'अपनी-अपनी अक्ल' से लेकर 'अक्ल दौड़ाने' तक, जानिए 'अ' से जुड़े मुहावरों का बेहद खूबसूरत काव्यात्मक रूप।
था 'अक्ल का अंधा' बन रहा जो महा-मूर्ख,
मानो उसकी 'अक्ल चरने गई' हो कहीं दूर।
व्यर्थ ही वह 'अक्ल के घोड़े दौड़ाता' है,
जब 'अक्ल पर पत्थर' पड़, विवेक सो जाता है।
कोई मूढ़ 'अक्ल के पीछे लट्ठ लिए' फिरता,
कोई ज्ञान-शून्य 'अक्ल का पुतला' बना फिरता।
जहाँ 'अक्ल का कसूर' हो, वहाँ 'अक्ल के तोते' उड़ जाएँ,
जब 'अक्ल मारी जाए' किसी की, तो सीधा रास्ता भूल जाएँ।
ज्ञान का जिसे घमंड हो, उसे 'अक्ल का अजीर्ण' होता है,
बिना 'अक्ल खर्च' किए, जीवन में अंधकार ही होता है।
जब खाकर ठोकर 'अक्ल ठिकाने' आती है,
तब जीवन की उलझी 'अक्ल की गिरह' खुल जाती है।
जब करता है कोई 'अपनी खिचड़ी अलग पकाने' की चाह,
या अपनी जिद पर अड़कर, खुद ही चुनता है राह।
जिसके पास न हो गहरा ज्ञान, वो सदा इतराए,
जैसे 'अधजल गगरी' आधी होकर भी 'छलकत जाए'।
मेहनत और किस्मत से जब भाग्य बदल जाता है,
तब आदमी 'अरबों-खरबों में खेलता' नज़र आता है।
मुश्किलों का जब दौर हो, और संकट गहराए,
कोई 'अम्बर के तारे गिन' अपनी रात बिताए।
कोई 'अधर में झूलता' है अनिश्चय के घेरे में,
जब 'अर्सा तंग' हो, तो क्या रखा है डेरे में?
घबराहट के मारे कोई 'अकबक' करने लग जाता है,
जब बुद्धि काम न करे, तो इंसान घबरा जाता है।
जब स्वार्थ में बस 'अपना राग अलापना' ध्येय हो,
तो 'अपना-सा मुँह लेकर' रह जाना ही श्रेय हो।
छोड़ो 'अगर-मगर' करना, और बहानों को त्यागो,
सच्ची राह पर कदम बढ़ाओ, कुमार्ग से तुम भागो।
व्यर्थ की बहस में 'अरण्य रोदन' करना छोड़ो यारो,
जीवन अनमोल है इसे कर्म से तुम संवारो।
जब 'अपने मुँह मियाँ मिट्ठू' बन इठलाओगे,
तो सारे 'अरमान' धरे के धरे ही पाओगे।
उठो! और 'अपने पैरों पर खड़े' होकर दिखाओ,
न बेवकूफ़ी में खुद पर ही मुसीबत तुम लाओ।
सिर्फ 'अपना उल्लू सीधा' करना नहीं है बुद्धिमानी,
वरना 'अपना घर' भी न सूझेगा, होगी बड़ी हैरानी।
जब काम पड़े तो चुपचाप 'अपना रास्ता नापो',
सत्य के मार्ग पर चलो, व्यर्थ न तुम ताको।
माना कि 'अपनी गली में कुत्ता भी शेर' होता है,
पर असली दिलेर वही, जो हर हाल में सचेत रहता है।
... कविता रावत


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