सतपुड़ा की रानी 'पचमढ़ी' की गोद में: एक अविस्मरणीय संस्मरण - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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शनिवार, 7 जून 2014

सतपुड़ा की रानी 'पचमढ़ी' की गोद में: एक अविस्मरणीय संस्मरण



जब जेठ-आषाढ़ की प्रचंड तपन से धधकती हवा 'लू' का रूप धारण कर बहने लगी और सूरज के रौद्र रूप से न केवल पशु-पक्षी, बल्कि समूचा वातावरण 'सांय-सांय' कर अपनी आकुलता व्यक्त करने लगा, तब सहसा जयशंकर प्रसाद जी की पंक्तियाँ याद आ आईं—
"किरण नहीं, ये पावक के कण, जगती-तल पर गिरते हैं।"
     लू के थपेड़ों से जब तन-मन व्याकुल हो उठा, तो मन अचेतन रूप से पहाड़ों की शीतलता की ओर भागने लगा। सौभाग्यवश, इसी दौरान कार्यालय की ओर से पचमढ़ी में आयोजित तीन दिवसीय 'कार्यालय प्रबंधन प्रशिक्षण' में भाग लेने का सुअवसर मिला। प्रचंड गर्मी से झुलसे तन-मन में पचमढ़ी हिल स्टेशन के नैसर्गिक सौंदर्य को निहारने की तीव्र उत्कण्ठा जग उठी।
हरियाली के आँचल में प्रवेश
     गर्मियों के प्रकोप से राहत पाने की आतुरता में, मैं अपने 19  सहकर्मियों के साथ उत्साह और उमंग से भरकर बस द्वारा 'सतपुड़ा की रानी' पचमढ़ी के लिए रवाना हुई। भोपाल से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पचमढ़ी, सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के सुंदर पठारों से घिरी एक अनुपम स्थली है।
     लगभग चार घंटे की तपती-उबलती यात्रा के बाद, जैसे ही हमारी बस पिपरिया से सर्पाकार पहाड़ी घाटियों की ओर बढ़ी, गर्मी का स्थान शीतल हवा के सुखद झोंकों ने ले लिया। मन मयूर होकर नाच उठा। हमारी आँखें चारों ओर फैली शस्य-श्यामला और हरे-भरे साल-सागौन, देवदार, नीलगिरि, गुलमोहर तथा दुर्लभ पेड़-पौधों की मनमोहक दृश्यावली में डूबने-उतरने लगीं। घनी झाड़ियों, लताओं और उत्तुंग वृक्षों के रूप में प्रकृति की इस भव्यता को देखकर प्रसाद जी की ये पंक्तियाँ साकार हो उठीं—
"मांसल सी आज हुई थी, हिमवती प्रकृति पाषाणी।"
पचमढ़ी में प्रथम संध्या
     पचमढ़ी पहुँचते ही उसकी नैसर्गिक सुंदरता और असीम शांति में डूबकर हमारी पूरी थकान पल भर में काफूर हो गई। यद्यपि पचमढ़ी में ठहरने के लिए टूरिस्ट बंगले, हॉलिडे होम्स, कॉटेज और रिसॉर्ट्स की भरमार है, किंतु हमारे लिए कार्यालय की ओर से 'पंचायत गेस्ट हाउस' में ठहरने व भोजन की उत्तम व्यवस्था की गई थी।
     संध्या समय हम पचमढ़ी के बाजार की सैर पर निकले। यहाँ की सुव्यवस्थित, स्वच्छ और पॉलिथीन-मुक्त व्यवस्था देखकर किसी भी शहरवासी को बहुत कुछ सीखने की प्रेरणा मिलती है। हमारे प्रशिक्षण का समय प्रातः ९:०० से अपराह्न ३:०० बजे तक निर्धारित था। अतः सभी सहकर्मियों ने विचार-विमर्श कर प्रशिक्षण के उपरांत पांडव गुफाएँ, धूपगढ़, बी-फॉल्स, अप्सरा फॉल, रजत प्रपात, जटाशंकर, हांडी खोह और राजेंद्र गिरि जैसे दर्शनीय स्थलों को खंगालने की रूपरेखा बनाई।
 प्रातःकालीन भ्रमण और इतिहास की झलक
    ग्रीष्मकाल में स्वास्थ्य और ऊर्जा बनाए रखने के लिए प्रातःकालीन शुद्ध वायु में योग व भ्रमण अत्यंत लाभकारी माना जाता है; और यदि स्थान कोई हिल स्टेशन हो, तो मानो कुबेर का खजाना ही हाथ लग गया हो! इसी सोच के साथ, अगले दिन प्रातः ५: बजे मैं सघन वन-गलियारों और घाटियों की सुरम्य दृश्यावली का आनंद लेने निकल पड़ी।
     एक ओर जहाँ सैनिकों का अभ्यासरत दस्ता दिखाई दिया, वहीं दूसरी ओर हरियाली से आच्छादित राजभवन और कलेक्टर बंगले का दृश्य अत्यंत सुहावना लग रहा था। अतीत में ग्रीष्मकाल के दौरान पूरा मंत्रिमंडल और उच्च प्रशासनिक अमला इसी आरोग्य धाम से सरकार का संचालन किया करता था। नगरों के दूषित पर्यावरण से दूर यहाँ की विशुद्ध वायु और शांत वातावरण ने मन को नवचेतना से भर दिया।
बी-फॉल्स का आनंद और धूपगढ़ का विहंगम सूर्यास्त
     प्रथम दिन का प्रशिक्षण समाप्त होते ही, अपराह्न ३: बजे हम जिप्सी से 'बी-फॉल्स' और 'धूपगढ़' की ओर प्रस्थान कर गए। घने वृक्षों के मध्य से गुजरती सड़कों के दोनों ओर पसरी हरियाली, पक्षियों का कलकल-छलछल कलरव और वन्यजीवों की क्रीड़ा देखकर मन अभी तृप्त भी न हुआ था कि पहाड़ों से फूटते निर्मल जलप्रपात ने ध्यान खींच लिया। अनायास ही भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियाँ मुखरित हो उठीं—
"नव उज्ज्वल जलधार, हार हीरक-सी सोहती।"
ऊँचाई से गिरती बी-फॉल्स की शीतल फुहारों ने शहर की ऊब और तपन को एक ही क्षण में मिटाकर ताजगी का संचार कर दिया।
     इसके पश्चात, हम सूर्यास्त का अनुपम दृश्य देखने सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी 'धूपगढ़' पहुँचे। चोटी पर एकाग्रचित्त होकर दूर छोटी-छोटी पहाड़ियों और बादलों की ओट में सूरज को धीरे-धीरे विलीन होते देखना एक अलौकिक और अविस्मरणीय अनुभव था।
शिव-दर्शन और हांडी खोह का रोमांच
     दूसरे दिन प्रातः काल सर्वप्रथम हमें योग का अभ्यास कराया गया, तत्पश्चात भ्रमण योजना के अनुसार प्रशिक्षण सत्र को समय से पूर्व पूर्ण किया गया। भोजनोपरांत हम गुप्त महादेव, बड़ा महादेव, हांडी खोह और पांडव गुफाओं के दर्शन के लिए निकल पड़े।
     पवित्र गुप्त महादेव की संकरी एवं पतली गुफा में हम तिरछे होकर, सरकते हुए दर्शन हेतु प्रविष्ट हुए। इसके बाद बंदरों और लंगूरों की उछलकूद देखते हुए हम बड़ा महादेव की विशाल गुफा की ओर बढ़े। गुफा के भीतर निरंतर टपकती जल-बूँदों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भगवान शिव की जटाओं से स्वयं माँ गंगा प्रवाहित हो रही हों।
     इसके पश्चात हम हांडी खोह पहुँचे। वहाँ बने रेलिंग प्लेटफॉर्म से एक ओर जहाँ घाटी का विहंगम दृश्य मन मोह रहा था, वहीं दूसरी ओर घने जंगलों से ढकी खाई के बीच बहते झरनों की मधुर ध्वनि कानों में मिठास घोल रही थी। यहाँ एक तरफ उत्तुंग वृक्षों से आच्छादित पहाड़ियों का रोमांच था, तो दूसरी तरफ लगभग ३०० फीट गहरी भयानक खाई, जो किसी सुरसा की भांति अपना मुख खोले खड़ी प्रतीत होती थी।
पांडव गुफाएँ और प्रकृति का काव्य
     यहाँ से आगे बढ़ते हुए हम उस स्थान पर पहुँचे जिसके नाम पर इस हिल स्टेशन का नाम 'पचमढ़ी' पड़ा—पांडव गुफाएँ। यहाँ पाँच गुफानुमा कुटियों को प्रत्यक्ष देखना एक सुखद आश्चर्य था। यह सोचकर अचरज होता है कि वनवास काल के दौरान भीमकाय पांडव, विशेषकर अपार बलशाली भीम, इन संकीर्ण गुफाओं में कैसे रहे होंगे!
     गुफाओं के नीचे तलहटी में स्थित सुंदर उद्यान को देखकर मन आल्हादित हो उठा और मैंने अपने मोबाइल कैमरे में अनेक चित्र कैद किए। फूलों और फलों से लदे वृक्ष वातावरण को अपनी सुवास से महका रहे थे। मखमली बासंती हवा और पुष्प-पराग में पर्यावरण के समस्त विकारों को हरने की अद्भुत क्षमता निहित है। इसी सौंदर्य से अभिभूत होकर वैदिक ऋषियों ने प्रकृति को ईश्वर का काव्य कहा है—
"पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति।"
(अर्थात: ईश्वर के इस महाकाव्य को देखो, जो न कभी मरता है और न ही कभी पुराना (जीर्ण) होता है।)
अमिट स्मृतियों के साथ विदाई
     तीसरे एवं अंतिम दिन, प्रशिक्षण की समाप्ति के पश्चात, हमने शेष रह गए दर्शनीय स्थलों को अगली यात्रा के लिए सुरक्षित रखते हुए, भारी मन से सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी से विदाई ली और घर की राह पकड़ी।
     वापसी के पूरे मार्ग में प्रकृति के इस अनन्त और असीम सौंदर्य में मन डूबता-उतरता रहा। पचमढ़ी की वह शांति, शीतल बयार और हरियाली सदैव हमारी स्मृतियों में जीवंत रहेगी।  
... कविता रावत
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http://epaper.aajsamaaj.com/indexaajsamaj.php?pagedate=2016-7-8&edcode=71&subcode=71&mod=1&pgnum=2

31 टिप्‍पणियां:

RAJ ने कहा…

किरण नहीं, ये पावक के कण, जगती-तल पर गिरते हैं।"
ऐसे ही हाल बेहाल हैं गर्मी के मारे .......
हमारे मध्य प्रदेश के एकमात्र खूबसूरत हिल स्टेशन का उतनी ही खूबसूरती से सुन्दर यात्रा वृतांत पढ़कर मन को बड़ी ठंडक पहुंची ...........हमारा जाना हर साल लगा रहता हैं काश कि हम भी बता पाते देश दुनिया को ....

आशीष अवस्थी ने कहा…

बढ़िया व सुन्दर प्रस्तुति , आदरणीय धन्यवाद !
ब्लॉग के लोगो को स्थान देने हेतु आपको बहुत-बहुत धन्यवाद !
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समय चक्र ने कहा…

बहुत सुन्दर यात्रा विवरण अब तो देखना पडेगा आभार

Ritesh Gupta ने कहा…

बहुत सुन्दर यात्रा विवरण ....पढ़कर अपनी पूर्व में की गयी यात्रा की स्मृतियाँ ताज़ी हो गयी....

सफ़र है सुहाना...
www.safarhainsuhana.blogspot.in

vijay ने कहा…

गर्मी में तो लगता है पचमढ़ी घूमने गए तो फिर गर्मी भर रहो सुकून से लेकिन ऐसा संभव नहीं होता घर गृहस्थी जो चलानी होती है...... हमारा हर साल दो-चार गर्मी में घूमने का प्लान बन ही जाता है ... दो दिन बाद ५ दिन हम भी घूम फिर लेंगे ......
बहुत सुन्दर फोटो और वर्णन पढ़कर अभी से घूमने की मन हो रहा है .........
ऑफिस की ट्रेनिंग के बहाने घूमने का इससे अच्छा प्लान कुछ और हो ही नहीं सकता ...खुशकिस्मत हो ....

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

गर्मी में ठंडक का अहसास करा गयी ये पोस्ट :)

आचार्य ललित मुनि ने कहा…

प्रकृति के समीप पहुंच कर मुझे लगता है कि अपने नैसर्गिक आवास में पहुंच गया। जंगल मुझे हमेशा अपनी ओर खींचता है और जब भी मन करता है भाग कर उसके समीप पहुंच जाता हूँ और अपने को आल्हादित पाता हूँ। सुंदर चित्रों के साथ पचमढी यात्रा की रिपोर्ट के लिए आभार।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

किरण नहीं, ये पावक के कण, जगती-तल पर गिरते हैं।"
भीषण गर्मी से सभी त्रस्त हैं ... ऐसे में पचमढ़ी के मोहक, शीतल मनोरम दृश्यों से कुछ को तपन का एहसास कम हो रहा है ... वैसे भी प्राकृति की निकटता शीतल होती है ... रोचक यात्रा वर्णन ने सोने पे सुहागे का काम किया है ...

Kailash Sharma ने कहा…

पचमढ़ी एक बहुत सुन्दर हिल स्टेशन है जहाँ का मौसम खुशगवार और देखने को बहुत कुछ है...बहुत सुन्दर और रोचक यात्रा वृतांत....

Unknown ने कहा…

पचमढ़ी का बहुत सुन्दर चित्रण ..

Himkar Shyam ने कहा…

खूबसूरत चित्रों से सुसज्जित सुंदर यात्रा वृतांत...

ZEAL ने कहा…

Beautiful description.

Ankur Jain ने कहा…

मध्यप्रदेश को कुदरत ने यदि कोई बरकत बख्शी है तो वो पचमढ़ी ही है...उम्दा प्रस्तुति।।।

Vaanbhatt ने कहा…

रोचक यात्रा वृतान्त...

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

अत्यन्त मधुरित करता यात्रा वृतान्त।

संजय भास्‍कर ने कहा…

खूबसूरत चित्रों से सुसज्जित सुंदर रोचक यात्रा वर्णन

Surya ने कहा…

घने वृक्षों के बीच निकली सड़क के चारों ओर फैली हरियाली, पक्षियों का कलरव, वन्य जन्तुओं की क्रीड़ा देख अभी मन अतृप्त था कि पहाड़ों से फूटते स्वच्छ निर्मल जल स्रोत ने बरबस ही ध्यान आकर्षित किया तो मुंह से भारतेन्दु जी के पंक्ति फूट पड़ी- "नव उज्ज्वल जलधार, हार हीरक-सी सोहती।" ऊँचाई से गिरते बी फाॅल की ठण्डी-ठण्डी फुहारों ने पल भर में शहर की उबासी भरी तपन को निकाल बाहर कर ताजगी भर दी।
............................................... वाह! बहुत खूब.. बहुत खूब! इस भयंकर गर्मी में कम से कुछ राहत महसूस हुयी ...........प्रकृति चित्रण लाजवाब करती हैं आप ....मन आनंदित हो जाता है

Surya ने कहा…

घने वृक्षों के बीच निकली सड़क के चारों ओर फैली हरियाली, पक्षियों का कलरव, वन्य जन्तुओं की क्रीड़ा देख अभी मन अतृप्त था कि पहाड़ों से फूटते स्वच्छ निर्मल जल स्रोत ने बरबस ही ध्यान आकर्षित किया तो मुंह से भारतेन्दु जी के पंक्ति फूट पड़ी- "नव उज्ज्वल जलधार, हार हीरक-सी सोहती।" ऊँचाई से गिरते बी फाॅल की ठण्डी-ठण्डी फुहारों ने पल भर में शहर की उबासी भरी तपन को निकाल बाहर कर ताजगी भर दी।
............................................... वाह! बहुत खूब.. बहुत खूब! इस भयंकर गर्मी में कम से कुछ राहत महसूस हुयी ...........प्रकृति चित्रण लाजवाब करती हैं आप ....मन आनंदित हो जाता है

Jyoti khare ने कहा…

बहुत सुन्दर यात्रा वृतांत
पचमढ़ी को जीवंत कर दिया आपके शब्दों और चित्र ने
उत्कृष्ट प्रस्तुति
सादर --

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुन्दर, मनमोहक चित्र

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

एक बहुत ही ख़ूबसूरत स्थन का उत्ना ही ख़ूबसूरत चित्रण.. मुझे तो बस फ़िल्म इजाज़त याद आती है इस स्थान के नाम पर!!

Arogya Bharti ने कहा…


प्रकृति का सुन्दर नज़ारा है हमारी पचपमी लेकिन इसके साथ ही यहाँ जीवनदायनी औषधीय पेड़-पौधों की भी भरमार है .....
पचमढ़ी की वादियों की उतनी ही खूबसूरत प्रस्तुति ...

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

कविता जी पच मढ़ी की बहुत प्यारी झलक और प्यारा आलेख बहुत सुन्दर प्रस्तुति
भ्रमर ५

प्रभात ने कहा…

आपकी पचमढ़ी का "यात्रा वृतांत" पढ़कर मुझे भी अपनी क्लास ट्रिप की वो सारी फोटो याद आने लगी जो वी फाल, धूपगढ़, पांडव गुफा व सतपूणा के जंगल को घूमते हुए की थी। …बेहद सुन्दर वर्णन। … धन्यवाद पढ़वाने के लिए!

Vinay ने कहा…

Wonderful!

बेनामी ने कहा…

बहुत ही सुंदर यात्रा वृतांत!

L.S. Bisht ने कहा…

सुदंर आलेख । पठनीय ।

Preeti 'Agyaat' ने कहा…

सुंदर यात्रा वृतांत!

Unknown ने कहा…

आपकी पोस्ट अपने ब्लॉग पर साभार पोस्ट कर रहा हूँ..

Deven Pandey ने कहा…

आपने तो हमें भी घर बैठे बैठे 'पचमढ़ी ' की यात्रा का अनुभव करवा दिया ! पचमढ़ी को जानने की उस्तुकता और बढ़ा दी आपने ,चूँकि मै भी घुमने फिरने का काफी शौक़ीन रहा हु किन्तु कुछ जिम्मेदारियों के चलते बंध सा गया हु ,किन्तु आपके इस लेख ने सच में नयी जानकारी एवं सुंदर वर्णन से हमें अभिभुत किया !
धन्यवाद इस आलेख एवं यात्रा संस्मरण के लिए

Ravirajveer Bharti ने कहा…

आपने पचमढ़ी का सुंदर चित्रण किया !

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