सोचा, गढ़ूँ एक ऐसी मूरत, जिसमें अपना स्वप्न लगा।
ढालूँ उसे समर्पण से मैं, डूबूँ उसमें इस कदर,
दिखे मुझे वह सपनों जैसी, सुंदर और अति मनहर।
पर जरा संभलकर...
कहीं हाथ से माटी छूट न जाए,
गिरकर अपनी कोमल काया, फिर से पा न पाए।
माटी के संग बीता बचपन, खेल-कूद मैं बढ़ा हुआ,
गूँथ-गूँथ कर लोई जैसा, शिल्प बनाने खड़ा हुआ।
न अधिक तरल, न सख्त रही वह, नरम सी जैसे लोई हो,
साध लिया है रूप उसे, जो चाह रही अब सोई हो।
पर जरा संभलकर...
कहीं समय की रेत न फिसले, देर कहीं न हो जाए,
सूख गई जो गूँथी माटी, रूप पुन: न पा पाए।
सोच रहा हूँ क्या रूप दूँ, इस मिट्टी की काया को?
तितली, मोर या वन के राही, या चंचल सी छाया को?
तभी भाव इक मन में आया, एक युगल मैं गढ़ूँगा,
हंस-हंसिनी के जोड़े से, प्रेम का पाठ मैं पढ़ूँगा।
पर जरा संभलकर...
हंस कहीं न गिर जाए,
टूट गया जो पंख सुकोमल, फिर जुड़ कभी न पाए।
बनी जो मूरत हंस-युगल की, विविध रंग मैं ले आया,
श्वेत वर्ण के पावन जल में, उनको खूब नहलाया।
अम्बर से नीला रंग माँगा, सुंदर सरवर बना दिया,
धरती से ले फूल और पत्ती, उपवन सा सजा दिया।
पर जरा संभलकर...
रंग और पुष्प बिखर न जाएँ,
बिखरे हुए वे स्वप्न सजीले, पहले जैसे हो न पाएँ।
उमड़-घुमड़ आए नयनों में, हर्षित मन के मेघ घने,
देखा जब मैंने कि मेरी, सुंदर मूरत पूर्ण बने।
पर हा! नियति का खेल निराला, हाथों से वह फिसल गई,
टूट गई वह कड़ी मेहनत, माटी में फिर मिल गई।
तभी तो कहता हूँ संभल जरा...
हाथों से मूरत फिसल न जाए,
टूट-चटक कर सृजन की मेहनत, पहले जैसी हो न पाए।
ढालूँ उसे समर्पण से मैं, डूबूँ उसमें इस कदर,
दिखे मुझे वह सपनों जैसी, सुंदर और अति मनहर।
पर जरा संभलकर...
कहीं हाथ से माटी छूट न जाए,
गिरकर अपनी कोमल काया, फिर से पा न पाए।
माटी के संग बीता बचपन, खेल-कूद मैं बढ़ा हुआ,
गूँथ-गूँथ कर लोई जैसा, शिल्प बनाने खड़ा हुआ।
न अधिक तरल, न सख्त रही वह, नरम सी जैसे लोई हो,
साध लिया है रूप उसे, जो चाह रही अब सोई हो।
पर जरा संभलकर...
कहीं समय की रेत न फिसले, देर कहीं न हो जाए,
सूख गई जो गूँथी माटी, रूप पुन: न पा पाए।
सोच रहा हूँ क्या रूप दूँ, इस मिट्टी की काया को?
तितली, मोर या वन के राही, या चंचल सी छाया को?
तभी भाव इक मन में आया, एक युगल मैं गढ़ूँगा,
हंस-हंसिनी के जोड़े से, प्रेम का पाठ मैं पढ़ूँगा।
पर जरा संभलकर...
हंस कहीं न गिर जाए,
टूट गया जो पंख सुकोमल, फिर जुड़ कभी न पाए।
बनी जो मूरत हंस-युगल की, विविध रंग मैं ले आया,
श्वेत वर्ण के पावन जल में, उनको खूब नहलाया।
अम्बर से नीला रंग माँगा, सुंदर सरवर बना दिया,
धरती से ले फूल और पत्ती, उपवन सा सजा दिया।
पर जरा संभलकर...
रंग और पुष्प बिखर न जाएँ,
बिखरे हुए वे स्वप्न सजीले, पहले जैसे हो न पाएँ।
उमड़-घुमड़ आए नयनों में, हर्षित मन के मेघ घने,
देखा जब मैंने कि मेरी, सुंदर मूरत पूर्ण बने।
पर हा! नियति का खेल निराला, हाथों से वह फिसल गई,
टूट गई वह कड़ी मेहनत, माटी में फिर मिल गई।
तभी तो कहता हूँ संभल जरा...
हाथों से मूरत फिसल न जाए,
टूट-चटक कर सृजन की मेहनत, पहले जैसी हो न पाए।
..अर्जित रावत





18 टिप्पणियां:
बहुत सुंदर।
अर्जित को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
♥️🎂
बहुत भाग्यशाली हैं आप जो ऐसा प्रतिभाशाली पुत्र आपको मिला है। इस कविता में सम्पादन की कोई आवश्यकता नहीं है। यह निस्संदेह एक श्रेष्ठ रचना है।
अर्जित को जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएँ और आशीर्वाद । बहुत सुंदर लिखा है ।
अर्जित को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। कविता बहूत अच्छी है,कविता दी।
बेटे को समर्पित बहुत सुंदर सारगर्भित रचना ।बेटे को जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाएं एवम बधाई 🎂🎂💐💐
अर्जित भाई को जन्मदिन की हार्दिक हार्दिक हार्दिक शुभकामनाएं!हमेशा खुश रहें!हर उस ऊचाई को छुएं जहाँ तक जाने की चाह हो!
कविता की तारीफ ही क्या करे जैसा नाम वैसा काम आदरणीय मैम🙏
बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ लिखी है आपने। धन्यवाद। Zee Talwara
धन्यवाद ! मेरे बेटे ने लिखी है यह कविता
हार्दिक शुभकामनाएं
अर्जित को जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएँ । बहुत सुंदर कविता है ।
आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (22-09-2021) को चर्चा मंच ‘तुम पै कौन दुहाबै गैया’ (चर्चा अंक-4195) पर भी होगी!--सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
मन की उथल-पुथल दर्शाती सुंदर रचना ! पूरे परिवार को बधाई, अर्जित को स्नेहाशीष
बहुमुखी प्रतिभा अर्जित करने वाले अर्जित को अन्नत शुभकामनायें।
अर्जित को जन्मदिन की अशेष शुभकामनाये। रचना भी सुन्दर ।
गूँथी माटी फिर वापस
पहले जैसे न रह पाए
यही तो चिंता होती है कि यें इतने उत्तम विचारों के साथ बढ़ते हमारे नौनिहाल इस प्रतिस्पर्धी संसार में गिरकर कहीं टूट बिखर ना जायें और टूटें तो फिर वापस मजबूत मन से जुड़ भी सकें कहीं....
गूँथी माटी फिर वापस
पहले जैसे न रह पाए
गहन चिंतनपरक एवं सारगर्भित सृजन किया है प्रिय अर्जित ने...बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं उसे।
साथ ही जन्मदिवस की अनंत शुभकामनाएं एवं ढ़ेर सारा आशीर्वाद।
अर्जित को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
बहुत खूबसूरत रचना
सुंदर, सार्थक रचना !........
Mere Blog Par Aapka Swagat Hai.
बहुत सुन्दर अर्जित के बारे में जानकर बहुत खुशी हुई , अर्जित को जन्म दिन की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई वह सदा खुश रहे स्वस्थ रहे दीर्घायु हो ऐसे ही खूब आगे बढ़े समाज को रोशन करे ।
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