बारिश की बूँदों के साथ प्रकृति के सुंदर निखार और उमंग को व्यक्त करता एक बेहद खूबसूरत वर्षा गीत — "रिमझिम बरखा की रुनझुन में"
रिमझिम बरखा की रुनझुन में, नया राग जागा रे,
आई बरखा की ऋतु सुंदर, चहुँओर मगन मन भागा रे!
छलक पड़ा आकाश का गागर, बरसें शीतल बूँदें,
प्यासी धरती के अँगना में, मल्हार सुनावें बूँदें!
रिमझिम बरखा की रुनझुन में...
बड़ी उदास थी जो रे धरती, ओढ़ी हरी चुनरिया,
गगन झुका धरती को छूने, छाई मधुर उमंगिया।
बादल ने जब ढोल बजाया, बिजली चम-चम चमकी,
पूरब की इस ठंडी हवा में, हर एक कलियाँ महकीं!
रिमझिम बरखा की रुनझुन में...
नीम तले गुड़हल और बेला, मुस्काए ले अंगड़ाई,
सौंधी-सौंधी मिट्टी महकी, भूली यादें लौट आईं।
छोटे-छोटे पौधे जागे, जियरा मोर हुलासा,
देखो वन में मोर नाचे, जागा मन का बिस्वासा!
रिमझिम बरखा की रुनझुन में...
आषाढ़ मास की पहली बूँदिया, नस-नस चेतना लाई,
सोई हुई इस सगरी सृष्टि को, पल में जगाने आई।
हँस पड़ा कुदरत का कोना, सुंदर सपने जागे,
मन के सूखे इस अँगना में, प्रीत के अंकुर जागे!
रिमझिम बरखा की रुनझुन में...
... कविता रावत

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