गुरु महिमा: प्राचीन आदर्श और वर्तमान प्रासंगिकता - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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बुधवार, 9 जुलाई 2025

गुरु महिमा: प्राचीन आदर्श और वर्तमान प्रासंगिकता

भारतीय संस्कृति में माता-पिता के पश्चात यदि किसी का स्थान सर्वोच्च है, तो वह 'गुरु' है। प्राचीन काल में शिक्षा के केंद्र 'गुरुकुल' हुआ करते थे, जहाँ शिष्य केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सीखते थे। इतिहास साक्षी है कि चाहे धनुर्विद्या में निपुण पांडव हों, मर्यादा पुरुषोत्तम राम और उनके भाई हों, या श्री कृष्ण, गुरु नानक और महात्मा बुद्ध जैसी महान विभूतियाँ—इन सभी ने गुरु के सानिध्य में रहकर ही एक आदर्श समाज की स्थापना की।
प्रेरणा का स्रोत: गुरु और योग्य शिष्य
गुरु का आदर्श ही संसार में कुछ विशिष्ट करने की प्रेरणा देता है। कई बार शिष्य की लगन और गुरु के मार्गदर्शन का मेल इतिहास की धारा बदल देता है। उदाहरणस्वरूप:
चाणक्य और चंद्रगुप्त: एक साधारण बालक को महान सम्राट बनाकर देश का मानचित्र बदल दिया।
अरस्तु और सिकंदर: गुरु की शिक्षाओं ने ही सिकंदर के भीतर विश्व विजय का साहस भरा।
बचपन की स्मृतियाँ और बदलता दृष्टिकोण
बचपन में स्कूल की टाट-पट्टियों पर बैठकर कबीर के दोहे रटना एक अलग ही अनुभूति थी:
"गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय। 
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दिओ मिलाय॥"
उस समय हमारे लिए गुरु का अर्थ केवल 'पढ़ाने वाले शिक्षक' और उनके अनुशासन (या बेंत) के भय तक सीमित था। लेकिन जैसे-जैसे जीवन की पाठशाला में आगे बढ़े, समझ आया कि गुरु केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं होते; वे तो जीवन के हर मोड़ पर मार्गदर्शक बनकर आते हैं।
सच्चे गुरु की पहचान और संत दादू दयाल के विचार
आज की भौतिकवादी दुनिया में 'सच्चे गुरु' का मिलना दुर्लभ है। इस संदर्भ में संत दादू दयाल की पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं:
“झूठे, अंधे गुरु घणैं, बंधे विषै विकार। 
दादू साचा गुरु मिलै, सनमुख सिरजनहार॥”
संसार में आडंबरपूर्ण और विकारों में लिप्त गुरुओं की कमी नहीं है, किंतु यदि कोई निष्कपट और सच्चा मार्गदर्शक मिल जाए, तो मान लेना चाहिए कि साक्षात ईश्वर की प्राप्ति हो गई।
शिष्य की पात्रता: ज्ञान प्राप्ति की अनिवार्य शर्त
केवल गुरु का महान होना पर्याप्त नहीं है, शिष्य के भीतर भी ज्ञान ग्रहण करने की 'पात्रता' होनी चाहिए। दादू दयाल एक सुंदर दृष्टांत देते हैं:
“दादू वैद बिचारा क्या करै, जै रोगी रहे न साच। 
मीठा खारा चरपरा, मांगै मेरा वाछ॥”
अर्थात, यदि रोगी चिकित्सक के निर्देशों का पालन न करे और केवल अपनी जीभ के स्वाद (विषय-विकार) के पीछे भागे, तो उत्तम से उत्तम औषधि भी निष्प्रभावी हो जाती है। ठीक वैसे ही, जब तक शिष्य के मन में संयम और सीखने की ललक नहीं होगी, गुरु का ज्ञान उसके भीतर नहीं उतर पाएगा।
सर्वव्यापी गुरुत्व: जड़-चेतन से सीख
लेख का सबसे मर्मस्पर्शी हिस्सा वह है जहाँ गुरुत्व को व्यापक दृष्टिकोण से देखा गया है। दादू दयाल कहते हैं:
“दादू सब ही गुरु किये, पसु पंखी बनराइ। 
तीन लोक गुण पंच सूं, सब ही माहिं खुदाइ॥”
जीवन के गहरे चिंतन के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर केवल मनुष्यों में नहीं, बल्कि पशु-पक्षी और प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है। यदि सीखने की दृष्टि हो, तो प्रकृति का हर अवयव हमारा गुरु बन सकता है। अंततः, पांच तत्वों से निर्मित यह संसार और इसमें समाहित ईश्वर ही हमारे सबसे बड़े शिक्षक हैं।निष्कर्ष: यह लेख हमें यह सीखने की प्रेरणा देता है कि हम केवल बाहरी गुरु की खोज न करें, बल्कि स्वयं को एक सुपात्र शिष्य के रूप में ढालें और प्रकृति के हर स्वरूप से सीखने का गुण विकसित करें।
...कविता रावत


55 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

अच्छा आर्टिकल कविता जी,गुरु के बगैर ज्ञान का सार समझना बेहद मुश्किल है।

साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे ने कहा…

गुरु के प्रति सबके मन में श्रद्धा भाव होते हैं और वहीं श्रद्धा भाव आपके लेख में झलक रहे हैं। गुरु गुरु होता है उसमें छोटे-बडे की बात नहीं। आस-पास का सारा माहौल गुरु की जगह ले लेता है यह आपका कहना गुरु की परिधि को व्यापक कर रहा है।

vijay ने कहा…

दादू’ सब ही गुरु किये, पसु पंखी बनराइ।
तीन लोक गुण पंच सूं, सब ही माहिं खुदाइ।।
सौ फीसदी सही कहना है संत दादू दयाल जी का ..जब सब में इश्वर विद्यमान है तो फिर कोई एक गुरु कैसे हो सकता है ...........गुरु पर्व पर सार्थक लेख ..बधाई!!!

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

बहुत बढ़िया लेख कविता जी...
दादू वैद बिचारा क्या करै, जै रोगी रहे न साच।
मीठा खारा चरपरा, मांगै मेरा वाछ।।

बेहद सार्थक और रोचक..
अनु

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

बढ़िया विचार , आज जो परिस्थितियाँ विद्यमान है ऊसके लिए अकेला गुरु या शिष्य नहीं अपितु पूरा समाज जिम्मेदार है !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ज्ञानवान गुरु ही ज्ञान का प्रकाश दे सकता है .... सार्थक लेख ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सीख तो सबसे ही मिल जाती है, गुरु गहरा ज्ञान बताता है..

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…


बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति
latest post क्या अर्पण करूँ !

Unknown ने कहा…

दादू वैद बिचारा क्या करै, जै रोगी रहे न साच।
मीठा खारा चरपरा, मांगै मेरा वाछ।।
दादू एकदम सही कहते हैं ....बहुत अच्छा लिखा है .............

kshama ने कहा…

Aapne shat pratishat sahi baat kahi...characharme eeshwar widyamaan hai....!

Maheshwari kaneri ने कहा…

गुरु ही ज्ञान का प्रकाश दे सकता है ..बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति ...

ललित शर्मा ने कहा…

संत कवि दादू दयाल आज भी प्रासंगिक है, उन्होंने समाज को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

मैंने अंत में यही जाना कि तीनों लोक पांच तत्वों से बने हैं तथा सभी में ईश्वर का निवास है।


सही कहा कविता जी इश्वर तो भीतर ही मौजूद होता है ......

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

संग्रहणीय आलेख
बहुत सुंदर


मेरी कोशिश होती है कि टीवी की दुनिया की असल तस्वीर आपके सामने रहे। मेरे ब्लाग TV स्टेशन पर जरूर पढिए।
MEDIA : अब तो हद हो गई !
http://tvstationlive.blogspot.in/2013/07/media.html#comment-form

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

नि‍तांत सात्‍वि‍क. धन्‍यवाद.

बेनामी ने कहा…

सुंदर, सार्थक प्रस्तुति

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत उम्दा,सुंदर सार्थक आलेख,,,

RECENT POST : अभी भी आशा है,

संजय भास्‍कर ने कहा…

संग्रहणीय आलेख
............दादू एकदम सही कहते हैं ..!!!

Jyoti khare ने कहा…

जीवन में गुरु का महत्त्व दर्शाता सार्थक और विचारपरक आलेख
उत्कृष्ट प्रस्तुति
बधाई


आग्रह है
केक्ट्स में तभी तो खिलेंगे--------

ओंकारनाथ मिश्र ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपका लेख पढकर और दादू की ज्ञान की बातें पढकर. मेरे गाँव में एक योगी हुआ करते थे करीब डेढ़ सौ साल पहले. उनका नाम लक्ष्मीनाथ गोसाईं था . उनका लिखा गुरु पर भजन भी मुझे याद रहा है. यह भजन आज भी मेरे गाँव में हर कीर्तन के प्रारम्भ में गाया जाता है-


प्रथम देव गुरु देव जगत में, और ना दूजो देवा ।
गुरू पूजे सब देवन पूजे, गुरू सेवा सब सेवा ।। ध्रुव ।।
गुरू ईष्ट गुरू मंत्र देवता, गुरू सकल उपचारा ।
गुरू मंत्र गुरू तंत्र गुरू हैं, गुरू सकल संसारा ।। १ ।।
गुरू आवाहन ध्यान गुरू हैं, गुरू पंच विधि पुजा ।
गुरू पद हव्य कव्य गुरू पावक, सकल वेद गुरू दुजा ।। २ ।।
गुरू होता गुरू पार ब्रह्म, गुरू भागवत ईशा ।
गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु सदाशिव, इंद्र वरुण दिग्धीशा ।। ३।।
बिनु गुरू जप तप दान व्यर्थ व्रत, तीरथ फ़ल नहिं दाता ।
"लक्ष्मीपति" नहिं सिध्द गुरू बिनु, वृथा जीव जग जाता ।। ४।।

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

कल 21/07/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और सार्थक रचना..
:-)

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

अर्थपूर्ण बात कही....

अरुन अनन्त ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (21 -07-2013) के चर्चा मंच -1313 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

ashokkhachar56@gmail.com ने कहा…

बहुत बहुत सुंदर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
साझा करने के लिए शुक्रिया!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

‘दादू’ सब ही गुरु किये, पसु पंखी बनराइ।
तीन लोक गुण पंच सूं, सब ही माहिं खुदाइ।।

दादू जी ने बस एक ही दोहे से सब कुछ बता दिया .. जीवन का सार जैसे कुछ शब्दों में उड़ेल दिया ...
कई बार संत इतनी आसानी से सहज ही इतना कुछ कह जाते हैं जो इन्सान चाहे तो संजीवनी बन सकता है ... आपका आभार इस पोस्ट के लिए ...

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

गुरू की महिमा समुद्र की तरह गहरी है।

राज चौहान ने कहा…

दादू वैद बिचारा क्या करै, जै रोगी रहे न साच।
मीठा खारा चरपरा, मांगै मेरा वाछ।।

बेहद सार्थक और रोचक..

अभिमन्‍यु भारद्वाज ने कहा…

बहुत सुन्‍दर लेख
नईपोस्‍ट
Without the internet, now Use your Favorites websites अ‍ब इन्‍टरनेट बिना भी प्रयोग कीजिये अपनी मनपसंद बेबसाइट

Dr ajay yadav ने कहा…

आदरणीया मैम ,
बहुत ही सुंदर रचना |
अच्छे शिक्षकों के प्रभाव की लहरे अनंत होती हैं |
वास्तव में जबब तक शिष्य की पात्रता नही होती ,गुरु का ज्ञान धारण नही कर सकता |
कुछ वर्ष पहले मैंने अपनी शिक्षिका के लिए अपने भाव व्यक्त किये थे ...आपको अच्छे लगेंगे लिंक दे रहा हूँ -
http://drakyadav.blogspot.in/2012/11/blog-post_16.html

Vinod Singh Jethuri ने कहा…

सुन्दर लेख ....

बेनामी ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

Darshan jangra ने कहा…

बहुत बहुत सुंदर

के. सी. मईड़ा ने कहा…

गुरु के प्रति सुन्दर विचार....
सही का आपने जाने अजाने में ही सही परन्तु
प्रकृति भी बहुत बार हमारे लिए गुरु की भुमिका निभाती रहती है ।

PS ने कहा…

झूठे, अंधे गुरु घणैं, बंधे विषै विकार।
....आज की गुरुओं का तो यही हाल है ..

Harihar (विकेश कुमार बडोला) ने कहा…

अच्‍छा लेख।

Neeraj Neer ने कहा…

जाके गुरु अंधला , चेला खड़ा निगंध
अंधे अँधा ठेल्या दोनों कूप पडंध।।

अनुपमा पाठक ने कहा…

‘दादू’ सब ही गुरु किये, पसु पंखी बनराइ।
तीन लोक गुण पंच सूं, सब ही माहिं खुदाइ।।

यही होना चाहिए... यही सत्य है!
सारगर्भित आलेख!

शिवनाथ कुमार ने कहा…

झूठे, अंधे गुरु घणैं, बंधे विषै विकार।
दादू साचा गुरु मिलै, सनमुख सिरजनहार।

सच ही है यदि सच्चा गुरु मिल जाए तो जीवन की नैया बड़ी सुगमता से
हर परिस्थिति को झेलते हुए आगे बढती है और किनारे भी लगती है

सादर!

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

सामयिक ,ज्ञानवर्धक लेख। गुरु पूर्णिमा पर गुरु जी पुण्य स्मरण।

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

सामयिक ,ज्ञानवर्धक लेख। गुरु पूर्णिमा पर गुरु जी पुण्य स्मरण।

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत सुन्दर लेख.....

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बढ़िया पोस्ट।

'एकलव्य' ने कहा…

अतिसुन्दर रचना! जीवन को एक नया आयाम देती हुई।

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 14 जुलाई 2022 को लिंक की जाएगी ....

http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

!

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 14 जुलाई 2022 को लिंक की जाएगी ....

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पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

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बलराम ने कहा…

ये सच है आजकल सच्‍चा गुरू मिलने का मतलब भगवान का मिलना है

मन की वीणा ने कहा…

गुरु पूर्णिमा पर दादु के विचारों का समर्थन करता सुंदर सटीक लेख।

जिज्ञासा सिंह ने कहा…

गुरु को महत्ता को परिभाषित करती सुंदर पोस्ट । बहुत शुभकामनाएं ।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

गुरु की महत्ता दर्शाता बहुत सुंदर लेख,कविता दी।

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

गुरु तो ज्ञान देता ही है लेकिन शिष्य के अंदर भी पात्रता होनी चाहिए। बिल्कुल सच। मैं साँभर नामक उसी कस्बे का निवासी हूँ जहाँ संत दादू जी ने अपने जीवन का एक बड़ा भाग बिताया था। वहाँ उस महान संत एवं विचारक की स्मृति का प्रतीक 'दादू दुआरा' आज भी है।

Sudha Devrani ने कहा…

दादू’ सब ही गुरु किये, पसु पंखी बनराइ।
तीन लोक गुण पंच सूं, सब ही माहिं खुदाइ।।
मैं भी यही मानती हूँ प्रकृति और प्रकृति में उपस्थित सभी प्राणी ईश्वर के अंश है हमें जब जिस जानकारी की जरूरत होती है प्रभु किसी न किसी रूप में सीख देते हैं हम प्रकृति एवं प्राणिमात्र में ईश्वरीय शक्ति देखें तो सब गुरू रूप में हमारे समक्ष हमें ज्ञान देते हैं...इसके अलावा आजकल सद्गुरु मिलना मुश्किल है।
बहुत ही सारगर्भित लेख।

डॉ 0 विभा नायक ने कहा…

आज के समय के हिसाब से बहुत ही सारगर्भित
लेख। बधाई और शुभकामनाएँ 🌷🌷🙏

Meena sharma ने कहा…

सार्थक एवं सारगर्भित, संत दादूदयाल के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी एवं गुरू का महत्त्व स्पष्ट करता हुआ महत्त्वपूर्ण आलेख ।

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