"जीवन की सतही व्यथा शब्दों का संबल पाकर अभिव्यक्त हो जाती है, किंतु जब वह अंतस की अतल गहराइयों को छूती है, तब मूक रुदन बन जाती है। इस मौन और असहनीय वेदना के क्षणों में, कभी-कभी परिचितों की भीड़ बेगानी लगने लगती है। ऐसे में, किसी अनजाने, निश्छल रिश्ते का निशब्द साथ उस अवसाद से उबरने का मार्ग प्रशस्त करता है। परंतु, नियति का चक्र देखिए—वह मुक्ति मार्ग भी अंततः एक सर्वथा नवीन और नितांत भिन्न वेदना का रूप धरकर हमारे सम्मुख आ खड़ा होता है। यह कविता इसी अंतर्द्वंद और आत्मिक अकेलेपन की एक मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है।"
न दिखता कोई तनिक भी संबल,
मन की घोर निराशा के उन क्षणों में,
बहती चाह-तमन्नाओं की धारा निष्फल।
जीवन के सर्वश्रेष्ठ वसंत जब बीत रहे हों,
सोचूं, बिखेरूं प्रेम! पर भला किस पर?
दिखता यह अथक यत्न भी व्यर्थ मुझे,
शाश्वत प्रेम क्या संभव है इस धरा पर?
झांक कर देखा जब अपने ही अंतर्मन में,
वहां आशा का कोई दीपक न जलता पाया,
सुख-दुःख और चाहतों का लगा है मेला,
पर अंतर्द्वंद के इस घने वीराने में—
पाया स्वयं को नितांत एकाकी और अकेला!
...Kavita Rawat

15 टिप्पणियां:
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला....
अक्सर कभी कभी जब उदासी छाती है .......... मन अपने आप को अकेला महसूस करता है ....... सूनेपन को हूबहू उतार दिया है आपने ..........
अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।
रचना अच्छी लगी। बधाई।
achchi abhivyakti.
सूनेपन को हूबहू उतार दिया है आपने ..........
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....देश सबका है ....
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प्रभावशाली रचना....वाह !!!
bahut sunder abhivykti........
ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!
सही बात है बहुत भावमय मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है शुभकामनायें
अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
...सच है. जब तक अंतर्मन में दीपक नहीं जलता जीवन खुद को सदा अकेला ही महसूस करता है.
बहुत ही खूबसूरत कविता..... आपने तो निःशब्द कर दिया....
बहुत ही सुन्दर शब्द गहरे भावों की प्रस्तुति ।
सोचूं प्यार करूँ मैं! लेकिन किसको?
व्यर्थ यत्न यह दिखता
शाश्वत प्यार भला कब संभव!
अपने ही अंतर्मन झाँकूँ
वहां न कोई दीपक जलता
ख़ुशी-गम, चाहत का लगता मेला
अंतर्द्वंद के वीराने में
रहता जीवन कितना अकेला!
bahut sundarkavita
अन्त्रदुअन्द के वीराने मे
रहता जीवन कितना अकेला
उदासी के आलम मे मन की व्यथा का सजीव चित्रण शुभकामनायें
कविता जी, आपका ब्लॉग पर आना पहाड़ की सैर पर आने का अनुभव देता है, बहुत बहुत साधुवाद!! लिखते रहिएगा...
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