महात्मा का मंतव्य यह था कि यदि हम अपने बच्चों में प्रेम, नम्रता, सहनशीलता और बड़ों के प्रति आदर-भाव जैसे नैतिक मूल्यों का बीजारोपण करें, तो किसी भी वृद्ध को वृद्धाश्रम का मुंह नहीं देखना पड़ेगा। यदि संतान अपने माता-पिता को 'बोझ' नहीं, बल्कि अपना मार्गदर्शक और पूजनीय मानकर उनका सत्कार करे, तो एक ऐसे समाज का निर्माण होगा जहाँ बुजुर्गों को असुरक्षा का नहीं, बल्कि सुकून का अनुभव होगा।
वर्तमान का द्वंद्व: भौतिकवाद बनाम मानवीय मूल्य
आज के भौतिकवादी युग में मानवीय मूल्यों का निरंतर ह्रास हो रहा है। विडंबना यह है कि आज की युवा पीढ़ी गुणों के बजाय अवगुणों को अपनाने में गर्व महसूस कर रही है। युवा वर्ग अपनी उपलब्धियों का आकलन करने के बजाय अक्सर अपने माता-पिता से यह प्रश्न करने में संकोच नहीं करता कि "आपने हमारे लिए किया ही क्या है?"
पुराने समय की आर्थिक परिस्थितियों और आज की महँगाई के बीच का अंतर समझना आज की पीढ़ी के लिए आवश्यक है। जहाँ पहले की सीमित आय में भी जीवन संतोषजनक था, वहीं आज लाखों की कमाई के बावजूद हर व्यक्ति आर्थिक तंगी और तनाव से घिरा है। लोग यह भूल जाते हैं कि उनकी वर्तमान सामाजिक और आर्थिक स्थिति, उन्हीं बुजुर्गों के संघर्ष और आशीर्वाद का प्रतिफल है।
कर्म का चक्र और हमारा दायित्व
आज वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों को स्वास्थ्य और रहन-सहन की सभी भौतिक सुविधाएँ मिल रही हैं, लेकिन भावनात्मक रिक्तता बनी हुई है। जो संतान आज अपने माता-पिता को संस्थाओं के हवाले कर रही है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि 'समय का चक्र घूमकर वापस आता है।' भविष्य में उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार होने की प्रबल संभावना है, जैसा वे आज अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं।
निष्कर्ष: एक उज्ज्वल भविष्य की ओर
बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की शक्ति मिलकर ही समाज का नव-निर्माण कर सकती हैं। इतिहास गवाह है कि आज विश्व में जो भी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरें मौजूद हैं, वे हमारे बुजुर्गों के संघर्षों का परिणाम हैं।
अतः, हम सभी का नैतिक दायित्व है कि हम अपने बच्चों को वे संस्कार दें, जिनसे वे बुजुर्गों के अनुभवों की महत्ता को समझ सकें। बुजुर्गों का आशीर्वाद केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन को सुकून और शक्ति प्रदान करने वाला एक संबल है। यदि हम अपने बुजुर्गों को सम्मान की दृष्टि से देखेंगे, तो आने वाली पीढ़ी स्वतः ही हमें सत्कार करना सीख जाएगी। याद रखें, बुजुर्गों की छत्रछाया में पलने वाला समाज ही समृद्ध और शाश्वत होता है।
महिपाल सिंह, प्रेम नगर - दिल्ली
टीप: हमारे 'अतिथि लेखन' कॉलम हेतु आपकी रचनाएँ सादर आमंत्रित हैं। कृपया अपनी रचनाएँ हमें ईमेल (kakhushi2003@gmail.com ) द्वारा प्रेषित करें।

हाल ही में एक आध्यात्मिक संगोष्ठी के दौरान एक बुजुर्ग महात्मा का एक कथन अत्यंत विचारोत्तेजक था। उन्होंने कहा, "हमें वृद्धाश्रमों का बहिष्कार करना चाहिए।" उनकी यह बात सुनकर उपस्थित जनसमूह क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गया, किंतु जब उन्होंने इसके पीछे के तर्क को स्पष्ट किया, तो सभी का दृष्टिकोण बदल गया।

10 टिप्पणियां:
बुजुर्गों को सम्मान मिले अपने घर परिवार से अधिकारों के साथ उचित देखभाल मिले यह सभ्य समाज के लिए निन्तात आवश्यक है । सारगर्भित और चिन्तन परक लेख ।
बहुत सुंदर आलेख
भावनाओं को समेटे हुए
सादर नमस्कार ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-6-22) को "घर फूँक तमाशा"(चर्चा अंक 4465) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
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सुन्दर और विचारोत्तेजक आलेख !
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