आम आदमी पर 'दोहरी मार': तत्काल रेल टिकट और नो-रिफंड नीति पर पुनर्विचार की जरूरत - Kavita Rawat Blog, Kahani, Kavita, geet, bhajan, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona
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मंगलवार, 26 मई 2026

आम आदमी पर 'दोहरी मार': तत्काल रेल टिकट और नो-रिफंड नीति पर पुनर्विचार की जरूरत

भारतीय रेलवे को हमारे देश की लाइफलाइन कहा जाता है, जो हर वर्ग के नागरिक को उसकी मंजिल तक पहुँचाती है। लेकिन रेलवे की कुछ नीतियां ऐसी हैं, जो आम आदमी की मजबूरी का फायदा उठाती हुई प्रतीत होती हैं। इनमें से सबसे प्रमुख है— तत्काल टिकट की बुकिंग और उसकी कैंसिलेशन नीति।
मजबूरी का सौदा या प्रीमियम सर्विस?
कोई भी यात्री खुशी-खुशी एक्स्ट्रा चार्ज देकर तत्काल टिकट नहीं कराता। तत्काल टिकट का सहारा तब लिया जाता है जब घर में कोई मेडिकल इमरजेंसी हो, अचानक किसी का देहांत हो जाए, या किसी जरूरी इंटरव्यू या सरकारी काम के लिए तुरंत निकलना पड़े। यानी, तत्काल टिकट का सीधा संबंध यात्री की परेशानी और आपातकाल से है। लेकिन रेलवे इस आपातकालीन स्थिति में यात्री से भारी 'तत्काल शुल्क' वसूलता है। यहाँ तक तो बात समझ आती है कि यह एक प्रीमियम कोटा है, लेकिन असली समस्या इसके बाद शुरू होती है।
कन्फर्म तत्काल टिकट और 'नो-रिफंड' का क्रूर नियम
रेलवे के मौजूदा नियमों के मुताबिक, यदि आपका तत्काल टिकट कन्फर्म हो चुका है और किसी कारणवश (जैसे मरीज की हालत और बिगड़ जाना, या यात्रा का उद्देश्य अचानक बदल जाना) आपको टिकट कैंसिल करना पड़े, तो रेलवे एक भी पैसा वापस (Refund) नहीं करता है।
यह नियम व्यावहारिक और मानवीय दोनों दृष्टिकोण से गलत है:
दोहरी मार: एक तरफ इंसान पहले से ही किसी संकट या इमरजेंसी से जूझ रहा होता है, ऊपर से रेलवे उसके पूरे पैसे जब्त कर लेता है।
सीट खाली नहीं रहती: ऐसा भी नहीं है कि टिकट कैंसिल होने पर रेलवे को नुकसान होता है। वह सीट तुरंत वेटिंग लिस्ट वाले अगले यात्री को मिल जाती है और रेलवे उससे भी पूरा पैसा वसूलता है। यानी एक ही सीट पर रेलवे दो बार कमाई करता है।
"जब संकट के समय रेलवे हमारे साथ खड़ी होनी चाहिए, तब वह अपनी इस कठोर नीति से आम नागरिकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। क्या एक जन-कल्याणकारी सरकार के तहत चलने वाले विभाग को इतना संवेदनहीन होना चाहिए?"
रेलवे से हमारी मांग: क्या सुधारा जा सकता है?
हम इस मंच के माध्यम से रेल मंत्रालय और सरकार से अपील करते हैं कि इस नीति में तुरंत मानवीय आधार पर बदलाव किए जाएं:
तार्किक कैंसिलेशन चार्ज:  कन्फर्म तत्काल टिकट रद्द होने पर पूरा पैसा जब्त करने के बजाय, एक निश्चित प्रशासनिक शुल्क (clerkage/cancellation fee) काटकर बाकी की राशि यात्री को वापस मिलनी चाहिए।
मेडिकल इमरजेंसी में छूट: कम से कम उन मामलों में जहां यात्री मेडिकल इमरजेंसी (अस्पताल के पर्चे या डॉक्टर के प्रमाण पत्र के साथ) के कारण यात्रा रद्द कर रहा हो, वहां पूरा रिफंड दिया जाना चाहिए।
पारदर्शिता: एक ही सीट से दो बार पैसे कमाने की इस व्यवस्था को बंद कर यात्रियों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई जाए।
निष्कर्षत: डिजिटल इंडिया और सुशासन के इस दौर में रेलवे की यह नीति सामंतवादी और दंडात्मक लगती है। तत्काल टिकट आम आदमी की जरूरत है, कोई विलासिता नहीं। उम्मीद है कि रेल मंत्रालय इस गंभीर विषय का संज्ञान लेगा और आम जनता को इस 'दोहरी मार' से राहत देगा।

आप इस विषय पर क्या सोचते हैं? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें और इस आवाज को रेल मंत्रालय तक पहुँचाने के लिए इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

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