हरियाली अमावस्या: प्रकृति, संस्कृति और पितृ-ऋण से मुक्ति का पर्व - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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रविवार, 16 अगस्त 2026

हरियाली अमावस्या: प्रकृति, संस्कृति और पितृ-ऋण से मुक्ति का पर्व




हरियाली अमावस्या केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध को रेखांकित करने वाला पावन अवसर है। श्रावण मास में आने वाली यह अमावस्या मुख्य रूप से भगवान शिव, माता पार्वती और पितरों को समर्पित मानी जाती है।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
शिव-पार्वती उपासना: इस दिन देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती का विधि-विधान से श्रृंगार, पंचामृत अभिषेक तथा बेलपत्र, धतूरा व श्वेत पुष्प अर्पित कर पूजन किया जाता है। इससे गृहस्थ जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।
पितृ तर्पण: यह तिथि पितरों को प्रसन्न करने के लिए विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन तर्पण और दान-पुण्य करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कृषि एवं प्रकृति पूजन: अन्नदाता किसान इस दिन अपने कृषि यंत्रों की पूजा कर उत्तम फसल की प्रार्थना करते हैं। वहीं आमजन पीपल, बरगद, नीम, तुलसी, आँवला जैसे फलदायी व औषधीय पौधे लगाकर प्रकृति के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हैं।
संस्मरण: एक सार्थक पहल और आध्यात्मिक संतोष
सुबह-सुबह जब पड़ोस की महिला ने घर आकर हरियाली अमावस्या पर पूजा के लिए तुलसी का पौधा माँगा, तो मन में आश्चर्य और प्रसन्नता दोनों का अनुभव हुआ। जो पड़ोसी हमेशा हमारे बगीचे को 'जंगल' कहकर आलोचना करती थीं और जीव-जंतुओं के भय से शिकायतें व्यक्त करती थीं, उनका पौधा माँगने आना यह दर्शाता है कि पर्व-त्योहार किस तरह अनजाने में ही सही, लोगों को प्रकृति से जोड़ देते हैं। उन्हें तुलसी के साथ-साथ आँवले का पौधा भी उपहारस्वरूप सौंपना एक सार्थक अनुभव रहा।
इसके उपरांत, जलेश्वर मंदिर पहुँचकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना की गई। शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक कर बेलपत्र, धतूरा और फल अर्पित किए गए। पूजा के पश्चात मंदिर के पिछले हिस्से में तुलसी, आँवला और नींबू के पौधों का रोपण किया गया।
मंदिर परिसर की खाली और बंजर भूमि पर पिछले कई वर्षों से सैकड़ों वृक्ष लगाकर उनकी निरंतर देखरेख की जा रही है। इन पौधों को विशाल वृक्ष बनते देखना और उनकी छाँव में समय बिताना मन को असीम शांति व आत्मिक संतोष प्रदान करता है।
(संलग्न वीडियो में आप देख सकते हैं कि किस तरह एक उखड़े हुए गुड़हल के पौधे को पुनः रोपित कर नया जीवन देने का प्रयास किया जा रहा है।)

8 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत अच्छी और जानकारी युक्त पोस्ट । मंदिर की खाली जगह में बगीचा तैयार किया है इसके लिए साधुवाद ।

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

जो आपका कहना है, वही मेरा भी कहना है। पर्यावरण के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु जो भी तथ्य अथवा अवसर आधार बने, स्वीकार्य है।

Kamini Sinha ने कहा…

भगवान की सच्ची पूजा तो आप ही ने किया है कविता जी, इस नेक काम के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको 🙏

Virendra Singh ने कहा…

बहुत बढ़िया बातें आपने बताई हैं। सुंदर अनुभव साझा किया। जिस महिला को तुलसी और आँवले के पौधे दिए उस हृदय भी अवश्य बदल गया होगा। आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

Sunil Deepak ने कहा…

भक्ति, पूजा और उनके साथ प्रकृति व पर्यावरण के प्रति जागरूकता, आप को साधूवाद

Anita ने कहा…

हरियाली अमावस्या के बारे में सुंदर जानकारी साझा करने के लिए आभार, आप लोग पर्यावरण के प्रति कितने सजग हैं साथ ही भारत की पुरातन संस्कृति को पोषित कर रहे हैं, अनेकों बधाई और साधुवाद!

Marmagya - know the inner self ने कहा…

आदरणीया कविता रावत जी, नमस्ते 🙏❗️
पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन के लिए जब भी कोई अवसर आये उसका लाभ उठाना चाहिए. बहुत अच्छी रचना!
कृपया इस लिन्क पर मेरी रचना मेरी आवाज में सुनें, चैनल को सब्सक्राइब करें, कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य दें! सादर!
https://youtu.be/PkgIw7YRzyw
ब्रजेन्द्र नाथ

मन की वीणा ने कहा…

प्रेरक पोस्ट।
भक्ति अर्चना तो सभी अपनी आस्था अनुरूप करते ही हैं, पर पर्यावरण की जागरूकता की तरफ ये एक श्र्लाघ्य कार्य है।
आपको अनंत शुभकामनाएं।
साधुवाद।

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