जब-जब भी मैं तेरे पास आया,
चटाई पर या कुर्सी में बैठी,
हुक्का गुड़गुड़ाते तू मुझे दिखी।
तेरे हुक्के की गुड़गुड़ाहट सुन,
मैं दबे पाँव सीढ़ियाँ चढ़ता।
तुझे चौंकाने दौड़ के आता,
पर तू पहले ही सब जान लेती।
ओ माँ, माँ का दिल ही सब कुछ सुन पाए...
तेरी ममता की छाँव में ये जीवन बहता जाए।
माँ की नज़र भले ही धुंधली हो जाए,
दिल की धड़कन कभी कम न पड़ पाए।
आँख-कान से देखना ज़रूरी नहीं,
माँ का दिल ही सब कुछ सुन पाए।
कभी दो दिन बात न कर पाया,
तेरी चिंता ने मुझको घेर लिया।
फ़ोन मिलाकर तू पूछने बैठी,
“सब ठीक है न बेटा, बता दिया।”
ओ माँ, माँ का दिल ही सब कुछ सुन पाए...
तेरी ममता की छाँव में ये जीवन बहता जाए।
तेरे सवालों की बौछार में,
मैं चुपचाप तुझे सुनता रहा।
फिर कहता—“अपनी चिंता कर ले,
हमारी चिंता तू क्यों करे माँ।”
तू कहती—“माँ हूँ न सबकी फ़िकर करती हूँ,
तेरे हर दर्द को खुद में भरती हूँ।”
अब मेरी वो चिंता कौन करेगा,
तेरे बिना ये दिल कैसे रहेगा माँ...
कैसे रहेगा माँ...
ये दिल कैसे रहेगा... माँ...
अब मेरी वो चिंता कौन करेगा,
तेरे बिना ये दिल कैसे रहेगा माँ...
कैसे रहेगा माँ...
ये दिल कैसे रहेगा... माँ...
... कविता रावत

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