liya aapne. anand maya

Meenakshi ने कहा…

लहलहाते गेहूं और चने से भरे-लदे खेतों को मुस्कराते देखा तो सभी खुशी से उछल पड़े, सबके मुरझाये चेहरों पर खुशी छलक उठी जिसे देख मुझे लगा बसन्त खिल गया है। कई वर्ष बाद खेतों में लहलहाते गेहूं की फसल का मनोमुग्धकारी दृश्य देखा तो मन आत्मविभोर हो उठा। वहीं दो पल बैठ आंख मूंद सुकूं भरी जो राहत मिली उसे शहर की दौड़-धूप के बीच कभी महसूस नहीं कर सकी......वाह!! वाह!!!

मुझे भी ऐसा ही कुछ बार बार महसूस होता है ...आप खुशनसीब वाली हैं जो आपको गाँव जाने का मौका मिल जाता हैं यहाँ तो फुर्सत नहीं मिलती है कभी .......शिव की बंसी भी खूब पसंद आयी हैं ...

PS ने कहा…

परीक्षा का बोझ उतरने के बाद गाँव में पिकनिक .चने -गेहूं की बालियाँ भूंज कर खाना और दाल बाटी ....भरे पुरे खेतों में बच्चों के साथ पिकनिक का मजा दूना हो गया होगा ........
.आपकी लेखनी और तस्वीरों ने गाँव में रमा दिया तो आपके बेटे शिव की बंसी ने बचपन में पढ़ी सुभद्रा कुमारी चौहान की रचना याद करा दी .................
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।
ले देतीं यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।
..................................................
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।

Asha Joglekar ने कहा…

कविता जी बडा मजा आया आपके इस गांव प्रवास और खेतों का वर्णन पढ कर । छोड और उम्बी वह भी भुने हुए वाह मुंह में पान भर आया । पर किसी भी तरह मै दरांती तो नही चला पाउंगी आपकी जितनी तारीफ करूं वह थोडी है ।

Surinder ने कहा…

Very good discription nice photos. In Punjab from so many years people not cultivate $ Chane, but reading your blog I rememberd my childhood when we did same.

Thanks

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

चने के खेत देखकर बचपन की याद आ गयी ..सभी फोटो उम्दा आलेख बेहतरीन सादर

Aradhya Mishra ने कहा…

थैंक यू आंटी, मेले ब्लॉग पर आने और मुझे अपना प्यार देने के लिए, बस इस प्यार को यूँ ही बनाये रखियेगा. देखिये मैं तो आपके ब्लॉग का मेम्बर बन गया आप भी बनो...मुझे अच्छा लगेगा.

और हाँ स्पेसली खेतों में घूमने का यह प्लान बहुत अच्छा लगा.....मुझे तो नया आइडिया मिल गया .......हा---हा--हा--

Pradeep Yadav ने कहा…

lekhnee ke isharon par goan ko jee diyaa aapne aa. Kvitaa Rawat ji Sadhoo

साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे ने कहा…
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साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे ने कहा…

उत्कृष्ट यात्रा वर्णन। पूरा वर्णन पढने के बाद मैंने महसूस किया कि आपको जितना बच्चों से लगाव है उतना ही प्रकृति के साथ भी है। आजकल यह सजगता और प्रेम बहुत कम दिखाई देती है। सब अपने अपने कामों व्यस्त है। प्राकृतिक जुडाव कम रहा है।

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