दूर-दूर तक दमक रहे हैं, तप्त रेत के कण,बिन पानी के व्याकुल होकर, तरस रहा यह मन।
नीरस, निरुत्साहित, बेबस, मन में विकल विषाद,
मरुस्थल सा प्रतीत होता, जीवन का अह्लाद।
खोज रहा मन छाँव-पानी, मरु में कहीं न नीर,
कंटीली झाड़ियाँ खड़ी हैं, देने को बस पीर।
भागे व्याकुल मन मेरा, दूर पहाड़ों की ओर,
किन्तु वहाँ भी मौन खड़ी हैं, वीरानियाँ घनघोर।
दिन में सूरज अंगारों की, करता है बौछार,
फिर रातें क्यों बिखेरती हैं, चाँदनी का शृंगार?
तड़प-तड़प कर जीव जहाँ, तजते अपने प्राण,
सूरज को क्यों आता नहीं, दया का कोई ध्यान?
न हट सकता अम्बर से यह, अंगारा सा भान,
न जीवन की राहों से, कम होते व्यवधान।
शूल हमेशा चुभते हैं, देते केवल संताप,
कभी न बनते फूल ये, हरने को परिताप।
खड़ी हुई हूँ एक ऐसे, तिमिर-युक्त आलोक में,
जहाँ पसरा सन्नाटा है, केवल गहरी ओट में।
खड़ी सुलभ सुख-दुख के, दो पलड़ों के बीच,
झुका हुआ है दुख का काँटा, सुध-बुध मेरी खींच।
घिर-घिर कर आतीं घटाएँ, हर इक घाट-मँझधार,
पर पल भर में उड़ा ले जाता, उनको तीव्र बयार।
हतोत्साहित निहारती, मैं केवल रह जाती,
दिन के उजले में भी मुझको, तन्हाई डस जाती
copyright@Kavita Rawat

11 टिप्पणियां:
swasthya hi hamare liye shubhkamnayen hai.........swasth rahen
शीघ्र स्वास्थ्य लाभ हो , नव वर्ष मंगलमय हो । अच्छी रचना
swasthy ka dhyan rakhiye .sheeghr swasth labh kee shubhkamnae.
आप शीघ्रातिशीघ्र स्वश्थ हों इसी कामना के साथ आपको नव वर्ष की मंगल कामनाएं।
सुख-दुःख यही तो जीवन है, अति शीघ्र स्वास्थय लाभ की कामना. रही कविता की बात कविता तो (मन के उदगार हैं) कविता है "दुख भरी" या "सुख-भरी" नहीं.
SWASTHYA KA DHYAN RAKHEN.
कविता जी आपके स्वास्थ्य के बार्वेरे मे जान कर बहुत चिन्ता हुई। सर्दी भी बहुत है अपना ध्यान रखना। नये साल की बहुत बहुत शुभकामनायें। रचना बहुत अच्छी है।
आप शीघ्रातिशीघ्र स्वश्थ हों इसी कामना के साथ आपको नव वर्ष की मंगल कामनाएं।
द्वीपांतर परिवार की ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।
निराशा से बाहर निकलिये नववर्ष की शुभकामनाये।
नववर्ष / मकर संक्रांति कि शुभकामनाएं
आप शीघ्रा स्वश्थ हों इसी कामना के साथ
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'श्रेष्ठ सृजन प्रतियोगिता'
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