जो अपनों की ही इज़्ज़त उतारें, वे जग में नाम क्या पाएंगे?
इज़्ज़त मिट्टी में मिलाकर अपनी, वे खुद ही पछताएंगे।इधर की उधर लगाकर जो, घर-घर में आग लगाते हैं,
इल्लत पालकर झगड़ों की, वे चैन कभी न पाते हैं।
इन्द्र की परी बनने का, कुछ झूठा ही गुमान करते,
पर ईमान बेचकर अपना, वे बस अपना अपमान करते।
इतना बड़ा मुँह हो जाना, जब अहंकार सर चढ़ जाए,
ईमान डोलता उसका ही, जो लालच में अंधा हो जाए।
इस कान सुना, उस कान उड़ाया, बातों का मूल्य न जाना,
इस हाथ दिया, उस हाथ लिया, बस यही जगत का ताना-बाना।
इधर खाई और उधर खंदक, जब संकट चारों ओर घिरे,
इधर-उधर की करने वाले, खुद ही अपने जाल में गिरे।
इधर की दुनिया उधर हो जाए, पर सत्य न अपना छोड़ेंगे,
जो ईंट से ईंट बजाना जानते, वे पर्वत भी तोड़ेंगे।
डेढ़ ईंट की मस्जिद अलग बना, क्यों खुद को दूर हटाते हो?
गुड़ दिखाकर ईंट मारकर, क्यों विश्वास को ठुकराते हो?
ईद का चाँद जो हुए यहाँ, वे अब मुश्किल से दिखते हैं,
जो ईंट का जवाब पत्थर से दें, वे इतिहास नया लिखते हैं।
जीवन की इस भाग-दौड़ की, अब इतिश्री हमें करना है,
इज़्ज़त धूल में न मिले कभी, इसी आन पर मरना है।
... कविता रावत


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