सौभाग्य और संतान हेतु, वट वृक्ष को शीश झुकाएँ हम।
सती सावित्री सा संकल्प हो, मन में अटूट विश्वास रहे,
प्रकृति और परमात्मा का, सदा हमारे पास रहे।
अक्षय वट की घनी छाँव में...
मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, अग्र भाग में शिव वास करें,
सृष्टि के इस जीवन-दाता का, आओ मिलकर ध्यान धरें।
ज्येष्ठ मास की तपती धूप में, शीतल छाया जो देता है,
कष्ट और रोग हरकर जो, अक्षय जीवन का वर देता है।
अक्षय वट की घनी छाँव में...
सात बार परिक्रमा करके, रक्षा सूत्र को बाँधेंगे,
मौली के इन धागों से हम, अटूट प्रेम को साधेंगे।
यम, सावित्री और सत्यवान की, पावन कथा सुनाते हैं,
धैर्य और बुद्धि के बल पर, मृत्यु को जीत दिखाते हैं।
अक्षय वट की घनी छाँव में...
केवल पूजन मात्र नहीं यह, प्रकृति का सम्मान भी है,
पर्यावरण की रक्षा करना, वेदों का भी ज्ञान यही है।
वट, पीपल और हर तरुवर को, संतान सम हम पालेंगे,
अपनी दिव्य संस्कृति को, रग-रग में अब ढालेंगे।
अक्षय वट की घनी छाँव में...
अखण्ड रहे सौभाग्य हमारा, जग का हो कल्याण प्रभु,
प्रकृति माँ की गोद में, पाएँ हम सब मान विभु।
अक्षय वट की घनी छाँव में, श्रद्धा का दीप जलाएँ हम...
...कविता रावत

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें