'अपनी-अपनी अक्ल से लेकर 'अक्ल दौड़ाने' तक, जानिए 'अ' से जुड़े मुहावरों का बेहद खूबसूरत काव्यात्मक रूप।
अपनी-अपनी अक्ल है सबकी, अपनी-अपनी माया,किसी ने इसे संवारा, तो किसी ने व्यर्थ गंवाया।
कोई अक्ल का मारा भटके, कोई अक्ल का पुतला भारी,
कोई अक्ल का अंधा बैठा, खोकर अपनी मति सारी।
कोई अक्ल के पीछे लट्ठ लिए, मूढ़ता में सदा जीता,
कोई अक्ल के घोड़े दौड़ाकर, दुर्गम राहों को सीता।
कोई अक्ल के बखिये उधेड़े, सूक्ष्म तर्क की धार से,
कोई अक्ल से कोसों दूर, भागता इसके व्यवहार से।
किसी की अक्ल चक्कर में आती, भ्रम के जाल में फँसकर,
किसी की अक्ल पर पत्थर पड़ते, विवेक खोता है हँसकर।
विपदा में किसी की अक्ल के तोते उड़ जाते हैं पलभर में,
कोई अक्ल के बखिये उधेड़े, सूक्ष्म तर्क की धार से,
कोई अक्ल से कोसों दूर, भागता इसके व्यवहार से।
किसी की अक्ल चक्कर में आती, भ्रम के जाल में फँसकर,
किसी की अक्ल पर पत्थर पड़ते, विवेक खोता है हँसकर।
विपदा में किसी की अक्ल के तोते उड़ जाते हैं पलभर में,
किसी की अक्ल चरने जाती, जब ज़रूरत हो घर में।
उम्र के साथ किसी की अक्ल, अक्सर सठिया जाती है,
ठोकर खाकर ही अक्ल, अक्सर ठिकाने आती है।
कोई अक्ल को खर्च करे, सूझ-बूझ के व्यापार में,
उम्र के साथ किसी की अक्ल, अक्सर सठिया जाती है,
ठोकर खाकर ही अक्ल, अक्सर ठिकाने आती है।
कोई अक्ल को खर्च करे, सूझ-बूझ के व्यापार में,
कोई अपनी अक्ल दौड़ाए, बस व्यर्थ के सरोकार में।
... कविता रावत
... कविता रावत


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