'ओखली में सिर देने' से लेकर 'औघड़ दानी' तक, जानिए 'ओ' और 'औ' से जुड़े मुहावरों का बेहद खूबसूरत काव्यात्मक रूप।
जब ओखली में सिर दे ही दिया, तो मूसल का क्या डरना,
औंधी खोपड़ी वालों के आगे, व्यर्थ है अपना सिर धुनना।
औकात बसर करने की खातिर, दिन-रात पसीना बहता है,
पर औने-पौने भाव में बिकना, स्वाभिमान कहाँ सहता है?
पर औने-पौने भाव में बिकना, स्वाभिमान कहाँ सहता है?
कभी क्रोध में ओंठ चबाना, कभी ओंठ मल रह जाना,
बात हृदय की बाहर न आए, बस ओंठों में ही कह जाना।
जब सच का ओढ़ना उतरेगा, तब चेहरा साफ दिखेगा,
वह औंधा गिरेगा मिट्टी में, जो छल की कलम से लिखेगा।
मन ललचाए तो ओंठ चाटना, घृणा हो तो ओंठ उखाड़ना,
बात जुबां पर आने को हो, तो बस ओंठ हिला कर रह जाना।
दुनिया का दस्तूर निराला, पल में और का और हो जाना,
शुभ आहट पर ओंठ फड़कना, फिर खुशियों का घर आना।
ओले पड़ना जब खुशियों पर, तो धीरज की लौ जलाना,
औघड़ दानी बन कर जग में, सबका मान बढ़ाना।
इन शब्दों के मेल-जोल से, जीवन का सार समझ आता,
मुहावरों के दर्पण में ही, असली रूप नज़र आता।
....कविता रावत


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