आत्म-बोध: संभल कर चलना - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 15 सितंबर 2009

आत्म-बोध: संभल कर चलना



इससे पहले कि मर्यादा तज, कोई तुम से 'तू' पर आए,
या मन बहलाने का साधन, कोई तुमको समझ जाए,
संभल जाना!
इससे पहले कि मीठी बातों में, कोई तुमको उलझा दे,
गलत राह की ओर मोड़कर, मंज़िल अपनी भुलवा दे,
नीयत पढ़ लेना!
इससे पहले कि कोई घर में, फूट डालना शुरू करे,
भेदिया बनकर अपनों के ही, विरुद्ध मन में जहर भरे,
परख कर देख लेना!
इससे पहले कि अपनी वाणी, कटु बन विष को घोल सके,
या कोई अभद्र होकर, मान-मर्यादा तौल सके,
सबका सम्मान रखना!
इससे पहले कि समय व्यर्थ हो, और 'टाइम-पास' तुम कहलाओ,
वक्त की कीमत को पहचानो, व्यर्थ न जीवन झुलसाओ,
समय देख चलना!
इससे पहले कि अभिमान तुम्हारा, अपनों को ही दूर करे,
या भीड़ का हिस्सा बनकर तुम, खुद को बिल्कुल चूर करे,
अपनी पहचान रखना!
इससे पहले कि उलझन बनकर, जीवन बोझिल हो जाए,
या खुद की ही नज़रों में, व्यक्तित्व कहीं गिर जाए,
फूंक-फूंक कर कदम रखना!
         आज जहाँ लोग कहते हैं की समय नहीं मिल पाता है वहीँ यह भी देखा जाता है कि लोग किस तरह से अपना टाइम पास करते रहते हैं। अपने परिवार वालों के लिए भले ही समय न हो लेकिन बाहर घंटों मोबाइल या फ़ोन पर बतियाते फिरते है, इतना कि आस पास कि सुध भी नहीं रहती है. इन्टरनेट को ही ले लीजिये इसमें इतनी अच्छी जानकारी होने के बाद भी आज की युवा पीढ़ी जिस तरह से अपना समय आपस में बर्बाद करते दिखते हैं, उससे उनकी सोच कुंद होती दिखाई देती है. जिस तरह से इन्टरनेट का दुरपयोग हो रहा है, यह देखकर दुःख होता है कि क्यूँ कोई अपना कीमती समय फालतू कामों या बातों में लगाकर कहता है कि समय नहीं मिलता, जबकि सत्य तो यही है कि ऐसे लोगों के पास वास्तव में अच्छे कामों के लिए समय कि कमी है. जरा अगर अपने घर परिवार, अपने बारे मैं कभी गौर से देखें तो उन्हें पीछे पछताने कि जरुरत नहीं होगी, बस इससे पहले उन्हें अपना मूल्यांकन खुद करना होगा कि उन्हें क्या करना चाहिए और वे क्या कर रहे हैं. इसी सन्दर्भ में कविता प्रस्तुत हैं.
Copyright @Kavita Rawat, Bhopal, 25 Aug, 2009

10 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi utkrisht rachna,,,,,,

Apanatva ने कहा…

kash ! aisaa sab kar pate jandagee savar jaatee sabakee .prarthana hai log blog par aae kuch to grahan kare .

vidya ने कहा…

हलचल पर आपकी रचना देखी ...बहुत सुन्दर
हर चेतावनी सटीक...
इससे पहले कि किसी की कोई बात बुरी लगने लगे
बातों पर अपनी ध्यान देना
इससे पहले कि कोई अपमान करने पर तुल जाय
सबका मान रखना...

Jay dev ने कहा…

जीवन का साद सदउपयोग करे व्यर्थ की चिन्ताओ से दूर रहे |

Unknown ने कहा…

१५ सितम्बर २००९ को ६ जनवरी २०१२ को पढ़ कर लगा वाकई आपने कालजयी रचना लिख डाली है हमारे देश में यह नसीहत २०५२ में भी कोई लिख पढ़ रहा होगा . आप भोपाल से हैं . यह और सुखद अनुभूति है . भोपाल विश्वविद्यालय जब वह बरकतउल्ला नहीं हुआ था हमारा भी शिक्षा स्थल था

Prakash Jain ने कहा…

bahut sundar aur satik....

Monika Jain ने कहा…

sarthak rachna...sundar sandesh :)
- मिश्री की डली ज़िंदगी हो चली

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

बहुत ही सच्ची और अच्छी बातो से सचेत किया है आपने...
हर पंक्ति एक अच्छा सन्देश दे रही है...
बहुत ही अच्छी और ज्ञानवर्धक रचना है....

आहुति ने कहा…

sacchi baat kahi aapne.....

सागर ने कहा…

bhaut hi sahi kaha aapne........

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