'झ' से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1) - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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बुधवार, 5 अगस्त 2026

'झ' से शुरू होने वाले हिंदी मुहावरों की कविता (भाग-1)

जीवन की इस आपाधापी में, कैसा यह फैला जाल है,
कोई झाँसा देता पग-पग पर, कोई होता बेहाल है।

चतुर यहाँ झपट्टा मार कर, सब कुछ झटक लेते हैं,
भोले-भाले लोग हमेशा, झाँसे में आ जाते हैं।

जब उम्मीदों पर झाड़ू फिरती, तब होश ठिकाने आता है,
जो झूठ के पुल बाँध रहा था, वह झेंप खड़ा रह जाता है।

तब अपनी ही नादानी पर, मन ही मन झख मारते हैं,
जो बैठे थे भाग्य भरोसे, वो झक मारकर हारते हैं।

पर वक्त जब देता है झटका, सोया इंसान जागता है,
छोड़ झमेलों में पड़ना वो, सच की राह पर भागता है।

जो सहकर भी संभल गया, उसने ही इतिहास रचा, 
मेहनत की हरी झण्डी दिखाकर, बाधाओं को दूर किया।

...कविता रावत 

3 टिप्‍पणियां:

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 06 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....

http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर

Anita ने कहा…

वाह!! आपकी सृजन क्षमता अनोखी है, मुहावरों का सुंदर प्रयोग!!

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