यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता - KAVITA RAWAT
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Monday, July 19, 2010

यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता
अन्दर ही अन्दर कुछ रहा है रिसता
किसे फुरसत कि देखे फ़ुरसत से जरा
कहाँ उथला कहाँ राज है बहुत गहरा
बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

यूँ कहने को सारा जग अपना होता
पर वक्त पर कौन है जो साथ रोता
तेरे-मेरे के घेरे से कौन बाहर निकले
साथ जीने-मरने वाले होते हैं बिरले
जो सगा है वही कितना संग चलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

यूँ ही कोई किसी की सुध नहीं लेता
बिन मांगे कोई किसी को कब देता
जब तक विप्र सुदामा नहीं गए मांगने
सर्वज्ञ कृष्ण भी कब गए उनके आंगने
महलों का सुख, झोपड़ी को है जलाता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

कल तक खूब बनी पर अब है ठनी
बात बढती है तो तकरार ही है तनी
तू-तू-मैं-मैं की अगर जंग छिड गयी
तो अपने-पराए की भावना मर गयी
सागर में यूं‍ ही कब ज्वार-भाटा चढ़ता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

जब साथ मिला तो खूब कमा लिया
लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया
जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे
कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे
बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता

.. .. कविता रावत

52 comments:

संजय भास्‍कर said...

bahut sundar vichaaron kee abhivyakti

बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पार आना हुआ

संजय भास्‍कर said...

गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

kshama said...

Yahi hai zindagi ka dard...har koyi tanha hi is path pe chalta hai!

रचना दीक्षित said...

"जब साथ मिला तो खूब कमा लिया
लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया
जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे
कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे
बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता"

हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ,
सच तो यही है .यही है आज के जीवन का यथार्थ
दिल में गहरे बैठ गई आपकी ये प्रस्तुती

रश्मि प्रभा... said...

यूँ ही कोई किसी की सुध नहीं लेता
बिन मांगे कोई किसी को कब देता
जब तक विप्र सुदामा नहीं गए मांगने
सर्वज्ञ कृष्ण भी कब गए उनके आंगने
महलों का सुख, झोपड़ी को है जलाता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता
sachchi yun hi kuch nahin hota, bahut badhiyaa

arvind said...

बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता
....hridaysparshee rachna. bahut badhiya.

Anonymous said...

यथार्थ के बेहद करीब सुंदर रचना

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता

बहुत सुन्दर रचना है ... और एक एक लब्ज़ सच है ...

राजकुमार सोनी said...

एक-एक शब्द तोल-मोलकर
मान गए आपको
अच्छी रचना के लिए बधाई.

Apanatva said...

aaj ko aainaa dikhatee ek utkrusht rachana......apanee yaha to kahawat bhee haiki bina roye ma bhee bacche ko doodh nahee pilatee.........aur ye bhee saty hai ki acche samay me sath dene walo kee kamee nahee.....mai do mahine nahee hoo atah comment dene me shayad aniymitata aa jae..........
shubhkamnae.......

कडुवासच said...

...behatareen rachanaa!!!

हमारीवाणी said...

हिंदी ब्लॉग लेखकों के लिए खुशखबरी -


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दिगम्बर नासवा said...

बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता ...

सच कहा है ... बेवजह तो कुछ भी नही होता ... पर क्या कुछ होने में इंसान का हाथ होता है ....
बहुत प्रश्न ढूँढने का प्रयास करती दिखती है ये रचना ...

वाणी गीत said...

कुछ भी बेवजह नहीं होता ...गिरगिट भी दुश्मन को देख कर ही रंग बदलती है ...

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

rashmi ravija said...

बिलकुल ही यथार्थवादी रचना...दिल की गहराइयों में जगह बनाती हुई

Coral said...

बहुत सुन्दर रचना ! शब्द शब्द पिरोया गया है !

सम्वेदना के स्वर said...

स्वार्थ का रंग ऐसा चढा है दुनिया पर कि अगर निःस्वार्थ कुछ भी मिले तो किसी को भरोसा नहीं होता..जब इंसान ने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का शोषण करना शुरू का दिया तो बादलों पर स्वार्थी होने का दोष क्यों मढ़ना... अच्छी रचना.

राजेश उत्‍साही said...

बधाई।

पी.एस .भाकुनी said...

बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता ....
ek such......AAAAAbhar

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सार्थक रचना...सच है की बिना बात कुछ नहीं होता

मनोज कुमार said...

संवेदनशील कविता, कविता।
जीवन एक पाठशाला है जिसमें व्यक्ति अनुभवों से शिक्षा ग्रहण करता है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

जब साथ मिला तो खूब कमा लिया
लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया
जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे
कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे
बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता
--
सभी छन्द बहुत सुन्दर रचे हैं आपने!

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

सचमुच, बहुत तार्किक हैं आपके विचार। हर क्रिया के पीछे एक लम्बी प्रक्रिया होती है।
………….
संसार की सबसे सुंदर आँखें।
बड़े-बड़े ब्लॉगर छक गये इस बार।

निर्मला कपिला said...

हर पँक्ति एक सच को ब्यान कर रही है समझ नही आ रहा कि किस पँक्ति को कोट करूँ
जीवन के हर रंग की अनुभूति है इस कविता मे। बधाई इस सुन्दर रचना के लिये।

SATYA said...

सच्चाई का आइना,
आभार...

daanish said...

शब्द - शब्द
अर्थपूर्ण गहराई ....

सुन्दर और प्रभावशाली रचना .

नीरज गोस्वामी said...

बहुत सार्थक अच्छी रचना...बधाई
नीरज

अंजना said...

सुंदर रचना...

hem pandey said...

'यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता'

- यही सच है.

nilesh mathur said...

बहुत सुन्दर!

Asha Lata Saxena said...

बहुत सुन्दरता लिखती हैं आप |बधाई
आशा

शोभना चौरे said...

बरसो की साधना होती है
यु ही कोई इतनी सुन्दर कविता नहीं लिख देता |
बहुत अच्छी रचना |

DR. ANWER JAMAL said...

कल तक खूब बनी पर अब है ठनी
बात बढती है तो तकरार ही है तनी
तू-तू-मैं-मैं की अगर जंग छिड गयी
तो अपने-पराए की भावना मर गयी
सागर में यूं‍ ही कब ज्वार-भाटा चढ़ता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता
nice words .

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Anonymous said...

Kavita jee, jeevan ko samajhna aur usake darshan ko samajhana do alag-alag cheejen hain. aap kee yah kavita usee darshan ko samjhaatee hai. kuchh chahiye to ichchha to vykdl karnee padegee.bahut achchha chintan.

Dr Subhash Rai said...

uper takaneeki badha se mera nam rah gaya hai.

Rohit Singh said...

दर्द को समेट कर लिखा है आपने। जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास हो रहा है हर लाइन में। परछाई भी तभी तक साथ देती है जब तक आशा कि किरण हो। वरना अंधेरा होने पर वो भी साथ छोड़ देती है कविता जी। स्वार्थ की दुनिया में हर पग पर धोखा है. फरेब है। तो कभी कभी अनजान लोग साथ देते हैं। लगता है कि दोस्त अब आस्तिन में रहते हैं। औऱ अनजाने सड़क किनारे पत्थर की तरह जिन्हें हम समझते हैं वो अचानक नींव बनकर सहारा देने लगते हैं।

हरकीरत ' हीर' said...

जब साथ मिला तो खूब कमा लिया
लक्ष्य दृढ़ रहे तो मुकाम भी पा लिया
जो कल तक दूर थे, वे पास आने लगे
कांटे बिछाते थे कभी, फूल बरसाने लगे
बिन बादल आसमां भी कहाँ है बरसता

सही कहा .....लक्ष्य दृढ होना चाहिए ......!!

ghughutibasuti said...

बहुत सुन्दर शब्दों से सजी कविता लिखी है किन्तु उससे भी सुन्दर उसमें जीवन का दर्शन है। पढ़कर मन खुश हुआ।
जन्मदिन की बधाई के लिए आभार।
घुघूती बासूती

Parul kanani said...

kavita ji..har lafz apne aap mein ek kehani si kehta hai...badhai!

Pawan Kumar said...

प्रभावी कविता.....! आभार.....!

कुमार राधारमण said...

सृष्टिचक्र। जीवन-क्रम। सहज अनुभूति। सरल अभिव्यक्ति।

शिक्षामित्र said...

कमोबेश,हम सब की गाथा।

शरद कोकास said...

तुक के मोह से हटकर देखिये कविता सुन्दर बन पड़ेगी ।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीया कविता रावत जी
नमस्कार !
आपके यहां आ'कर बहुत प्रसन्नता हो रही है …
सुंदर रचनाओं का ख़ज़ाना है यहां तो !
सब एक से बढ़ कर एक !
प्रस्तुत रचना यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता में भी सरस भावों का सहज संप्रेषण हो रहा है ।
अन्य कविताओं ने भी प्रभावित किया ।
बधाई !
स्वागत !

हां , छंद को और साध लें , तो सोने पर सुहागा हो जाएगा ।
शरद कोकास जी के सुझाव पर भी गौर किया जा सकता है …
शुभकामनाओं सहित …

शस्वरं पर भी आपका हार्दिक स्वागत है , अवश्य आइए…

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

Kamlesh said...

बेवजह गिरगिट भी नहीं रंग बदलता
यूँ ही अचानक कहीं कुछ नहीं घटता ..... कविता जी बहुत ही सुंदर लिखा है ..

Anonymous said...

Sabse pahle mai aapko Dhanyvad dunga jo aapne apne bichoro ko ek pahchan di,

App apne bicharo or samajik gatibidhiyon ka varan karke use logon ke samane prakat karo or tumahi ek din avashya safalta milegi,

Hemant

RAJ said...

यूँ ही अचानक कहीं कुछ भी नहीं घटता
हां अवश्य ही कुछ न कुछ कारण होता है ..
.बहुत सुन्दर अनुपम कृति

'एकलव्य' said...

आदरणीय ,अच्छी लेखनी ,सुन्दर रचना ! मानवीय मूल्यों को तोलती ,आभार। "एकलव्य"

Ravindra Singh Yadav said...

यथार्थ को उकेरती सुन्दर रचना।

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर रचना।