रहता जीवन कितना अकेला - KAVITA RAWAT
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Wednesday, February 3, 2010

रहता जीवन कितना अकेला

जीवन में यदि थोड़ी सी व्यथा हो तो उसका वर्णन सबके सामने कर लिया जाता है, लेकिन यदि वह गहरी हो तो वह मूक ही बनी रह जाती है. जिसे सहन करना कठिन होता है लेकिन कभी-कभी यही व्यथा अपनों की भीड़ से हटकर अनजाने रिश्तों की व्यथा में डूबकर बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ़ ही लेती है और फिर उसकी परिणति एक अलग ही व्यथा का रूप धर हमारे सामने उपस्थित होती है. कुछ ऐसे ही मनोभावों की प्रस्तुति .......


घेर लेती उदासी और सूनापन
न दिखता कोई साथ सहारा
मन की घोर निराशा के क्षण में
बहती चाह, तमन्नाओं की व्यर्थ निरंतर धारा
सबसे अच्छे दिन, साल गुजरते जब जीवन में
सोचूं प्यार करूँ मैं! लेकिन किसको?
व्यर्थ यत्न यह दिखता
शाश्वत प्यार भला कब संभव!
अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!

-Kavita Rawat

15 comments:

दिगम्बर नासवा said...

अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला....

अक्सर कभी कभी जब उदासी छाती है .......... मन अपने आप को अकेला महसूस करता है ....... सूनेपन को हूबहू उतार दिया है आपने ..........

परमजीत सिहँ बाली said...

अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी। बधाई।

Yogesh Verma Swapn said...

achchi abhivyakti.

संजय भास्‍कर said...

सूनेपन को हूबहू उतार दिया है आपने ..........

संजय भास्‍कर said...

PLZ VISIT MY BLOG KAVITA JI...
....देश सबका है ....
MY NEW POST..

संजय भास्‍कर said...

प्रभावशाली रचना....वाह !!!

Apanatva said...

bahut sunder abhivykti........

निर्मला कपिला said...

ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!
सही बात है बहुत भावमय मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
...सच है. जब तक अंतर्मन में दीपक नहीं जलता जीवन खुद को सदा अकेला ही महसूस करता है.

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

बहुत ही खूबसूरत कविता..... आपने तो निःशब्द कर दिया....

सदा said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द गहरे भावों की प्रस्‍तुति ।

Razi Shahab said...

सोचूं प्यार करूँ मैं! लेकिन किसको?
व्यर्थ यत्न यह दिखता
शाश्वत प्यार भला कब संभव!
अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!
bahut sundarkavita

निर्मला कपिला said...

अन्त्रदुअन्द के वीराने मे
रहता जीवन कितना अकेला
उदासी के आलम मे मन की व्यथा का सजीव चित्रण शुभकामनायें

डॉ. नवीन जोशी said...

कविता जी, आपका ब्लॉग पर आना पहाड़ की सैर पर आने का अनुभव देता है, बहुत बहुत साधुवाद!! लिखते रहिएगा...