जब आसमान पर दिमाग चढ़ा हो, इंसान आपे से बाहर होता है,
बिना सोचे-समझे जो बोले, वह आधा तीतर आधा बटेर होता है।व्यर्थ ही आसमान पर थूकने से, खुद का ही मान घटता है,
पर जो आकाश-पाताल एक करे, भाग्य उसी का चमकता है।
क्रोध में आग-बबूला होकर, क्यों आग उगलते हो भाई?
आग पर तेल छिड़ककर तुमने, बस अपनी शामत बुलाई।
आस्तीन का साँप बनकर, जो आग लगाकर तमाशा देखते हैं,
वक्त आने पर वे आठ-आठ आँसू अकेले में बहाते हैं।
कभी आटे के साथ घुन पिसे, कभी आटा गीला हो जाए,
जब आटा-दाल का भाव मालूम हो, तब आपा ठिकाने आए।
कोई आसमान के तारे तोड़ने के, झूठे ही जाल बुनता है,
कोई आवाज़ उठाकर यहाँ, शोषितों की पीड़ा चुनता है।
आग और फूँस का बैर पुराना, यह बात गाँठ तुम बाँध लो,
आस्तीन चढ़ाकर लड़ने से पहले, आत्मा को अपनी साध लो।
आसमान सिर पर उठाना या जमीन-आसमान के कुलावे मिलाना,
अतिशयोक्ति है सब, सहज रहकर ही आन को अपनी बचाना।
मुसीबत में आस टूटती, आसन भी उखड़ जाते हैं,
पर जो आग से पानी हो जाए, वे ही दिल जीत पाते हैं।
आसमान से गिरकर भी जो, आपे में वापस आते हैं,
वही वीर जग में संघर्षों का, नया आल्हा गाते हैं।
....कविता रावत


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