स्मृतियों की गूँज और समय की दहलीज। दादी मां - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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गुरुवार, 7 मई 2026

स्मृतियों की गूँज और समय की दहलीज। दादी मां


 कितनी निश्छल, कितनी सरल हैं दादी माँ,
स्वयं की श्रवण-शक्ति क्षीण हो चुकी है,
पर अपनी स्मृतियों का पिटारा खोलने बैठ जाती हैं।
वे भली-भाँति परिचित हैं इस मौन सत्य —
कि अब कोई उनके अनुभवों का श्रोता नहीं रहा,
फिर भी, वे थकती नहीं अपनी कथाएँ सुनाने से।
चाहे किसी की संवेदना जाग्रत हो या न हो,
चाहे उनकी बातों का किसी पर कोई प्रभाव न पड़े,
पर एक बार जो उनके शब्द-प्रवाह की निर्झरिणी फूटती है,
तो वे बस अनवरत सुनाती चली जाती हैं,
बिना रुके, बिना थके, एक अंतहीन सिलसिले की तरह।

कितनी अबोध, कितनी निष्पाप हैं दादी माँ,
शायद विस्मृत कर चुकी हैं समय का यह कठोर नियम—
कि उनके संवादों का युग अब अतीत की धुंध में खो चुका है,
उनकी बोलने की बारी अब समाप्त हो चली है।
परंतु, उनका हृदय इस यथार्थ को स्वीकारने से कतराता है।
वे इस सूक्ष्म सत्य को आत्मसात नहीं कर पातीं,
कि जीवन के व्याकरण में एक अवस्था 'सुनाने' की होती है,
तो उसके पश्चात एक अनिवार्य पड़ाव केवल 'सुनने' का आता है।
समय की इस मर्यादा को जो जितनी शीघ्र स्वीकार कर ले,
उसी के अंतर्मन की शांति और स्वास्थ्य के लिए वह श्रेयस्कर है।

... कविता रावत

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