शहर की उन गलियों में, वो जंग जीत ली सारी
कभी गाय-बकरी पाली, कभी खुद को होम कर डाला
अंधेरे घर के आंगन में, जलाया ज्ञान का उजाला
मेरी शक्ति, मेरी भक्ति, मेरा अभिमान है माँ
भले ही पढ़ न पाई, पर मेरा ज्ञान है माँ।
स्कूल की दहलीज न लांघी, पर जीवन का सार पढ़ा
हमारी शिक्षा की खातिर, वो हर इक मुश्किल से लड़ा
रात के सन्नाटों में वो, पास हमारे सोती थी
अक्षर हमें सिखाने को, वो मौन साधना करती थी
मार्कशीट के नंबर उसने, आँखों से ही पढ़ डाले
चेहरे के भावों से उसने, सुख-दुख सारे पढ़ डाले।
लड़का हो या लड़की, उसने भेद कभी न माना था
अभावों के उस दौर में भी, स्वाभिमान को ठाना था
कभी हाथ न फैलाया, न हालातों से समझौता किया
अपनी खुशियां वार दीं, बस हमको ही सब कुछ दिया
घर की चारदीवारी में, अपनी पहचान खो बैठी
पर बच्चों के भविष्य की, वो ऊँची मीनार बन बैठी।
गैस त्रासदी का वो दंश, और पांच बड़े ऑपरेशन
कैंसर से वो लड़ी निरंतर, अद्भुत था उसका जीवन
पिता की सेवा में उसने, अपनी सुध-बुध बिसराई
यमराज को भी दे चुनौती, ऐसी हिम्मत दिखलाई
आज भले वो पास नहीं, पर यादें उसकी संबल हैं
उसकी दी हुई सीख ही, जीवन का असली कौशल है।
माँ, तुम सिर्फ एक नाम नहीं, तुम संघर्ष का पर्याय हो
मेरी हर एक सफलता का, तुम ही तो आधार हो...
तुम ही तो आधार हो।
... कविता रावत


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