पर दूर कहीं की वासी थी,
ज्यों ठूँठ खड़ी हो तरु-शाखा,
वह वैसी ही संन्यासी थी।
क्षण भर को उठतीं पलकें उसकी,
क्षण भर में ही झुक जाती थीं,
जब ढुलक पड़े दो अश्रु-बिंदु,
तब मेरी रूह थर्राती थी।
वह रिक्त खड़ी थी इस पथ पर,
ज्यों पतझड़ की कोई डाली,
अस्तित्व धुंधलाया सा उसका,
वह दूर कहीं की रहने वाली।
मैं समझ न पायी टीस उसकी,
वह क्या कहने को आतुर थी?
सूने नयनों के मरुथल में,
बस सजल अश्रु की चादर थी।
वह निहार रही थी रिक्त गोद,
और फैलाए बैठी झोली,
जब करुणावश मैंने पूछा,
तब सहम-सहम कर वह बोली—
"छिन गया सुहाग था उस रात ही,
अब पुत्र-वियोग यह भारी है,
न सिंदूर रहा, न वंश बचा,
बस शेष बची लाचारी है।"
वह 'अमिट वेदना' का स्वरूप,
जिसकी सूनी हो गई प्याली,
वह दुखियारी पास खड़ी थी,
पर दूर कहीं की रहने वाली।
और फैलाए बैठी झोली,
जब करुणावश मैंने पूछा,
तब सहम-सहम कर वह बोली—
"छिन गया सुहाग था उस रात ही,
अब पुत्र-वियोग यह भारी है,
न सिंदूर रहा, न वंश बचा,
बस शेष बची लाचारी है।"
वह 'अमिट वेदना' का स्वरूप,
जिसकी सूनी हो गई प्याली,
वह दुखियारी पास खड़ी थी,
पर दूर कहीं की रहने वाली।
Copyrigt@Kavita Rawat, Bhopal २३ फरवरी २००९

17 टिप्पणियां:
bahut hi bhawpurn
संवेदनशीलता से ओत प्रोत है आपकी कविता |
बधाई
मानवीय वेदनाओं संवेदनाओं को दर्शाती सच्ची रचना. बधाई.
BEHTREEN RACHNAA...
बहुत मार्मिक प्रस्तुति..
समझ न पाया के बजाय समझ न पाई कर लें। बहुत ही संवेदनशील कविता है।
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कविता में सरलता का ऐसा समावेश तभी ही पाता है जब ऐसा शब्दचित्र वास्तविकता के करीब से गुज़रा हो। मानवीय संवेदना को झकझोर देने वाली मार्मिक कविता पाठकों से सीधा संवाद कर रही है। ऐसी भावप्रवण प्रस्तुति समाज को संवेदनशील होने में कहीं न कहीं अपनी सार्थकता की छाप छोड़ती है। बधाई।
कविता में सरलता का ऐसा समावेश तभी ही पाता है जब ऐसा शब्दचित्र वास्तविकता के करीब से गुज़रा हो। मानवीय संवेदना को झकझोर देने वाली मार्मिक कविता पाठकों से सीधा संवाद कर रही है। ऐसी भावप्रवण प्रस्तुति समाज को संवेदनशील होने में कहीं न कहीं अपनी सार्थकता की छाप छोड़ती है। बधाई।
सुन्दर ! भावपूर्ण अभिव्यक्ति। आभार
सुन्दर रचना।
वाह!!बेहतरीन रचना!
बहुत सरल गति से प्रवाहित संवेदनाओं का संप्रेषण करती रचना ।
अभिनव सृजन।
वाह बेहतरीन रचना 👌
बहुत सुन्दर भावपूर्ण सृजन
वाह!!!
वाह !!!
बहुत सुन्दर सृजन
लाजवाब
'असहाय वेदना' थी यह उसकी
गोद हुई थी उसकी खाली,
वो दुखियारी पास खड़ी थी
दूर कहीं की रहने वाली।।
बेहद मार्मिक रचना कविता जी ,सादर नमस्कार
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