ऑफिस की कैंटीन में चाय का दौर चल रहा था। तभी रमेश हाथ में गुटका रगड़ते हुए और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए टेबल के पास पहुंचे। उनके पास सुनाने के लिए अपनी 'गोवा ट्रिप' का एक बेहद 'रोमांचक' और 'बहादुरी' का किस्सा था।
"अरे भाई, तुम लोग तो मुझे सीधा-साधा समझते हो, लेकिन गोवा में जो मैंने पुलिस वालों को अपनी बुद्धिमानी से गच्चा दिया है, वह कोई मामूली बात नहीं है!" रमेश ने गर्व से सीना फुलाते हुए कहा।
सब लोग उत्सुकता से उन्हें देखने लगे। रमेश ने बताना शुरू किया कि कैसे वे शाम को समुद्र किनारे टहल रहे थे। उनके दो दोस्त सिगरेट पी रहे थे और रमेश हमेशा की तरह मुंह में गुटका दबाए जगह-जगह 'पिच-पिच' थूकते हुए हुड़दंग मचा रहे थे। तभी अचानक दो गश्ती पुलिस वाले वहां आ धमके। रेत पर लाल पीक देखकर पुलिस ने कड़क कर पूछा, "किसने थूका है यहाँ?"
"अब मेरे मुंह में तो पूरा गुटका भरा था," रमेश हंसते हुए बोले, "अगर मुंह खोलता तो चोरी पकड़ी जाती और भारी जुर्माना लगता। मैंने दिमाग दौड़ाया और पुलिस के पूछने पर 'ऊं..हूं..' करने लगा। पुलिस वाले ने झल्लाकर पूछा—'गूंगे हो क्या?' बस, मेरी दिमाग की बत्ती जली और मैंने तुरंत हां में सिर हिला दिया! पुलिस ने मुझे बेचारा गूंगा समझा और छोड़ दिया। लेकिन मेरे उन दोनों सिगरेट वाले दोस्तों को पकड़कर पांच-सौ, पांच-सौ का चालान ठोक दिया! देखो, इसे कहते हैं असली होशियारी! मेरी वजह से वे दोनों नप गए और मैं साफ बच निकला!"
रमेश अपनी ही बात पर ठहाका मारकर हंस पड़े। वे उम्मीद कर रहे थे कि पूरी कैंटीन उनके इस 'मास्टरस्ट्रोक' पर तालियां बजाएगी। लेकिन वहां अजीब सा सन्नाटा छा गया।
तभी कोने की टेबल पर बैठे ऑफिस के सबसे सीनियर और सम्मानित अधिकारी, शर्मा जी उठे। उन्होंने रमेश के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत लेकिन गंभीर आवाज में कहा:
"रमेश बाबू, जिसे आप अपनी 'बहादुरी और होशियारी' समझकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं ना... असल में वह हमारे समाज की एक बहुत बड़ी 'मानसिक और सामाजिक बीमारी' है।"
रमेश की हंसी हवा में गायब हो गई।
शर्मा जी ने आगे कहा, "जरा ठंडे दिमाग से सोचिए। पहली बात—आपने उस खूबसूरत और साफ-सुथरे गोवा के समुद्र तट को अपनी गंदगी से गंदा किया, जो एक नागरिक के तौर पर आपकी शर्मनाक हरकत थी। दूसरी बात—पकड़े जाने पर आपने एक दिव्यांग (मूक-बधिर) होने का झूठा नाटक किया, जो उन लोगों का मज़ाक उड़ाने जैसा है जो सच में इस लाचारी से जूझ रहे हैं। और तीसरी सबसे दुखद बात—आपकी उस गंदगी की सजा आपके ही दोस्तों को भुगतनी पड़ी और आप उनके नुकसान पर आज यहाँ ठहाके लगा रहे हैं?"
शर्मा जी की बातों ने कैंटीन में मौजूद हर शख्स को सोचने पर मजबूर कर दिया।
सार्वजनिक स्थानों को गंदा करना, अपनी गलती को छिपाने के लिए झूठ का सहारा लेना और अपनों को ही मुसीबत में डालकर उसे अपनी जीत समझना कोई 'बहादुरी' या 'स्मार्टनेस' नहीं है। यह एक गंभीर सामाजिक बीमारी है। असली बहादुरी अपनी गलती को स्वीकार करने और समाज को स्वच्छ व सुंदर बनाने में है, न कि उसे 'पिच-पिच' करके बदसूरत बनाने में।
रमेश का सिर शर्म से झुक चुका था। उन्होंने जेब में रखा गुटके का अगला पाउच चुपचाप डस्टबिन में डाल दिया।
....कविता रावत
Photo Google Gemini से साभार



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