माटी की मूरत
कविता रावत
जुलाई 07, 2025
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मुट्ठी भर गीली मिट्टी ले, मन में एक विचार जगा, सोचा, गढ़ूँ एक ऐसी मूरत, जिसमें अपना स्वप्न लगा। ढालूँ उसे समर्पण से मैं, डूबूँ उसमें इस कदर, ...
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