पर कुछ उल्टी गंगा बहाकर, व्यर्थ ही ज्ञान देते हैं।
दिखावा है जहाँ, वहाँ ऊँची दुकान फीके पकवान मिलेंगे,
जो उलटी पट्टी पढ़ाते, वे राह में अकेले ही चलेंगे।
किसी पर उँगली उठाना, या उँगली करना है आसान,
पर उँगली पकड़ते पहुँचा पकड़ना, है चतुर की पहचान।
उँगलियों पर नचाकर जो, अपना उल्लू सीधा करते हैं,
वे उखड़ी-उखड़ी बातें कर, बस अपनों को छलते हैं।
उखाड़-पछाड़ की दुनिया में, उजला मुँह करना सीखो,
उठल्लू का चूल्हा बनकर नहीं, जम कर रहना सीखो।
उड़ चलने के ख्वाब में, मत उधार खाकर जीना,
उन्नीस-बीस का अंतर ही सही, पर सत्य का घूँट पीना।
उल्टी खोपड़ी वालों को, उलटी माला फेरते देखा,
उलटे छुरे से मुँडकर, भाग्य को टेढ़ा करते देखा।
जब उलटी हवा बहती, तो उलटे पाँव लौटना पड़ता है,
अहंकार में उलटे मुँह गिरकर, इंसान बस सिसकता है।
जहाँ उल्लू बोलता, वहाँ वीर उठ खड़े होते हैं,
जो मूर्खों को उल्लू बनाएँ, वे बीज जहर के बोते हैं।
ऊँचा सुनने का बहाना कर, अक्सर सच टाला जाता है,
ऊँट के मुँह में जीरा देकर, किसे यहाँ पाला जाता है?
ऊँट के गले में बिल्ली, या ऊँचे-नीचे पैर पड़ना,
मुसीबत को दावत है, बिना सोचे आगे बढ़ना।
ऊँट के ऊँट रहे जो, वे बदलाव न जान पाए,
उबल पड़े जो बात-बात पर, वे अपना ही मान गँवाए।
... कविता रावत
दिखावा है जहाँ, वहाँ ऊँची दुकान फीके पकवान मिलेंगे,
जो उलटी पट्टी पढ़ाते, वे राह में अकेले ही चलेंगे।
किसी पर उँगली उठाना, या उँगली करना है आसान,
पर उँगली पकड़ते पहुँचा पकड़ना, है चतुर की पहचान।
उँगलियों पर नचाकर जो, अपना उल्लू सीधा करते हैं,
वे उखड़ी-उखड़ी बातें कर, बस अपनों को छलते हैं।
उखाड़-पछाड़ की दुनिया में, उजला मुँह करना सीखो,
उठल्लू का चूल्हा बनकर नहीं, जम कर रहना सीखो।
उड़ चलने के ख्वाब में, मत उधार खाकर जीना,
उन्नीस-बीस का अंतर ही सही, पर सत्य का घूँट पीना।
उल्टी खोपड़ी वालों को, उलटी माला फेरते देखा,
उलटे छुरे से मुँडकर, भाग्य को टेढ़ा करते देखा।
जब उलटी हवा बहती, तो उलटे पाँव लौटना पड़ता है,
अहंकार में उलटे मुँह गिरकर, इंसान बस सिसकता है।
जहाँ उल्लू बोलता, वहाँ वीर उठ खड़े होते हैं,
जो मूर्खों को उल्लू बनाएँ, वे बीज जहर के बोते हैं।
ऊँचा सुनने का बहाना कर, अक्सर सच टाला जाता है,
ऊँट के मुँह में जीरा देकर, किसे यहाँ पाला जाता है?
ऊँट के गले में बिल्ली, या ऊँचे-नीचे पैर पड़ना,
मुसीबत को दावत है, बिना सोचे आगे बढ़ना।
ऊँट के ऊँट रहे जो, वे बदलाव न जान पाए,
उबल पड़े जो बात-बात पर, वे अपना ही मान गँवाए।
... कविता रावत


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