पेड़-पौधे लगाएं प्रकृति को प्रदूषण से बचाएं - KAVITA RAWAT
ब्लॉग के माध्यम से मेरा प्रयास है कि मैं अपने विचारों, भावनाओं को अपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ-साथ कुछ सामाजिक दायित्व को समझते हुए सरलतम अभिव्यक्ति के माध्यम से लिपिबद्ध करते हुए अधिकाधिक जनमानस के निकट पहुँच सकूँ। इसके लिए आपके सुझाव, आलोचना, समालोचना आदि का स्वागत है। आप जो भी कहना चाहें बेहिचक लिखें, ताकि मैं अपने प्रयास में बेहत्तर कर सकने की दिशा में निरंतर अग्रसर बनी रह सकूँ|

Sunday, June 5, 2022

पेड़-पौधे लगाएं प्रकृति को प्रदूषण से बचाएं

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। हमारे जीवन के अस्तित्व, निर्वाह, विकास आदि को दूषित करने वाली स्थिति को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाता है। जैसे-जैसे महानगरों के विस्तार के साथ ही नए-नए उद्योग-धंधों का अनियंत्रित विकास हुआ है, वैसे-वैसे हमारे सामने इससे जल, वायु, ध्वनि और भूमि प्रदूषण की समस्या भी खड़ी हुई है। जिसके चलते शहर में रह रहे लोगों को शुद्ध प्राकृतिक वायु और जल के अभाव में कई नई-नई बीमारियाँ घेरे रहती हैं। शहरों में प्रदूषण का एक बड़ा कारण जल निकासी का उचित प्रबंध न होना है। जब तक शहर की नालियों से बहकर नदी में मिलने वाले मल-मूत्र, नहाने-धोने तथा साफ-सफाई के गंदे जल, औद्यौगिक संस्थानों के कूड़ा-करकट, विषैले रासायनिक द्रव्य, पेस्टीसाइट,बायोसाइट,कीटनाशक रसायन का वैज्ञानिक तरीके से समाधान नहीं निकाला जाएगा, तब तक शहर के लोगों का स्वस्थ रखने के दावे खोखले साबित होंगे। क्योंकि जल में अवशिष्ट जीवनाशी रसायन हमारे शरीर में पहुंचकर रक्त को विषाक्त कर देता हैं, जिससे अनेक बीमारियां उत्पन्न होती हैं।

शुद्ध वायु और जल जीवन जीने के लिए अनिवार्य तत्व हैं और यह हमें वन, हरे-भरे बाग़-बगीचे तथा लहलहाते पेड़-पौधों से ही मिल सकता है। क्योंकि ये ही आज पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के समाधान का सबसे कारगर उपाय है। इसलिए आज शहरों के बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए पेड़-पौधों का जाल बिछाने, औद्यौगिक संस्थानों को शहर से दूर करने, शहर के प्रदूषित जल को नदी में बहाने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से उसे स्वच्छ कर खेतों की सिंचाई के काम में लाने, परम्परागत ईंधनों का उपयोग कम करके सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनो का प्रयोग करने और जनसँख्या नियंत्रण करने की आवश्यकता है।
हमारा पर्यावरण शुद्ध हो और हम स्वस्थ रहें इसलिए लिए हम तो अपने बाग़-बगीचे और आस-पास जहाँ भी खाली जगह मिलती हैं वहां बरसात आते ही पेड़-पौधे लगाते हैं और उनकी देखरेख करते हैं, जिन्हें पलते-फलते देख हमारे मन को ख़ुशी तो मिलती ही है, साथ ही इस बात की भी तसल्ली रहती है कि हम पर्यावरण को बचाने के लिए अपनेे स्तर से निरंतर प्रयास करते रहते हैं। आपका पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या योगदान हैं, जरूर बताएं, ताकि सभी लोग प्रेरित हो सके।

10 comments:

Kamini Sinha said...

सादर नमस्कार ,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (7-6-22) को "पेड़-पौधे लगाएं प्रकृति को प्रदूषण से बचाएं"(चर्चा अंक- 4454) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा


Anita said...

सार्थक लेखन

Jyoti khare said...

पर्यावरण पर लिखा सार्थक और अर्थपूर्ण आलेख

Anupama Tripathi said...

सारगर्भित आलेख है कविता जी !! हम भी आस पास पेड़ लगा कर हरियाली बरक़रार रखने का ही प्रयास करते हैं !!

MANOJ KAYAL said...

सार्थक लेख

Bharti Das said...

पर्यावरण दिवस पर बहुत सुंदर आलेख

Hindikunj said...

पेड़ पौधे लगायेंगे ,तभी प्राणी जगत बचेगा .
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika

दिगम्बर नासवा said...

ज़रुरत हर कोई महसूस करता है पर प्रयास नहीं क्योंकि अपने व्यस्त कार्यक्रम को जो बदलना होता है ... इंसान स्वार्थी ज्यादा है आजकल ... बहुत सार्थक आलेख ....

Ravindra Singh Yadav said...

नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 17 जून 2022 को 'कहना चाहती हूँ कि मुझे जीवन ने खुश होना नहीं सिखाया' (चर्चा अंक 4464) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

#रवीन्द्र_सिंह_यादव

अनीता सैनी said...

विचारणीय लेख है चिंतन आवश्यक, उठते भावों में कई प्रश्न है।
आख़िर कोई प्रयासरत क्यों नहीं है।
बहुत ही बढ़िया सराहनीय सृजन।
सादर