लिखो राम-राम, जपो सीता-राम,
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम॥
जब कोई न हो काम-धाम,
तो कर लो तुम बस एक काम।
छोड़ो बेमतलब की बहसें,
तज दो सब झूठे काम॥
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम,
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम॥
क्यों पर-निंदा में समय गँवाते,
क्यों व्यर्थ की बातें करते हो?
दूसरों के दोष गिना-गिना कर,
अपना ही मन भरते हो॥
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम,
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम॥
आज करेंगे, कल करेंगे,
क्यों बहानों में छिपते हो?
समय रेत सा फिसल रहा है,
फिर क्यों आलस में रुकते हो?
जब शक्ति है, जब अवसर है,
सिद्ध करो अपने सब काम॥
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम,
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम॥
मन अशांत है, चिंता भारी,
और दुखों का रोना है।
पाया जो है उसे भूलकर,
क्यों डरते जो खोना है?
शांति मिलेगी अंतरमन को,
जब लेंगे प्रभु का पावन नाम॥
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम,
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम॥
राम नाम ही सार जगत का,
राम नाम ही पूँजी है।
सफल बनेगा जीवन उसका,
जिसके पास ये कुंजी है।
अंत समय जब आयेगा,
साथ चलेगा बस ये नाम॥
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम,
लिखो राम-राम, जपो सीता-राम॥
... कविता रावत

1 टिप्पणी:
यह भजन मन को बहुत सहज तरीके से थाम लेता है। आप उपदेश नहीं देते, बल्कि दोस्त की तरह समझाते हैं। रोज़ की उलझनों, आलस और बेकार की बहसों पर आपने सीधी बात कही है। राम-नाम को आप कर्म से जोड़ते हैं, भागने का रास्ता नहीं बनाते, यही बात सबसे अच्छी लगती है।
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