दिल किसी का न टूटे - KAVITA RAWAT
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Wednesday, June 15, 2022

दिल किसी का न टूटे

प्रसिद्ध वैज्ञानिक थाॅमस अल्वा एडिसन से सारा संसार भलीभांति परिचित है। प्रारम्भिक शिक्षा के दौरन अध्यापक ने उनकी अति जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते उन्हें मंद-बुद्धि और चंचल बताकर स्कूल से निकाल दिया, जिस कारण उनकी शिक्षा केवल तीन माह तक ही चल पायी। उसके बाद उनकी माता ने उन्हें 6 वर्ष तक घर पर ही पढ़ाया और उन्हें ऐसे संस्कार दिए कि एडिसन का मानसिक विकास बहुत विकसित व समृद्ध हो गया। दुनिया में एडिसन की तरह अनेक प्रसिद्ध वैज्ञानिक हुए, किन्तु उनके जैसा ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन‘ के मर्म को साकार कर दिखाने वाला दूसरा कोई देखने को नहीं मिला।

          एडिसन ने सर्वथा विपरीत परिस्थितियों में कभी भी हार नहीं मानी, क्योंकि वे निरंतर प्रयास करने में विश्वास करते थे। वे विद्युत बल्व का आविष्कार करने से पहले एक हजार बार असफल हुए। उनके वैज्ञानिक होने और आविष्कार को कई प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने सिरे से नकार दिया था। लेकिन जब उन्होंने बल्व तैयार किया तो अमेरिका के एक स्टेडियम में उनके आविष्कार के प्रदर्शन हेतु सेमिनार आयोजित किया गया, जिसमें अमेरिका व अन्य देशों के वैज्ञानिक व उनके प्रतिनिधि सदस्यों को आमंत्रित किया गया। क्योंकि यह एक अनोखा आविष्कार था, जो पूरे विश्व के लिए वरदान सिद्ध होना वाला था, इसलिए इसे देखने के लिए दुनिया के कई देशों के नामी-गिरामी आमंत्रित हस्तियों भी एकत्रित हुए। सेमिनार शुरू हुआ तो एडिसन ने वह बल्व एक साधारण व्यक्ति के हाथों में देकर स्टेज पर प्रस्तुत करने के लिए कहा तो बद्किस्मती से उस व्यक्ति को ठोकर लग गई, जिससे वह बल्व नीचे गिर कर टूट गया। यह देखकर सभा में उपस्थित समस्त जनसमूह धक् से रह गया कि यह क्या हो गया।  लोग उस व्यक्ति के बारे में आपस में भला-बुरा कहने लगे। जब लोगों की भीड़ ने एडिसन से एक ही सवाल पूछा कि क्या उन्हें उपस्थित सभा में से यही एक लापरवाह व्यक्ति मिला था, जिसने उनकी वर्षों की मेहनत को एक पल में मिट्टी में मिला दिया, तब एडिसन ने समस्त उपस्थित जनसमूह से प्रार्थना की कि कोई बात नहीं, सभी धैर्य बनाए रखें। उनके द्वारा बल्व के आविष्कार में जो समय लगा उसमें उन्हें सफलता मिल चुकी है। इसलिए सभी लोग मुझे एक दिन का समय और दें, मैं दूसरा बल्व तैयार कर दूँगा। यह सुनकर उपस्थित सभी आयोजकों और आमंत्रित लोगों ने सहमति जताई तो दूसरे दिन एडिसन ने बल्व तैयार कर दिया और फिर उसी व्यक्ति से वह बल्व मंच पर लाने कि कहा, जिसके हाथों बल्व गिरकर फूट गया था। वह व्यक्ति बहुत शर्मसार था, लेकिन एडिसन के निवेदन करने पर वह मंच पर बल्व लेकर आया। उपस्थित सभी लोगों के साथ ही आयोजकों ने ने एडिसन की इस व्यवहार को देखकर बड़ा अचरज हुआ और उन्होंने उन्हें भला-बुरा भी कहा। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि जिस व्यक्ति ने कल उनकी वर्षों की मेहनत बेकार कर दी थी उसे आज फिर उन्होंने बल्व लाने के लिए क्यों कहा?

         जब एडिसन द्वारा समारोह में अपने आविष्कार का सफल प्रदर्शन किया गया।  तब आयोजक मंडल के एक सदस्य ने मंच पर आकर उनके बगल में खड़े बल्व लाने वाले व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए उनसे पूछा कि महोदय क्या आप सभी लोगों की यह जिज्ञासा शांत करेंगे कि आपने क्यों उसी व्यक्ति को पुनः बल्व लाने के लिए चुना, जो पहले बहुत बड़ी गलती कर चुका था? उनके बात सुनकर एडिसन ने सभी लोगों को सम्बोधित करते हुए बताया कि “यदि इस व्यक्ति को उसकी गलती के लिए मैं कल कुछ कहता तो इसका दिल टूट जाता और आज यह यहां पर आने का साहस भी नहीं जुटा पाता। ऐसे बल्व तो लाखों की संख्या  में बन जाते मगर यदि इस व्यक्ति का मेरी वजह से दिल टूट जाता तो मैं उसे जोड़ नहीं पाता।“  उनका यह कथन सुनकर सभी स्तब्ध रह गए। अभिप्रायः स्पष्ट है कि हमें भी जीवन में सदा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। जीवन में कभी ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए, जिससे किसी का दिल टूटे, बल्कि हमें परमात्मा से ऐसी शक्ति की कामना करनी चाहिए जिससे हम टूटे दिलों को जोडने का कार्य करने में सक्षम हो सके। हमें घर हो या व्यवसाय या फिर कार्यालय या अन्य कोई संस्थान, हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे कारण किसी का दिल न टूटे। क्योंकि यदि किसी के दिल को हमारी कोई बात अच्छी लगती है तो हमारे जीवन के हिस्से में भी खुशी आती है और यदि जाने-अनजाने ही सही किसी के दिल को ठेस पहुंचती है तो उसकी पीड़ा से हमारा दिल भी बोझिल होने लगता है।

इसी तारतम्य में ऐसा ही एक और हमारे भारत के पूर्व राष्ट्रपति मान. श्री ए.पी.जे.अब्दुल कलाम जी का प्रसंग प्रस्तुत है। एक बार जब उनकी माता जी उनके पिताजी को भोजन करा रही थी तो एक रोटी ज्यादा सिक जाने के कारण जलकर थोड़ी काली हो गई। वह रोटी उनकी मां ने जब उनके पिताजी को खाने को दी तो वे कड़वी होने के बावजूद भी वह रोटी बड़े प्यार से खा गए, जिसे देख कलाम जी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि आखिर क्यों पिताजी ने वह काली कड़वी रोटी चुपचाप कैसे खा ली? अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए कलाम जी ने अपने पिताजी से पूछा कि पिताजी आपने कड़वी रोटी क्यों खा ली? तो उनकी बात सुनकर उनके पिताजी ने मुस्कुराते हुए उन्हें समझाया कि बेटा मैंने कड़वी रोटी जरूर खाई, लेकिन मुझे वह कड़वी नहीं लगी। क्योंकि तुम्हारी माँ ने बड़ी मेहनत और बड़े प्यार से भोजन बनाया और खिलाया भी। अब ऐसी परिस्थिति में अगर मैं कुछ बोल बैठता तो रोटी की कड़वाहट एक विराट रूप ले लेती। जबकि तुम्हारी माता जी ने मेरे से इस गलती के लिए पहले ही माफी मांग ली थी। उन्होंने आगे समझाया कि हमें हमेशा परिस्थिति देखकर ही चलना चाहिए।

          इन दोनों प्रसंगों से स्पष्ट है कि हमें  स्वयं को नियंत्रण में रखकर परिस्थितियों को संभालाने का हुनर आना चाहिए, जिससे कभी भी दिल किसी का न टूटे।


महिपाल सिंह
सेवादार 
संत निरंकारी मिशन 
निरंकारी काम्प्लेक्स, निरंकारी चौक, 
कोरोनेशन पार्क के सामने 
दिल्ली। 

टीप:  हमारे 'अतिथि लेखन' कॉलम हेतु आपकी रचनाएँ सादर आमंत्रित हैं। कृपया अपनी रचनाएँ हमें ईमेल (kakhushi2003@gmail.com ) द्वारा प्रेषित करें।   

7 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दोनों प्रसंग बहुत अच्छे ।

Ravindra Singh Yadav said...

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 16 जून 2022 को लिंक की जाएगी ....

http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

!

जितेन्द्र माथुर said...

बहुत अच्छा संदेश देती है आपकी यह पोस्ट। मेरे जीवन का तो सिद्धांत ही यही है कि कभी किसी का दिल न दुखाओ। इससे बड़ा गुनाह शायद कोई दूसरा नहीं।

Jigyasa Singh said...

बहुत ही सुंदर सार्थक संदेशपूर्ण लेखन ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (18-06-2022) को चर्चा मंच     "अमलतास के झूमर"  (चर्चा अंक 4464)     पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    

मन की वीणा said...

दोनों प्रसंग और उनका संदेश उत्तम है सच एक बार मनोबल टूट जाए तो फिर स्थापित करना बहुत मुश्किल होता है।
सुंदर प्रेरक।

Jyoti Dehliwal said...

हमें स्वयं को नियंत्रण में रखकर परिस्थितियों को संभालाने का हुनर आना चाहिए, जिससे कभी भी दिल किसी का न टूटे। बिल्कुल सही कहा कविता दी। दोनों प्रसंग बहुत ही अच्छे है।