संचार क्रांति का विकास: टेलीफोन से स्मार्टफोन तक
मानवीय इतिहास में टेलीफोन का आविष्कार एक युगांतरकारी घटना थी। इसने भौगोलिक दूरियों को समेटकर संवाद को सुलभ बनाया, जिससे समय की बचत हुई और व्यापारिक व व्यक्तिगत संबंधों में प्रगाढ़ता आई। कालांतर में, तकनीक ने करवट ली और 'सेल्युलर फोन' के रूप में यह सुविधा घर की चारदीवारी से निकलकर व्यक्ति की मुट्ठी में आ गई। अंततः, इंटरनेट के सस्ते और सुलभ होने के साथ ही मोबाइल फोन ने 'डिजिटल क्रांति' का रूप ले लिया, जिसने न केवल संचार के माध्यम, बल्कि समूचे युग को ही बदल कर रख दिया।
इंटरनेट की दासता और युवा वर्ग
आज की पीढ़ी ने संचार के इस क्रमिक विकास को अपनी आँखों से देखा है। जहाँ परिपक्व पीढ़ी इंटरनेट के बिना भी सामंजस्य बिठा सकती है, वहीं आज का युवा वर्ग इसके बिना एक क्षण भी व्यतीत करने में स्वयं को असमर्थ पाता है। यह निर्भरता अब एक 'डिजिटल व्यसन' (Addiction) का रूप ले चुकी है।
चिंता का विषय: प्राचीन काल में जिस युवा शक्ति को देश का 'कर्णधार' माना जाता था और जिनकी स्वच्छ मानसिकता ने देश को स्वाधीन कराया, आज वही युवा शक्ति इंटरनेट की आभासी दुनिया में अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्यों से भटक रही है।
तकनीक के दुष्परिणाम और मानसिक स्वास्थ्य
इंटरनेट संस्कृति के विस्तार के साथ ही समाज में कई विकृतियाँ भी पनपी हैं:
कर्तव्य विमुखता: छात्र और युवा वर्ग अपने उत्तरदायित्वों को छोड़कर सोशल मीडिया और मनोरंजन के मायाजाल में उलझ गए हैं।
मानसिक कुंठा: आभासी दुनिया की प्रतिस्पर्धा और लत के कारण युवाओं में अवसाद बढ़ रहा है, जिसके दुखद परिणाम आत्महत्या जैसी घटनाओं के रूप में सामने आ रहे हैं।
बौद्धिक क्षरण: बच्चों के हाथों में अनियंत्रित इंटरनेट उनकी सोचने-समझने की मौलिक क्षमता और रचनात्मकता को कुंठित कर रहा है।
अपराध की नई पद्धतियाँ: साइबर ठगी और असामाजिक गतिविधियों ने सुरक्षा के समक्ष गंभीर चुनौतियां प्रस्तुत की हैं।
समय की मांग: नियंत्रण और जागरूकता
इसमें कोई संदेह नहीं कि इंटरनेट ने जीवन को तीव्र और सुविधाजनक बनाया है, किंतु इसके अनियंत्रित प्रयोग ने विनाश की आहट भी दी है। यदि समय रहते युवा पीढ़ी को इस 'डिजिटल भटकाव' से नहीं बचाया गया, तो राष्ट्र की प्रगति बाधित हो सकती है।
निष्कर्ष: आज आवश्यकता इस बात की है कि इंटरनेट का उपयोग केवल रचनात्मक और विशिष्ट कार्यों के लिए ही सुनिश्चित किया जाए। असामाजिक गतिविधियों और इसके दुरुपयोग पर कठोर अंकुश लगाना अनिवार्य है। हमें तकनीक का स्वामी बनना चाहिए, उसका दास नहीं, ताकि युवा शक्ति पथभ्रष्ट होने के बजाय राष्ट्र निर्माण में पुनः अपना योगदान दे सके।
... कविता रावत


8 टिप्पणियां:
बिल्कुल सही लिखा है आपने। नई पीढ़ी की सोचने समझने की शक्तियां लगभग विलुप्त हो चुकी है।
कविता दी, इंटरनेट बूरा नहीं है। इससे हमें बहुत लाभ हुआ है। लेकिन यह उपयोग करने वाले पर निर्भर है कि वो इसका उपयोग कैसे करते है। आज की ज्यादातर युवा पीढ़ी अपने आप पर अंकुश नहीं लगा पा रही है और इसके जाल में फंसती जा रही है। विचारणीय आलेख।
प्रभावशील लेखन, सामयिक विषय पर आलोकपात करती हुई सशक्त रचना, अभिनंदन ।
जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शुक्रवार(०४-११-२०२२ ) को 'चोटियों पर बर्फ की चादर'(चर्चा अंक -४६०२) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
सामायिक चिंतन देता सार्थक लेख।
काश ये संभव हो ...
भावपूर्ण सृजन
चिंतनशील मुद्दे पर सराहनीय और विचारणीय आलेख।
सार्थक अभिव्यक्ति।
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