मरुस्थल सा जीवन
कविता रावत
जनवरी 08, 2010
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दूर-दूर तक दमक रहे हैं, तप्त रेत के कण, बिन पानी के व्याकुल होकर, तरस रहा यह मन। नीरस, निरुत्साहित, बेबस, मन में विकल विषाद, मरुस्थल सा प्र...
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