सहिष्णुता, सकारात्मकता और मानवीय मूल्यों की पराकाष्ठा - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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बुधवार, 15 जून 2022

सहिष्णुता, सकारात्मकता और मानवीय मूल्यों की पराकाष्ठा

जीवन में सफलता केवल भौतिक उपलब्धियों या वैज्ञानिक आविष्कारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी वास्तविक सार्थकता हमारे मानवीय दृष्टिकोण, सहिष्णुता और सकारात्मक सोच में निहित है। महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के जीवन के प्रसंग हमें यही सीख देते हैं कि विषम परिस्थितियों में भी अपने व्यवहार और वाणी पर नियंत्रण रखकर रिश्तों व इंसानी गरिमा को कैसे बचाया जा सकता है।
प्रसंग 1: थॉमस अल्वा एडिसन – 'कर्म' और 'करुणा' का अद्भुत समन्वय
     प्रसिद्ध वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन का प्रारंभिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा। बचपन में उनकी अत्यधिक जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण शिक्षकों ने उन्हें 'मंदबुद्धि' और 'चंचल' कहकर स्कूल से निकाल दिया। उनकी औपचारिक शिक्षा मात्र तीन महीने ही चल सकी, जिसके बाद उनकी माता ने छह वर्षों तक उन्हें घर पर ही शिक्षित-दीक्षित किया। माता द्वारा दिए गए श्रेष्ठ संस्कारों के फलस्वरूप एडिसन का मानसिक व बौद्धिक विकास अत्यंत समृद्ध हुआ।
     श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' (अर्थात कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं) को एडिसन ने अपने जीवन में अक्षरशः चरितार्थ किया। विद्युत बल्ब के आविष्कार के दौरान वे एक हजार बार असफल हुए और समकालीन वैज्ञानिकों ने भी उनके प्रयासों को सिरे से नकार दिया, किंतु वे निरंतर प्रयासरत रहे।
घटना और मानवीय दृष्टिकोण
     जब एडिसन ने बल्ब का सफल आविष्कार कर लिया, तो इसके वैश्विक प्रदर्शन हेतु अमेरिका के एक भव्य स्टेडियम में एक सेमिनार आयोजित किया गया, जहाँ दुनिया भर के दिग्गज वैज्ञानिक और गणमान्य अतिथि उपस्थित थे। मंच पर प्रदर्शन के लिए एडिसन ने वह बल्ब एक साधारण सहायक के हाथों में सौंप दिया। दुर्भाग्यवश, ठोकर लगने के कारण उस व्यक्ति के हाथ से बल्ब गिरकर टूट गया। पूरी सभा स्तब्ध रह गई और लोग उस व्यक्ति की लापरवाही की निंदा करने लगे।
     एडिसन ने बिना विचलित हुए सभी से धैर्य रखने का आग्रह किया और एक दिन का समय मांगा। अगले दिन उन्होंने पुनः बल्ब तैयार किया और आश्चर्यजनक रूप से उसी व्यक्ति को दोबारा मंच पर बल्ब लाने का दायित्व सौंपा। आयोजकों और उपस्थित लोगों को एडिसन का यह निर्णय तर्कहीन लगा और उन्होंने अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई।
     बल्ब के सफल प्रदर्शन के बाद जब आयोजकों ने एडिसन से इस निर्णय का कारण पूछा, तो उनका उत्तर मानवता की मिसाल था। एडिसन ने कहा:
"यदि कल मैं उस व्यक्ति को उसकी गलती के लिए फटकार लगाता, तो उसका आत्मविश्वास और दिल हमेशा के लिए टूट जाता। वह कभी दोबारा यहाँ आने का साहस नहीं जुटा पाता। मेरे लिए खोए हुए आत्मविश्वास को वापस लौटाना अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि बल्ब तो लाखों की संख्या में दोबारा बनाए जा सकते हैं, लेकिन किसी का टूटा हुआ दिल दोबारा नहीं जोड़ा जा सकता।"
इस प्रसंग का निहितार्थ स्पष्ट है कि भौतिक संपदा या आविष्कार से कहीं अधिक मूल्यवान मनुष्य की भावनाएं और उसका आत्मसम्मान है।
प्रसंग 2 : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम – पारिवारिक सामंजस्य और सहिष्णुता
     इसी वैचारिक धरातल पर भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के बचपन का एक प्रसंग भी सटीक बैठता है। एक बार भोजन के समय उनकी माता जी ने असावधानीवश अत्यधिक सिक जाने के कारण जली और कड़वी हो चुकी रोटी उनके पिता को परोस दी। कलाम जी ने देखा कि उनके पिता ने बिना किसी शिकायत या शिकन के उस कड़वी रोटी को बड़े प्रेम से खा लिया।

बालक कलाम की जिज्ञासा जागृत हुई और उन्होंने पिता से पूछा कि उन्होंने वह जली हुई कड़वी रोटी चुपचाप क्यों खा ली? उनके पिता ने मुस्कुराते हुए एक अत्यंत व्यावहारिक और गहरा पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा:

"बेटा, रोटी भले ही कड़वी थी, लेकिन मुझे वह कड़वी नहीं लगी। तुम्हारी माँ ने दिनभर की थकान के बाद बहुत परिश्रम और प्रेम से भोजन तैयार किया था। यदि मैं उस क्षण कटु शब्द बोलता, तो रोटी की वह कड़वाहट हमारे पारिवारिक रिश्तों में एक बड़ा विवाद बन सकती थी। परिस्थितियों को भांपकर मौन रहना और अपनों की छोटी गलतियों को क्षमा करना ही सुखी जीवन का आधार है।"
निष्कर्ष: जीवन का मूल मंत्र
     इन दोनों महान विभूतियों के प्रसंगों से यह निष्कर्ष निकलता है कि चाहे हमारा घर हो, व्यवसाय हो या कार्यस्थल—हमें सदैव अपनी वाणी और व्यवहार पर नियंत्रण रखना चाहिए।
        • सकारात्मक सोच का महत्व: जब हमारी किसी बात से दूसरों को प्रसन्नता मिलती है, तो हमारे स्वयं के जीवन में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
        • भावनात्मक संवेदनशीलता: जाने-अनजाने में भी यदि हमारे कारण किसी के दिल को ठेस पहुँचती है, तो अंततः उसकी अंतर्निहित पीड़ा हमारे अपने मन को भी बोझिल कर देती है।
अतः जीवन की वास्तविक कला स्वयं को नियंत्रण में रखकर विपरीत परिस्थितियों को संभालने का हुनर सीखने में है। हमें ईश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हम दूसरों का दिल दुखाने के बजाय, टूटे हुए दिलों और रिश्तों को जोड़ने के माध्यम बन सकें।
महिपाल सिंहसेवादार
संत निरंकारी मिशन
निरंकारी काम्प्लेक्स, निरंकारी चौक,
कोरोनेशन पार्क के सामने
दिल्ली। 

टीप:  हमारे 'अतिथि लेखन' कॉलम हेतु आपकी रचनाएँ सादर आमंत्रित हैं। कृपया अपनी रचनाएँ हमें ईमेल (kakhushi2003@gmail.com ) द्वारा प्रेषित करें।   

6 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

दोनों प्रसंग बहुत अच्छे ।

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

बहुत अच्छा संदेश देती है आपकी यह पोस्ट। मेरे जीवन का तो सिद्धांत ही यही है कि कभी किसी का दिल न दुखाओ। इससे बड़ा गुनाह शायद कोई दूसरा नहीं।

जिज्ञासा सिंह ने कहा…

बहुत ही सुंदर सार्थक संदेशपूर्ण लेखन ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (18-06-2022) को चर्चा मंच     "अमलतास के झूमर"  (चर्चा अंक 4464)     पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    

मन की वीणा ने कहा…

दोनों प्रसंग और उनका संदेश उत्तम है सच एक बार मनोबल टूट जाए तो फिर स्थापित करना बहुत मुश्किल होता है।
सुंदर प्रेरक।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

हमें स्वयं को नियंत्रण में रखकर परिस्थितियों को संभालाने का हुनर आना चाहिए, जिससे कभी भी दिल किसी का न टूटे। बिल्कुल सही कहा कविता दी। दोनों प्रसंग बहुत ही अच्छे है।

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