'ए' और 'ऐ' के मुहावरों की काव्य-धारा / एकता और द्वंद्व -मुहावरों की जुबानी - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 12 मई 2026

'ए' और 'ऐ' के मुहावरों की काव्य-धारा / एकता और द्वंद्व -मुहावरों की जुबानी

एक आँख से सबको देखे,
जो न्याय की मूरत होता है,
पर एक आँख न भाए कोई, तो मन में शूल चुभता है।
जहाँ एकता की शक्ति हो, वहाँ एक और एक ग्यारह हैं,
पर एक ही नौका में सवार जो, उनके मुकद्दर एक सारे हैं।

एक अनार सौ बीमार यहाँ, दुनिया में भारी खींचातानी,
कोई एक की चार लगाता, करता फिरता अपनी मनमानी।
कोई एक-एक के दस-दस करता, लालच की राह पकड़ता है,
तो कोई एक पंथ दो काज कर, चतुरता से आगे बढ़ता है।

एक म्यान में दो तलवारें, भला कहाँ टिक पाती हैं?
एक हाथ से ताली न बजती, बातें बिगड़ती जाती हैं।
जब एक ओर कुआँ दूजी ओर खाई, तो संकट भारी आता है,
इंसान तब एड़ी-चोटी का जोर लगा, मुश्किल से बच पाता है।

कोई एक पाँव से खड़ा रहा, सेवा में जीवन वार दिया,
किसी ने एड़ी-चोटी का पसीना एक कर, अपना भविष्य सँवार दिया।
कुछ एक ही थाली के चट्टे-बट्टे, साज़िश गहरी बुनते हैं,
जो अड़ियल हों अपनी धुन के, वो एक किसी की न सुनते हैं।

चाहे हो कोई ऐरा-गैरा, या हो कोई खास यहाँ,
वक़्त पड़ने पर एड़ियाँ रगड़नी पड़ती हैं बेसाख्ता यहाँ।
गर की किसी ने ऐसी-तैसी, तो मान-सम्मान सब जाता है,
पर जो सबको एक लाठी से हाँके, वही असल में पछताता है।

... कविता रावत

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