तपती दुपहरी में उम्मीद की कोंपलें: मेरे बगीचे की एक बानगी - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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रविवार, 12 जून 2022

तपती दुपहरी में उम्मीद की कोंपलें: मेरे बगीचे की एक बानगी

आजकल गर्मी के तेवर बेहद तीखे हैं। 'नौतपा' बीत जाने के बाद भी मौसम के मिजाज में नरमी के बजाय तल्खी और बढ़ गई है। इस भीषण ताप से केवल इंसान ही नहीं, बल्कि प्रकृति के अन्य जीव-जंतु, पेड़-पौधे और फूल-पत्तियां भी बेहाल हैं; कुछ मुरझा रहे हैं तो कुछ पूरी तरह सूख चुके हैं। हमारे बगीचे की स्थिति भी इससे जुदा नहीं है। कई छोटे और नाजुक पौधे इस तपिश को सहन नहीं कर पाए और दम तोड़ चुके हैं। बचे हुए पौधों की सांसें भी अटकी हैं; यदि दो-चार दिनों में बारिश न हुई, तो उन्हें भी बेदम होते देर नहीं लगेगी।
       शहरी जीवन में जल संकट का अपना एक अलग गणित है। पानी आने का समय निर्धारित है और वह भी बमुश्किल एक घंटा ही मिल पाता है। शाम को दफ्तर से लौटते ही जैसे ही नल आते हैं, घर की जरूरतें पूरी करने के बाद मैं पाइप लेकर बगीचे की ओर दौड़ पड़ती हूँ। लेकिन इस झुलसाती गर्मी में पानी मिट्टी पर गिरते ही कहाँ ओझल हो जाता है, पता ही नहीं चलता। अपने हाथों से सींचे गए पौधों को यूं कुम्हलाते देख अक्सर मन उदास हो जाता है और खुद का गला भी सूखने लगता है।
मरुभूमि में तपस्वी का साहस
      इस विकट परिस्थिति में जब कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझता, तब बगीचे के कुछ खास पौधे मन को ढाढस बंधाते हैं। इस भीषण गर्मी में भी जो पौधे अपना दमखम बनाए हुए हमारा हौसला बढ़ाते हैं, वे हैं—कांटेदार (कैक्टस प्रजाति के) पौधे। ये इस भीषणतम गर्मी में भी ऐसे अडिग तने रहते हैं, मानो कोई तपस्वी अपनी गहन साधना में लीन हो, जिसे दुनिया की उठक-पटक से कोई सरोकार न हो।
केले की सोंधी मिठास और हमारी मेहनत का प्रतिफल
      कांटेदार पौधों के मौन साहस के इतर, हमारे बगीचे में दो ऐसे पेड़ भी हैं जो थोड़े से पानी और स्नेह के बदले हमें खुशियों की सौगात देने में कोई संकोच नहीं करते—ये हैं केले और पपीते के पेड़।
      पिछले वर्ष जब केले के पेड़ में पहली बार फल आए, तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। लगा कि मेहनत रंग लाई। हालांकि, तब उसमें गिनती के पांच ही केले लगे थे। इससे पहले कि वे पककर हमारे स्वाद का हिस्सा बनते, उनमें से तीन गिलहरियां चट कर गईं। शेष बचे दो केलों को हमने ईश्वर का प्रसाद मानकर ग्रहण किया।
      लेकिन इस वर्ष प्रकृति हमसे और अधिक मेहरबान हुई। केले के दूसरे पेड़ पर लगभग चार दर्ज केले आए, जिन्हें देखकर दिल बाग-बाग हो गया। इन गर्मियों में रोज़ाना एक-दो केले पकते जाते और हम उन्हें तोड़ते रहे। कुछ हमने खुद खाए और कुछ आस-पड़ोस व सगे-संबंधियों में प्रसाद स्वरूप बांटे। जब सबने घर के उगे स्वादिष्ट और प्राकृतिक रूप से पके केलों की जमकर तारीफ की, तो मन को असीम सुकून मिला।
पपीते की मिठास और भविष्य की उम्मीदें
      बगीचे का दूसरा आकर्षण है—पपीते का पेड़। शुरुआत में हमने यहाँ-वहाँ से लाकर लगभग १५-२० पौधे रोपे थे, लेकिन कुछ पानी की अधिकता से गल गए तो कुछ को दीमक खा गई। अंततः केवल पांच पेड़ ही सुरक्षित बच पाए। संतोष की बात यह है कि इस कड़कती धूप में भी ये पेड़ हर दो-चार दिन के अंतराल में एक पका हुआ पपीता दे ही देते हैं। भले ही इन पेड़ों का कद छोटा है, लेकिन अपने आंगन के वृक्ष से तोड़े गए फलों की मिठास बाजार के फलों से कहीं बढ़कर होती है।
      केले की तरह पपीते को भी पानी की प्रचुर आवश्यकता होती है। इसलिए इन पर विशेष ध्यान देते हुए हमें अपेक्षाकृत अधिक पानी देना पड़ता है, अन्यथा इसकी पत्तियां एक-एक कर सूखने लगती हैं।
     फिलहाल, इन पेड़ों से मिल रहे रसीले फलों ने हमारे उत्साह को दोगुना कर दिया है। हमने आगामी मानसून के लिए अभी से पपीते के बीजों को सुखाकर सुरक्षित रख लिया है। अब बस, प्रतीक्षा है तो बादलों की उस पहली फुहार की, जो बगीचे के तन-मन को तृप्त कर दे। जैसे ही बारिश की बूंदें धरा को छुएंगी, हम इन बीजों को रोप देंगे। चूंकि बरसात के मौसम में पपीते के पौधे बहुत तेजी से बढ़ते हैं और अगली गर्मी आने से पहले फल देने योग्य हो जाते हैं, इसलिए हम अगली गर्मियों में अपने ही बगीचे के रसीले फलों का आनंद लेने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
...कविता रावत



11 टिप्‍पणियां:

Anupama Tripathi ने कहा…

badhiya jankari

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आप तो पपीते और केले का आनंद लीजिये ।हम पढ़ कर ले रहे हैं । अब तो दिल्ली की गर्मी असह्य हो रही है ।
ज्ञानवर्धक लेख ।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

कविता दी, मैं ने भी अपने बगीचे में केले, आम, चीकू,संतरा और पपीते के पेड़ लगाके थे। लेकिन अब बंदर बहुत तंग करने लगे है इसलिए सब निकालने पडे। अब नींबू के पेड़ लगाए है ताकि बंदर न तंग करे।

नूपुरं noopuram ने कहा…

अच्छा लगा जानकर कि कुछ पेङ सख़्त जान निकले । ऐस ही प्रकृति संतुलन बनाए रखती होगी । एक बात .... आपने कहा बहुत पानी मांगते हैं, केला-पपीता के पेङ । फिर ये कम पानी के बावजूद कैसे टिक गए ?

Alaknanda Singh ने कहा…

कविता जी, वाह केले, पपीते के संग अब आम भी लगाइये ताकि डिमांड की जा सके।

मन की वीणा ने कहा…

प्रकृति कितनी दयालु है हम कुछ परिश्रम दें तो वो वापस प्रतिदान देती अवश्य है।
सुंदर लेख।

Anuradha chauhan ने कहा…

अपने हाथों से लगाए हुए पेड़ों के फल खाने का आनंद ही अलग है। उपयोगी जानकारी दी आपने कि पपीते के पेड़ को अधिक पानी की जरूरत होती है।

योगेश Bailwal ने कहा…

प्रकृति व पर्यावरण से स्नेह रखने वाली हमारी सनातनी संस्कृति ने जिसे "माँ" का दर्जा दिया है यह उसका ही प्रमाण है।

देवभूमि उत्तराखंड की एक कहावत है कि "कम खाने से व गम खाने से, कोई नहीं मरता" अर्थात इन्हें प्रसन्नचित हो सहन करने में कोई हानि नहीं।

घर के आस-पास के पेड़-पौधे व हरियाली कई प्रकार के जीवन-चक्रों का आधार बनता है व कुछ न कुछ भेंट हमें भी उपलब्ध करती है जो शांतिपूर्ण ढंग से जीवन-निर्वहन का आधार भी बन सकते हैं जैसा हम पारंपरिक रूप में देखते भी आये हैं।

वर्तमान में प्रदूषित वातावरण व दूषित मनोवृत्ति इनसे अभी भी बहुत कुछ सीख सकती है।

Kamini Sinha ने कहा…

सादर नमस्कार ,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार(14-6-22) को "वो तो सूरज है"(चर्चा अंक-4461) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा

Sudha Devrani ने कहा…

सच में अपने बगीचे के फलों का आनंद ही कुछ और है...चलो आपकी मेहनत रंग लायी।

विश्वमोहन ने कहा…

ज्ञानवर्धक पोस्ट। आभार!

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