सुना है पौराणिक काल में, एक कल्पतरु हुआ करता था,
तले बैठ जिसके मानव, मनचाहा फल पाता था।
पल में इच्छा पूर्ण होती, जीवन सुख-चैन से भर जाता,
जो भी आता शरण में उसकी, वह असीम खुशियां पाता।
क्या आधुनिक युग में भी, कोई ऐसा वृक्ष मिलेगा?
जो हर सपना साकार करे, जो मरुथल में भी खिलेगा?
आप कहेंगे— 'अब कहां कल्पतरु? वह तो बीती बात हुई,'
मैं कहती हूँ— 'वह यहीं व्याप्त है, भ्रष्टाचार रूपी नई शुरुआत हुई।'
यह एक ऐसा विष-वृक्ष है, जिसकी छाया बड़ी घनेरी है,
जो बैठ गया इसके नीचे, समझो माया उसी की चेरी है।
जड़ें इसकी इतनी गहरी हैं कि कोई उखाड़ नहीं पाता,
जो दुस्साहस करता है इसको मिटाने का, वह जीवन भर पछताता।
जो थाम लेता है जड़ें इसकी, वह मनवांछित फल पाता है,
और जो विमुख रहता इससे, वह खाली ढोल बजाता है।
यह आधुनिक युग की 'कामधेनु' है, जिसका दूध श्वेत नहीं, काला है,
सर्वत्र पूजनीय है जो आज, उसी का नाम 'घोटाला' है।
'आत्मा तन से निकलती है'— यह तो केवल धर्मशास्त्र कहता है,
'भ्रष्टाचार आत्मा में व्याप्त है'— आज का मानवशास्त्र कहता है।
इसने विराट कल्पवृक्ष का, विकराल रूप धर लिया है,
इसीलिए इस कुप्रथा को दुनिया ने, 'शिष्टाचार' का नाम दे दिया है।
... कविता रावत


11 टिप्पणियां:
आपका सृजनात्मक कौशल हर पंक्ति में झांकता दिखाई देता है।
सही बात है आज भ्रश्टाचार आज कल ्रकत्बीज जैसे दानव की तरह फैल रहा है और हम लोग मूक दर्शक बने रहने के सिवा कुछ भी नहीं कर पा रहे। बहुत अच्छी तरह उठाया है इस मुद्दे को । मेरी बेटी को मेरी चिन्ता है और मेरे लिये दुया है तो मुझे कुछ नहीं होगा ठीक हो रही हूँ कुछ दिन जरा काम कम करूँगी। थक जाती हूँ। बहुत बहुत आशीर्वाद्
भ्रष्टाचार आत्मा में व्याप्त है,aur ikshayen sursaa kee tarah munh failaye jaa rahi hain ....... isi vriksh ke tale sab baithe hain.......isse bahar nikalne ka raasta apni soch se milega
अपनी बात को बहुत ही स्पष्टता के साथ तुमने लिखा है मेरी बधाई भी और शुभकामनाएं भी।
aaj ke samaj system ko aaina dikhatee rachana .insaan bhoutikata me itana lupt hai ki aatma to dab gai hai isake bhar tale .
bahut achee rachana .
sach kaha hai aaj bhrashtachaar kalptaru se bhi badaa ho gaya hai .... saari maanavta, niyam, aadarsh, manushyata isme sama gayee hai .... iska vikraal roop sabko leel raha hai ...
bahoot hi gahre bhaav liye vyangatmak shaili mein likhi rachna ....
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! मेरे अन्य ब्लोगों पर भी आपका स्वागत है!
आपने बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना लिखा है! बहुत बढ़िया लगा!
sabne sahi kaha aapki rachna kabile tarif hai .bahut sundar sandesh .bahut badhiya likha hai .
उपस्थित।
मानव जगत के इतिहास में कई बार भ्रष्टाचार इतना या इससे अधिक बढ चुका है, लेकिन सामाजिक नवजागरण के कारण उसका उन्मूलन हो सका था. आज देश की जरूरत एक नवजागरण की है.
सस्नेह -- शास्त्री
yeh rachna bahut lagi......
मेरी रचनाएँ !!!!!!!!!
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